उत्तरकाशी / देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में बुनियादी सुविधाओं, विशेषकर सड़कों की बदहाली किस कदर स्थानीय जीवन को प्रभावित कर रही है, इसका एक बेहद हैरान करने वाला और अनोखा नजारा उत्तरकाशी जिले में देखने को मिला। वर्षों से जर्जर और जानलेवा हो चुके मोटर मार्ग की सुध न लिए जाने से नाराज ग्रामीणों का सब्र आखिरकार टूट गया। प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ अपना आक्रोश दर्ज कराने के लिए सीमांत प्रखंड मोरी के सात गांवों के बाशिंदों ने एक ऐसा रास्ता चुना, जिसने शासन से लेकर प्रशासन तक को असहज कर दिया है।
ताजा Uttarakhand News के अनुसार, मोरी प्रखंड के गैंचवान, देवरा, गुराड़ी, पेंसर, हलटाड़ी, दंणगाण और पोखरी गांव के सैकड़ों ग्रामीणों ने ‘सारथी नामे तोक’ नामक स्थान पर एकत्र होकर सड़क के बीचों-बीच बने गहरे और जानलेवा गड्ढों का बकायदा अगरबत्ती, फूल-माला और अक्षत के साथ विधिवत पूजन किया। ग्रामीणों ने हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन को ‘सद्बुद्धि’ देने की प्रार्थना की, ताकि बरसों से उपेक्षित इस लाइफलाइन की मरम्मत का काम जल्द से जल्द शुरू हो सके।
सात गांवों की ‘लाइफलाइन’ पर मंडरा रहा है मौत का साया
यह अनोखा प्रदर्शन केवल लाइमलाइट में आने का जरिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे पहाड़ों में रहने वाले लोगों का वो गहरा दर्द है जो वे हर दिन इस रास्ते पर सफर करते हुए झेलते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह जर्जर मोटर मार्ग क्षेत्र के इन सात गांवों की एकमात्र जीवनरेखा (लाइफलाइन) है। क्षेत्र के हजारों लोगों का दैनिक जीवन, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य इसी एक सड़क के भरोसे टिका हुआ है।
पूरी सड़क वर्तमान में बड़े-बड़े गड्ढों में तब्दील हो चुकी है, जो बारिश के दिनों में छोटे-छोटे तालाबों का रूप ले लेते हैं। स्थिति यह है कि आए दिन यहां दुपहिया और चार पहिया वाहन दुर्घटनाग्रस्त होते रहते हैं। राहगीरों और वाहन चालकों के सिर पर हर समय किसी अनहोनी का खौफ मंडराता रहता है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कई बार गुहार लगाने के बाद भी जब किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, तब जाकर उन्हें इस सांकेतिक और आध्यात्मिक विरोध का सहारा लेना पड़ा।
सेब और राजमा का सीजन सिर पर, बागवानों को सता रहा है बर्बादी का डर
मोरी प्रखंड का यह पूरा इलाका अपनी उच्च गुणवत्ता वाले सेब और राजमा के उत्पादन के लिए पूरे देश में जाना जाता है। ग्रामीणों की आजीविका का मुख्य साधन बागवानी और कृषि ही है। विडंबना यह है कि जब इन फसलों को देश की बड़ी मंडियों तक पहुंचाकर मुनाफा कमाने का समय आता है, तब यह बदहाल सड़क उनकी उम्मीदों पर पानी फेर देती है।
