
नैनीताल: उत्तराखंड के चर्चित 2001 पुलिस उपनिरीक्षक (SI) भर्ती घोटाले में पूर्व अपर पुलिस महानिदेशक (ADG) राकेश मित्तल की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। नैनीताल हाईकोर्ट ने राकेश मित्तल द्वारा दायर उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने मामले में दो अन्य व्यक्तियों को सह-आरोपी के रूप में समन करने की गुहार लगाई थी।
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि निचली अदालत का फैसला पूरी तरह कानून सम्मत है। हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब इस दशकों पुराने भ्रष्टाचार के मामले में मित्तल की घेराबंदी और मजबूत होती दिख रही है।
निचली अदालत के फैसले पर हाईकोर्ट की मुहर
अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि विशेष न्यायाधीश सीबीआई (भ्रष्टाचार निवारण) देहरादून की अदालत द्वारा 30 जनवरी 2025 को राकेश मित्तल के आवेदन को खारिज करने का निर्णय न्यायसंगत था। हाईकोर्ट ने माना कि मामले के तथ्यों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप की कोई भी आवश्यकता नहीं है। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में शामिल करने के लिए ठोस आधार होना अनिवार्य है, जो इस मामले में नदारद था।
क्या है 2001 का बहुचर्चित दरोगा भर्ती घोटाला?
मामले की जड़ें साल 2001 में हुई 273 पुलिस उपनिरीक्षकों की सीधी भर्ती से जुड़ी हैं। उस समय उत्तराखंड पुलिस विभाग में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। आरोप था कि चयन प्रक्रिया के दौरान अभ्यर्थियों के अंकों में हेरफेर की गई और अपात्र लोगों को लाभ पहुँचाया गया।
उस दौरान राकेश मित्तल चयन समिति के अध्यक्ष पद पर तैनात थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई थी। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में मित्तल और अन्य पर ओएमआर शीट (OMR) और अंकों में हेरफेर करने के गंभीर आरोप लगाए थे। जांच एजेंसी का दावा था कि इस पूरी प्रक्रिया में पद का दुरुपयोग और आर्थिक भ्रष्टाचार किया गया।
साजिश का आरोप और मित्तल के तर्क
राकेश मित्तल ने अपनी याचिका में एक नया मोड़ देने की कोशिश की थी। उन्होंने अदालत के समक्ष तर्क दिया था कि वे खुद एक गहरी साजिश के शिकार हुए हैं। मित्तल का आरोप था कि उन्हें तत्कालीन समय में पुलिस महानिदेशक (DGP) बनने से रोकने के लिए यह पूरा ताना-बाना बुना गया था।
उन्होंने तत्कालीन पुलिस अधिकारी एबी लाल और जीसी पंत पर निशाना साधते हुए दावा किया कि ये दोनों अधिकारी आईआईटी रुड़की (IIT Roorkee) में ओएमआर शीट के मूल्यांकन के दौरान अनधिकृत रूप से मौजूद थे। मित्तल के अनुसार, इन व्यक्तियों ने अंकों के साथ छेड़छाड़ की और डेटा वाली एक ‘फ्लॉपी’ अपने अवैध कब्जे में रखी थी। याचिका में यह भी कहा गया कि मित्तल को जानबूझकर मूल्यांकन प्रक्रिया से दूर रखा गया ताकि उन्हें फंसाया जा सके।
सीबीआई की दलील और एफएसएल रिपोर्ट का खुलासा
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सीबीआई और प्रतिवादियों के वकीलों ने मित्तल के दावों की धज्जियां उड़ा दीं। सीबीआई ने अदालत को वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर बताया कि फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट मित्तल के खिलाफ सबसे बड़ा सबूत है।
जांच में यह पाया गया कि फ्लॉपी का डेटा सबसे पहले राकेश मित्तल के व्यक्तिगत लैपटॉप पर ही कॉपी किया गया था। चौंकाने वाली बात यह थी कि उनके लैपटॉप में मूल अंक और परिवर्तित (छेड़छाड़ किए गए) अंक, दोनों तरह का डेटा मौजूद पाया गया। वहीं, एबी लाल और जीसी पंत की मौजूदगी को लेकर सीबीआई ने स्पष्ट किया कि वे वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशानुसार और अपनी आधिकारिक ड्यूटी के तहत वहां मौजूद थे, न कि किसी निजी स्वार्थ के लिए।
न्यायालय की तल्ख टिप्पणी: ‘दावे निराधार’
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित ने अपने आदेश में कानूनी बिंदु को स्पष्ट करते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 319 के तहत किसी भी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी बनाने के लिए ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) साक्ष्य से कहीं अधिक मजबूत और पुख्ता सबूतों की जरूरत होती है।
अदालत ने पाया कि राकेश मित्तल पुनरीक्षण याचिका खारिज किए जाने योग्य है क्योंकि याचिकाकर्ता के आरोप केवल मौखिक और निराधार दावे प्रतीत होते हैं। रिकॉर्ड पर मौजूद गवाहों के बयान और वैज्ञानिक रिपोर्ट मित्तल के आरोपों की पुष्टि नहीं करते, बल्कि उनके स्वयं के शामिल होने की ओर इशारा करते हैं।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब देहरादून की विशेष सीबीआई अदालत में मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी। उत्तराखंड के प्रशासनिक और पुलिस हलकों में इस फैसले की काफी चर्चा है, क्योंकि यह मामला राज्य के सबसे पुराने और बड़े भर्ती घोटालों में से एक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद अब राकेश मित्तल के पास कानूनी विकल्प बेहद सीमित रह गए हैं। वहीं, इस आदेश ने भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता को एक बार फिर से रेखांकित किया है।



