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जीते-जी अपनी ही तेहरवीं कर रहा शिवपुरी का बुजुर्ग, अपनों की बेरुखी ने तोड़ दिया दिल

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया है। यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक रिश्तों और बुढ़ापे में बढ़ती उपेक्षा की दर्दनाक तस्वीर भी बनकर सामने आया है। करैरा तहसील के हाजीनगर गांव में रहने वाले बुजुर्ग कल्याण सिंह पाल ने जीते-जी अपनी ही त्रयोदशी यानी तेहरवीं का आयोजन करने का फैसला किया है। इतना ही नहीं, वे खुद गांव-गांव जाकर लोगों को अपनी “मौत का निमंत्रण” बांट रहे हैं। इस अनोखे लेकिन बेहद भावुक घटनाक्रम ने पूरे इलाके में चर्चा छेड़ दी है।

बताया जा रहा है कि 16 मई 2026 को होने वाले इस आयोजन के लिए बाकायदा कार्ड छपवाए गए हैं। कार्ड में लिखी पंक्तियां हर किसी को सोचने पर मजबूर कर रही हैं। कार्ड पर लिखा है— “मुझे तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था, मेरी कश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था।” इन शब्दों में एक पिता का दर्द, अकेलापन और अपने ही रिश्तों से मिली बेवफाई साफ झलक रही है।

आमतौर पर किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद परिवार वाले शोक संदेश बांटते हैं और तेहरवीं का आयोजन करते हैं, लेकिन यहां तस्वीर बिल्कुल उलट है। कल्याण सिंह पाल खुद अपने हाथों से लोगों को कार्ड देकर कार्यक्रम में आने का निमंत्रण दे रहे हैं। गांव के लोग भी इस पूरे घटनाक्रम को देखकर हैरान हैं। सोशल मीडिया पर जब यह कार्ड वायरल हुआ तो लोगों ने इसे टूटते पारिवारिक रिश्तों का सबसे बड़ा उदाहरण बताया।

जानकारी के अनुसार, कल्याण सिंह पाल लंबे समय से अपने परिवार के व्यवहार से आहत हैं। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा परिवार और बच्चों की खुशियों के लिए समर्पित कर दिया, लेकिन बुढ़ापे में उन्हें वही अपनापन नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी। यही वजह है कि उन्होंने यह कदम उठाने का फैसला किया। उनका कहना है कि उन्हें डर है कि मरने के बाद शायद कोई उनकी तेहरवीं भी न करे, इसलिए वे अपनी मौजूदगी में ही यह रस्म पूरी कर लेना चाहते हैं।

जब मीडिया ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की तो उनकी आवाज में गहरा दर्द महसूस किया गया। उन्होंने कहा कि अब इस दुनिया में उनका कोई नहीं बचा है। वे बेहद अकेला महसूस करते हैं और अपनों की बेरुखी ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया है। गांव के कई लोगों ने भी माना कि बुजुर्ग काफी समय से मानसिक रूप से परेशान चल रहे हैं और परिवार के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं हैं।

इस घटना ने पूरे समाज को एक बड़ा संदेश दिया है। आज के आधुनिक दौर में जहां लोग भौतिक सुख-सुविधाओं और व्यस्त जीवन में उलझते जा रहे हैं, वहीं पारिवारिक रिश्तों की गर्माहट कहीं न कहीं कम होती दिखाई दे रही है। माता-पिता, जिन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए पूरी जिंदगी मेहनत की, वही बुजुर्ग आज कई बार अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। शिवपुरी की यह घटना इसी बदलती सामाजिक सच्चाई को उजागर करती है।

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि पहले परिवारों में बड़ों का सम्मान सबसे बड़ी परंपरा मानी जाती थी। संयुक्त परिवारों में बुजुर्गों की राय को अहमियत दी जाती थी, लेकिन अब समय बदल गया है। नई पीढ़ी अपनी दुनिया में इतनी व्यस्त हो गई है कि कई बार माता-पिता भावनात्मक रूप से अकेले पड़ जाते हैं। यही अकेलापन धीरे-धीरे उन्हें मानसिक रूप से तोड़ देता है।

सोशल मीडिया पर भी इस खबर को लेकर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई लोग कल्याण सिंह पाल के प्रति सहानुभूति जता रहे हैं तो कुछ लोग इसे समाज के लिए चेतावनी बता रहे हैं। लोगों का कहना है कि अगर परिवारों में संवाद और सम्मान खत्म हो गया तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं।

यह मामला केवल एक व्यक्ति के दर्द की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों बुजुर्गों की आवाज भी है जो अपने ही घर में खुद को अकेला महसूस करते हैं। कल्याण सिंह पाल द्वारा जीते-जी अपनी तेहरवीं का आयोजन करना एक भावनात्मक विरोध भी माना जा रहा है। यह कदम समाज को झकझोरने वाला है और रिश्तों की अहमियत को फिर से समझने की जरूरत की ओर इशारा करता है।

शिवपुरी के हाजीनगर गांव में होने वाला यह आयोजन अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन चुका है। लोग इसे एक दुखद लेकिन आंखें खोल देने वाली घटना मान रहे हैं। इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आधुनिक जीवन की दौड़ में इंसान अपने सबसे करीबी रिश्तों को ही पीछे छोड़ता जा रहा है? अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में रिश्तों की गर्माहट केवल कहानियों और यादों तक ही सीमित होकर रह जाएगी।

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