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ट्विशा शर्मा केस में जांच पर उठे गंभीर सवाल: पोस्टमार्टम में अहम सबूत (बेल्ट) न पहुंचने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर संदेह गहराया

भोपाल में सामने आए ट्विशा शर्मा मौत मामले ने अब एक नया और गंभीर मोड़ ले लिया है। जांच के दौरान पुलिस की एक बड़ी चूक उजागर होने के बाद पूरे मामले की निष्पक्षता और सबूतों की हैंडलिंग पर सवाल उठने लगे हैं। एम्स भोपाल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह सामने आया कि जिस बेल्ट को कथित तौर पर फांसी लगाने में इस्तेमाल किया गया था, वह पोस्टमार्टम के समय जांच अधिकारियों द्वारा उपलब्ध नहीं कराई गई। इस कारण डॉक्टर यह स्पष्ट रूप से नहीं जांच पाए कि महिला के गले पर मिले निशानों का मिलान उस कथित फंदे से हो सकता है या नहीं। इसी चूक ने पूरे केस को और अधिक संदिग्ध बना दिया है।

यह मामला तब और संवेदनशील हो गया जब मृतका के परिवार ने पुलिस और जांच एजेंसियों पर सबूतों से छेड़छाड़ और लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए। परिवार का कहना है कि यह केवल एक साधारण गलती नहीं हो सकती, बल्कि यह जांच को प्रभावित करने वाली गंभीर लापरवाही या जानबूझकर की गई चूक भी हो सकती है। इस घटना के बाद सोशल मीडिया से लेकर कानूनी हलकों तक न्याय और निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है।

ट्विशा शर्मा की मौत 12 मई को भोपाल के कटारा हिल्स इलाके में उनके ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी। शुरुआती जांच में इसे आत्महत्या का मामला बताया गया था, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, कई सवाल खड़े होने लगे। मृतका के परिवार ने पति समर्थ सिंह और ससुराल पक्ष पर मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न, दहेज प्रताड़ना और दबाव बनाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। परिवार का यह भी कहना है कि ट्विशा को लंबे समय से परेशान किया जा रहा था और शादी के बाद उसका व्यवहार और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हुए थे।

इस केस की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (SIT) का नेतृत्व सहायक पुलिस आयुक्त रजनीश कश्यप कर रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि जांच के दौरान सबूतों के प्रबंधन में गलती हुई थी। एसीपी ने बताया कि घटनास्थल से बेल्ट को बरामद किया गया था, लेकिन उसे पोस्टमार्टम प्रक्रिया के दौरान सही समय पर प्रस्तुत नहीं किया जा सका। हालांकि बाद में उसे फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी को भेज दिया गया और वर्तमान में यह सामग्री सुरक्षित रूप से एम्स भोपाल में रखी हुई है। अधिकारियों के अनुसार, फोरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद कई तथ्यों पर और स्पष्टता मिल सकेगी।

इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बिना पुलिस की औपचारिक मौजूदगी के शव को अस्पताल क्यों ले जाया गया। जांच अधिकारी अब इस पहलू की भी गहराई से जांच कर रहे हैं। पुलिस का कहना है कि घटनास्थल पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि घटनाक्रम किस क्रम में हुआ और किन परिस्थितियों में शव को स्थानांतरित किया गया।

परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों में यह भी कहा गया है कि ससुराल पक्ष ने जांच को प्रभावित करने की कोशिश की और सबूतों को कमजोर करने का प्रयास किया गया। मृतका के परिवार ने यह भी दावा किया कि ट्विशा लगातार मानसिक तनाव में थी और शादी के बाद उसका वजन लगभग 15 किलोग्राम तक कम हो गया था, जो उसके खराब मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की ओर संकेत करता है। परिवार का कहना है कि वह लगातार उन्हें मदद के लिए संदेश भेज रही थी और अपने हालात के बारे में संकेत देती रहती थी।

वहीं दूसरी ओर, ससुराल पक्ष की ओर से इन सभी आरोपों को खारिज किया गया है। रिटायर्ड जज और सह-आरोपी गिरिबाला सिंह ने दावा किया है कि ट्विशा को किसी प्रकार की प्रताड़ना नहीं दी गई थी और परिवार को नियमित रूप से आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। उन्होंने अपने बचाव में कुछ ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं, जिनमें ₹5,000 से ₹50,000 तक की राशि के लेनदेन का उल्लेख है।

इस मामले में कानूनी कार्रवाई भी तेज हो चुकी है। समर्थ सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है, जबकि उनकी मां को पहले ही अग्रिम जमानत मिल चुकी है। पुलिस ने समर्थ की गिरफ्तारी पर ₹10,000 का इनाम भी घोषित किया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जांच एजेंसियां इस मामले को गंभीरता से ले रही हैं।

हालांकि, जांच में सामने आई लापरवाही ने पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी फांसी या आत्महत्या के मामले में फॉरेंसिक सबूत बेहद महत्वपूर्ण होते हैं और यदि मुख्य सबूत जैसे फंदा या बेल्ट पोस्टमार्टम के समय उपलब्ध न हो, तो जांच की दिशा प्रभावित हो सकती है। इसी कारण अब इस केस को और अधिक सावधानी से हैंडल किया जा रहा है।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और सभी पहलुओं की गहराई से जांच की जा रही है। सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल चैट रिकॉर्ड, मेडिकल रिपोर्ट और फोरेंसिक विश्लेषण के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। अधिकारियों ने यह भी कहा है कि यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही या गलत हैंडलिंग साबित होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर कानून व्यवस्था और जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ परिवार न्याय की मांग कर रहा है, तो दूसरी तरफ पुलिस अपनी जांच को सही दिशा में आगे बढ़ाने की बात कह रही है। आने वाले दिनों में फोरेंसिक रिपोर्ट और तकनीकी सबूत इस केस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

कुल मिलाकर, ट्विशा शर्मा मामला अब सिर्फ एक संदिग्ध मौत का केस नहीं रहा, बल्कि यह जांच प्रणाली, सबूतों की हैंडलिंग और न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर एक बड़ा सवाल बन गया है। यदि जांच में पारदर्शिता और सख्ती नहीं दिखाई गई, तो यह मामला और अधिक विवादों में घिर सकता है और न्याय की प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकती है।

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