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Reading: नैनीताल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 13 साल से क्यों खाली है लोकायुक्त का पद? सरकार को दिया जून तक का अल्टीमेटम
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उत्तराखंडफीचर्ड

नैनीताल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 13 साल से क्यों खाली है लोकायुक्त का पद? सरकार को दिया जून तक का अल्टीमेटम

The Hill India News
Last updated: May 15, 2026 12:41 pm
The Hill India News
Published: May 15, 2026
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नैनीताल। उत्तराखंड में लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद अब कानूनी रूप से बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य में लोकायुक्त की नियुक्ति न होने पर सरकार के ढुलमुल रवैये को लेकर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सरकार से तीखे सवाल पूछते हुए पूछा है कि आखिर अदालती आदेशों के बावजूद अब तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति क्यों नहीं हुई?

Contents
कोर्ट रूम ड्रामा: जब आधे घंटे में रिपोर्ट मांगने पर मजबूर हुआ हाईकोर्टकोरम की कमी और तारीख पर तारीख का खेल₹3 करोड़ का सालाना खर्च, फिर भी संस्था निष्क्रिय‘पिंजरे में बंद तोता’ बनीं राज्य की जांच एजेंसियांकर्नाटक और मध्य प्रदेश का दिया उदाहरण

साल 2013 से खाली पड़े इस महत्वपूर्ण संवैधानिक पद को लेकर अदालत की तल्खी इस कदर थी कि सुनवाई के दौरान सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए महज आधे घंटे का समय दिया गया। इसके बाद सरकार ने कोर्ट को अवगत कराया कि लोकायुक्त चयन के लिए गठित सर्च कमेटी की पहली आधिकारिक बैठक जून के पहले सप्ताह में आयोजित की जाएगी। अदालत ने इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 जून की तिथि तय की है और तब तक सर्च कमेटी के निर्णयों की प्रगति रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है।


कोर्ट रूम ड्रामा: जब आधे घंटे में रिपोर्ट मांगने पर मजबूर हुआ हाईकोर्ट

शुक्रवार को सुबह 11 बजे जैसे ही मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ के समक्ष इस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई शुरू हुई, कोर्ट ने सबसे पहले सरकार से पूर्व में दिए गए आदेशों पर अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) मांगी। सरकार की ओर से पैरवी कर रहे महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि लोकायुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया गतिमान है, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह कार्रवाई फिलहाल धीमी गति से चल रही है। महाधिवक्ता ने चयन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अदालत से कुछ और समय की मांग की।

सरकार के इस तर्क पर हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया। खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए सरकार को केवल 30 मिनट का समय दिया और साफ कहा कि वे आधे घंटे के भीतर कोर्ट को यह बताएं कि आखिरकार आदेशों का पालन समय पर क्यों नहीं किया जा रहा है और सर्च कमेटी की अगली बैठक कब होने वाली है।

अदालत के इस कड़े रुख के बाद बैकफुट पर आई सरकार ने आधे घंटे बाद दोबारा शुरू हुई सुनवाई में स्थिति स्पष्ट की। सरकार ने आधिकारिक रूप से कोर्ट को आश्वस्त किया कि सर्च कमेटी की पहली बैठक जून महीने के प्रथम सप्ताह में आयोजित कर ली जाएगी। इस आश्वासन के बाद कोर्ट ने सरकार को 16 जून तक की मोहलत दी है, जिसमें सर्च कमेटी द्वारा लिए गए सभी फैसलों को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।


कोरम की कमी और तारीख पर तारीख का खेल

यह मामला उत्तराखंड सरकार के लिए इसलिए भी असहज करने वाला है क्योंकि बीती 13 मई को भी हाईकोर्ट ने सर्च कमेटी की बैठकें आयोजित न होने पर गहरी आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम देकर 15 मई तक हर हाल में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था, जिसके क्रम में यह सुनवाई हुई।

अदालती दस्तावेजों के अनुसार, इससे पहले की सुनवाई में कोर्ट ने सरकार को 3 अप्रैल को होने वाली सर्च कमेटी की बैठक का निर्णय शपथ पत्र के माध्यम से पेश करने को कहा था। परंतु, सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि 3 अप्रैल को कोरम (न्यूनतम आवश्यक सदस्यों की संख्या) पूरा न होने के कारण सर्च कमेटी की बैठक ही आयोजित नहीं की जा सकी।

यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने इस मामले में समय मांगा हो। इससे पहले राज्य सरकार ने लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए सीधे 6 महीने का समय मांगा था, जिसे अदालत ने खारिज करते हुए केवल 3 महीने का समय दिया था। याचिकाकर्ता का आरोप है कि एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी धरातल पर कोई प्रगति नहीं हुई है और सरकार केवल समय बढ़ाने की मांग करती आ रही है।


₹3 करोड़ का सालाना खर्च, फिर भी संस्था निष्क्रिय

यह पूरा मामला हल्द्वानी के गौलापार निवासी आरटीआई कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता रवि शंकर जोशी द्वारा वर्ष 2021 में दायर की गई एक जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने उत्तराखंड में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाली सबसे बड़ी संस्था के निष्क्रिय होने पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

याचिका में दावा किया गया है कि उत्तराखंड में साल 2013 से लोकायुक्त का पद पूरी तरह से रिक्त पड़ा हुआ है। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पद खाली होने और संस्था के निष्क्रिय होने के बावजूद, लोकायुक्त संस्थान के बुनियादी ढांचे, कार्यालय और प्रशासनिक अमले के नाम पर राज्य के खजाने से हर साल 2 से 3 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। बिना किसी काम और नियुक्ति के जनता के पैसे की यह बर्बादी राज्य की प्रशासनिक नीति पर बड़े सवाल खड़े करती है।


‘पिंजरे में बंद तोता’ बनीं राज्य की जांच एजेंसियां

याचिकाकर्ता रवि शंकर जोशी ने अपनी याचिका में उत्तराखंड की वर्तमान सतर्कता और जांच व्यवस्था पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। याचिका के अनुसार, वर्तमान में उत्तराखंड के भीतर काम कर रही तमाम जांच एजेंसियां पूरी तरह से राज्य सरकार और राजनीतिक नेतृत्व के नियंत्रण में हैं।

  • स्वतंत्रता का अभाव: राज्य में वर्तमान में ऐसी कोई भी स्वतंत्र एजेंसी नहीं है जो बिना शासन की पूर्वानुमति (Prior Sanction) के किसी भी राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज कर सके।

  • विजिलेंस पर नियंत्रण: भ्रष्टाचार के खिलाफ निष्पक्ष जांच का दावा करने वाला विजिलेंस विभाग भी वास्तव में पुलिस महकमे का ही एक हिस्सा है। इसका सीधा नियंत्रण पुलिस मुख्यालय, सतर्कता विभाग और अंतिम रूप से मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के पास रहता है। ऐसे में किसी भी बड़े राजनीतिक या प्रशासनिक भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना बेमानी है।


कर्नाटक और मध्य प्रदेश का दिया उदाहरण

याचिका में उत्तराखंड की तुलना कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से की गई है, जहां लोकायुक्त बेहद शक्तिशाली और स्वतंत्र संस्था के रूप में कार्य कर रहे हैं। इन राज्यों में लोकायुक्त को यह स्वायत्तता प्राप्त है कि वे बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के बड़े से बड़े अधिकारियों और मंत्रियों के खिलाफ भी त्वरित कार्रवाई कर सकते हैं।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि उत्तराखंड में भी एक सशक्त और स्वतंत्र लोकायुक्त की नियुक्ति हो जाती है, तो राज्य में पनप रहे भ्रष्टाचार और विभिन्न विभागों में होने वाले घोटालों पर कड़ा प्रहार किया जा सकेगा। इसके अलावा, एक मजबूत लोकायुक्त होने से छोटे-छोटे प्रशासनिक मामलों को लेकर नागरिकों को हाईकोर्ट नहीं भागना पड़ेगा, जिससे अंततः उच्च न्यायालयों के बढ़ते कार्यभार और मुकदमों के बोझ में भी बड़ी कमी आएगी। अब सभी की नजरें जून के पहले हफ्ते में होने वाली सर्च कमेटी की बैठक और 16 जून को हाईकोर्ट में होने वाली अगली बड़ी सुनवाई पर टिकी हैं।

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