गुणवत्ता पर पड़ रहा असर: ग्रामीणों ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि क्षेत्र में सेब का सीजन बिल्कुल शुरू होने वाला है। आगामी दिनों में प्रतिदिन दर्जनों सेब से लदे कमर्शियल वाहन इसी टूटी-फूटी सड़क से गुजरेंगे। खराब रास्ते के कारण गाड़ियां बीच राह में फंस जाती हैं, जिससे समय पर सेब मंडियों में नहीं पहुंच पाता। इसके अलावा, लगातार लगने वाले भीषण झटकों के कारण सेब आपस में टकराकर अंदर से काले पड़ जाते हैं, जिससे उनकी चमक और गुणवत्ता खत्म हो जाती है। नतीजा यह होता है कि मंडियों में बागवानों को उचित मूल्य नहीं मिलता और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
परियोजना और प्रभावित क्षेत्र पर एक नजर
| प्रभावित गांवों की संख्या | 07 गांव (गैंचवान, देवरा, गुराड़ी, पेंसर, हलटाड़ी, दंणगाण, पोखरी) |
| प्रदर्शन का मुख्य स्थान | सारथी नामे तोक (मोरी प्रखंड, उत्तरकाशी) |
| मुख्य नकदी फसलें | सेब, राजमा और अन्य बागवानी उत्पाद |
| संबंधित विभाग | प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) |
| ग्रामीणों की मुख्य मांग | सेब सीजन से पहले सड़क की तत्काल और मुकम्मल मरम्मत |
जिम्मेदार बोले- टेंडर प्रक्रिया जारी, प्राथमिकता पर होगा काम
इस पूरे मामले और ग्रामीणों के अनोखे प्रदर्शन की गूंज जब देहरादून के गलियारों तक पहुंची, तो संबंधित विभाग भी हरकत में आता दिखा। इस जर्जर मार्ग की स्थिति और ग्रामीणों के आक्रोश पर अपना पक्ष रखते हुए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के अधिशासी अभियंता योगेंद्र सिंह ने कहा:
“संबंधित मोटर मार्ग की खराब स्थिति की पूरी जानकारी विभाग के संज्ञान में है। सड़क के सुदृढ़ीकरण और मरम्मत कार्य के लिए जो भी आवश्यक कागजी और तकनीकी प्रक्रिया होती है, उसे तेजी से पूरा किया जा रहा है। चूंकि सेब का सीजन शुरू होने वाला है और स्थानीय लोगों की आवाजाही भी इस मार्ग पर अत्यधिक है, इसलिए इसे शीर्ष प्राथमिकता में रखा गया है। जल्द ही धरातल पर मरम्मत का कार्य शुरू करा दिया जाएगा ताकि ग्रामीणों को तत्काल राहत मिल सके।”
‘आश्वासन नहीं, काम चाहिए…’ ग्रामीणों ने दी उग्र आंदोलन की चेतावनी
हालांकि, अधिकारी के दावों पर स्थानीय जनता को आसानी से भरोसा नहीं हो रहा है। विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे दीपक डिमरी, कैलाश डिमरी और राजेंद्र नौटियाल ने साझा तौर पर कहा कि उन्हें बीते सालों में केवल कागजी आश्वासन ही मिले हैं, जबकि धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
प्रदर्शन के दौरान अनिल रांगड़, अरुण नौटियाल, उपेंद्र सिंह रांगड़, राजेंद्र पंवार सहित बड़ी संख्या में उपस्थित मातृशक्ति और युवाओं ने एक सुर में शासन-प्रशासन को चेतावनी दी। ग्रामीणों का साफ कहना है कि यदि सेब सीजन की शुरुआत से पहले धरातल पर भारी मशीनें नहीं उतरीं और वास्तविक रूप से सड़क की मरम्मत का काम शुरू नहीं हुआ, तो यह ‘गड्ढा पूजन’ एक बड़े और उग्र जन-आंदोलन में तब्दील हो जाएगा। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि चक्का जाम और तालाबंदी जैसे कदमों के बाद पैदा होने वाली किसी भी कानून व्यवस्था की स्थिति की पूरी जिम्मेदारी शासन और स्थानीय प्रशासन की होगी।
इस अनोखे प्रदर्शन ने एक बार फिर देवभूमि के दूरदराज के पर्वतीय क्षेत्रों में विकास के दावों की पोल खोल दी है और यह देखना दिलचस्प होगा कि पीएमजीएसवाई विभाग सेब के सड़ने से पहले इस जीवनरेखा को सुधार पाता है या नहीं।
