नैनीताल/उधम सिंह नगर: उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले से शुरू हुआ एक जमीनी विवाद अब देश के सबसे प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवारों में से एक की दहलीज तक जा पहुंचा है। जिला उधम सिंह नगर के किच्छा स्थित एक बहुचर्चित फार्म हाउस पर कथित तौर पर जबरन कब्जे और उसके भीतर फंसे असहाय महिलाओं, बच्चों व बेजुबान पशुओं की सुरक्षा को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की जेठानी सायरा वाड्रा से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल जमीनी विवाद में हाईकोर्ट की एकलपीठ ने स्थानीय प्रशासन को पीड़ित पक्ष को तत्काल पुख्ता सुरक्षा मुहैया कराने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार और मामले के अन्य विपक्षी दलों को तीन सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का समय दिया है।
हाईकोर्ट में हुई तीखी सुनवाई: कटघरे में आए किच्छा के प्रशासनिक अधिकारी
सोमवार, 6 जुलाई को न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ में इस संवेदनशील मामले पर बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। अदालत के पिछले कड़े रुख और पूर्व में जारी आदेश के अनुपालन में किच्छा के उपजिलाधिकारी (SDM) गौरव पांडे और थाना प्रभारी (SHO) रवि कुमार व्यक्तिगत रूप से कोर्ट रूम में पेश हुए। दोनों शीर्ष अधिकारियों ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखते हुए सफाई दी।
अधिकारियों की तरफ से अदालत को अवगत कराया गया कि किच्छा के पिपलिया मोड़ स्थित खान फार्म पर कानून-व्यवस्था बिगड़ने की गंभीर आशंका थी। माहौल बेहद तनावपूर्ण हो चुका था, जिसके चलते स्थिति को नियंत्रण में रखने और शांति बनाए रखने के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 164 का प्रयोग किया गया था। प्रशासनिक अधिकारियों ने दलील दी कि शुरुआत में याचिकाकर्ता की ओर से उन्हें सिविल कोर्ट के स्थगन आदेश (स्टे ऑर्डर) की मूल या आधिकारिक प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई थी। ऐसे में प्रशासन के सामने यह बड़ी कानूनी और व्यावहारिक चुनौती खड़ी हो गई थी कि इस बेशकीमती फार्म हाउस का असली मालिक आखिरकार कौन है?
‘सोशल मीडिया का जमाना है, मामूली बातें बन जाती हैं बवंडर’
अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि जैसे ही उन्हें नैनीताल हाईकोर्ट और सिविल कोर्ट के स्पष्ट आदेशों की प्रति प्राप्त हुई, उन्होंने धारा 164 के तहत की जा रही प्रशासनिक कार्रवाई पर तुरंत रोक लगा दी। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं को संपत्ति पर वापस कब्जा दिलाने की प्रक्रिया शुरू कर वहां सुरक्षा बल तैनात कर दिया गया है।
इस दलील को सुनने के बाद न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक टिप्पणी की। कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा कि जमीनी स्तर पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अधिकारियों को अत्यधिक सतर्कता, संवेदनशीलता और दूरदर्शिता के साथ कार्य करना चाहिए। कोर्ट ने आगाह करते हुए कहा कि आज का दौर सोशल मीडिया का जमाना है, जहां जमीन पर होने वाली मामूली सी दिखने वाली बातें या प्रशासनिक चूकें भी पलक झपकते ही बहुत बड़ा रूप ले लेती हैं और कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर संकट बन जाती हैं।
क्या है पूरा विवाद? वसीयत, मौत और कब्जे की उलझी कहानी
दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ें पारिवारिक वसीयत और करोड़ों की इस जमीन के मालिकाना हक से जुड़ी हैं। नैनीताल हाईकोर्ट में यह याचिका पीड़ित पक्ष के सिकंदर आलम खान द्वारा दायर की गई है। याचिका में दिए गए तथ्यों के अनुसार, किच्छा क्षेत्र के पिपलिया मोड़ पर स्थित इस विशाल फार्म हाउस का नाम ‘कुलसुम खान फार्म’ है।
इस फार्म हाउस पर दो पक्षों के बीच मालिकाना हक की जंग चल रही है। पहले पक्ष में देश की दिग्गज कांग्रेस नेता व सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की जेठानी सायरा वाड्रा और उनके चचेरे भाई सिकंदर आलम खान (याचिकाकर्ता) शामिल हैं। वहीं, दूसरे पक्ष में नसरीन सांगा नामक महिला हैं। याचिकाकर्ता सिकंदर खान का दावा है कि यह पूरी संपत्ति उनकी बुआ कुलसुम खान की थी। कुलसुम खान ने अपनी मृत्यु से पहले, साल 2024 में एक पंजीकृत वसीयत (रजिस्टर्ड विल) की थी, जिसमें उन्होंने इस पूरे फार्म हाउस का मालिकाना हक सायरा वाड्रा और सिकंदर आलम खान के नाम कर दिया था। इसके बाद, 18 दिसंबर 2025 को बुआ कुलसुम खान का इंतकाल हो गया।
प्रशासन की साठगांठ का आरोप और बेजुबानों पर संकट
मामले में मोड़ तब आया जब बुआ की मौत के बाद दूसरे पक्ष यानी उनकी बहन नसरीन सांगा को इस वसीयत की भनक लगी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि नसरीन सांगा कुछ बाहरी और रसूखदार लोगों को साथ लेकर अचानक फार्म हाउस पर आ धमकीं और स्थानीय पुलिस व प्रशासन की कथित मिलीभगत से पूरे फार्म हाउस पर जबरन कब्जा जमा लिया।
याचिका में लगाए गए आरोप बेहद गंभीर और मानवीय दृष्टिकोण से विचलित करने वाले हैं। सिकंदर खान ने आरोप लगाया कि कब्जे के दौरान फार्म हाउस में रह रहे पुरुषों को डरा-धमकाकर परिसर से बाहर खदेड़ दिया गया। लेकिन सबसे अमानवीय कृत्य यह हुआ कि वहां मौजूद महिलाओं, छोटे बच्चों और डेरी फार्म में बंधे बेजुबान मवेशियों (पशुओं) को जबरन बंधक बना लिया गया और उनके बाहर आने-जाने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई।
सिविल कोर्ट के स्टे को ठेंगा दिखाने का आरोप
पीड़ित पक्ष का कहना है कि उनके पास बुआ द्वारा की गई मूल पंजीकृत वसीयत मौजूद है और इसी के आधार पर उन्हें बीते 11 जून 2026 को सिविल कोर्ट से इस विवादित संपत्ति पर यथास्थिति बनाए रखने का स्थगन आदेश (स्टे) भी मिल चुका था। आरोप है कि स्थानीय पुलिस और विरोधी पक्ष ने सिविल कोर्ट के उस विधिक आदेश को पूरी तरह ठेंगा दिखा दिया और कानून की धज्जियां उड़ाते हुए नसरीन सांगा को फार्म पर काबिज करवा दिया।
इसी प्रशासनिक मनमानी और अदालत की अवहेलना के खिलाफ सिकंदर खान ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अब इस किच्छा फार्म हाउस विवाद में नैनीताल हाईकोर्ट के सीधे हस्तक्षेप और अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से तलब किए जाने के बाद स्थानीय प्रशासन बैकफुट पर दिखाई दे रहा है। कोर्ट के कड़े रुख के बाद पीड़ित पक्ष को सुरक्षा तो मिल गई है, लेकिन तीन हफ्ते बाद आने वाले राज्य सरकार के जवाब पर अब सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
