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Reading: विशेष रिपोर्ट: बेखौफ बचपन और खूनी गलियां; भारत में क्यों ‘गैंगस्टर’ बन रहे हैं नाबालिग? NCRB के आंकड़ों ने उड़ाई नींद
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विशेष रिपोर्ट: बेखौफ बचपन और खूनी गलियां; भारत में क्यों ‘गैंगस्टर’ बन रहे हैं नाबालिग? NCRB के आंकड़ों ने उड़ाई नींद

The Hill India News
Last updated: May 10, 2026 3:31 am
The Hill India News
Published: May 10, 2026
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में जब एक 6 साल की मासूम के साथ तीन नाबालिगों द्वारा की गई हैवानियत की खबर सामने आती है, तो रूह कांप जाती है। वहीं नागपुर में महज 100 रुपये के मामूली विवाद में 13 किशोर मिलकर एक युवक की हत्या कर देते हैं। ये घटनाएं अपवाद नहीं, बल्कि एक डरावने ट्रेंड का हिस्सा बन चुकी हैं। भारत में बचपन अब केवल खेल-कूद और शिक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अपराध की दुनिया में ‘जुवेनाइल एंट्री’ ने समाज और सरकार दोनों की नींद उड़ा दी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के ताजा आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि हमारे देश में नाबालिगों के बीच हिंसक प्रवृत्ति तेजी से घर कर रही है।

Contents
चिंताजनक आंकड़े: 2024 में अपराध का ‘ग्राफ’हर दिन 6 संगीन वारदातों में शामिल ‘बच्चे’भ्रांतियों का अंत: पढ़े-लिखे और संपन्न परिवारों के बच्चे भी निशाने परन्यायिक प्रक्रिया और सुधार की गुंजाइशआखिर क्यों अपराधी बन रहे हैं मासूम?सुधार की राह: क्या है समाधान?

चिंताजनक आंकड़े: 2024 में अपराध का ‘ग्राफ’

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की नवीनतम रिपोर्ट एक विरोधाभास पेश करती है। एक तरफ जहां 2024 में कुल दर्ज आपराधिक मामलों में 2023 की तुलना में 6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, वहीं दूसरी तरफ नाबालिगों द्वारा किए जाने वाले अपराधों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में नाबालिगों के खिलाफ दर्ज मामलों में 14% से अधिक की वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2022 में यह आंकड़ा 30,555 था, जो 2024 में बढ़कर 34,878 तक पहुंच गया। सबसे ज्यादा डराने वाली बात यह है कि ये किशोर केवल छोटी-मोटी चोरी या छीना-झपटी तक सीमित नहीं हैं; ये अब मर्डर, रेप, किडनैपिंग और लूटपाट जैसे जघन्य (Heinous) अपराधों में सक्रिय रूप से शामिल हो रहे हैं।

हर दिन 6 संगीन वारदातों में शामिल ‘बच्चे’

जब हम किशोर अपराध के आंकड़े भारत के संदर्भ में देखते हैं, तो औसत प्रति दिन की गणना रोंगटे खड़े कर देती है। 2024 की रिपोर्ट बताती है कि:

  • हत्या (Murder): साल भर में 1,120 मामले दर्ज हुए, यानी हर दिन औसतन 3 कत्ल के मामलों में आरोपी नाबालिग थे।

  • बलात्कार (Rape): साल भर में 1,067 मामले दर्ज किए गए, यानी हर दिन औसतन 3 नाबालिगों पर रेप के आरोप लगे।

  • महिलाओं एवं बच्चों के विरुद्ध अपराध: कुल 2,557 मामलों में नाबालिगों को आरोपी बनाया गया।

  • अन्य संगीन मामले: किडनैपिंग और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर अपराधों में 8,943 किशोरों की संलिप्तता पाई गई।

भ्रांतियों का अंत: पढ़े-लिखे और संपन्न परिवारों के बच्चे भी निशाने पर

अक्सर समाज में यह धारणा रही है कि गरीबी, अशिक्षा और बेघर होना बच्चों को अपराध की ओर धकेलता है। लेकिन NCRB की रिपोर्ट इस स्टीरियोटाइप को पूरी तरह तोड़ देती है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि गिरफ्तार होने वाले अधिकांश नाबालिग ‘ठीक-ठाक’ सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं।

  1. शिक्षा का स्तर: 2024 में गिरफ्तार किए गए कुल 42,633 नाबालिगों में से केवल 2,857 ही अनपढ़ थे। इसके विपरीत, 21,068 आरोपी 5वीं से 10वीं तक पढ़े थे और करीब 9,700 से ज्यादा आरोपी 10वीं पास या उससे ऊपर की शिक्षा प्राप्त कर चुके थे।

  2. पारिवारिक परिवेश: आंकड़ों के अनुसार, 42,633 गिरफ्तार किशोरों में से 36,905 (लगभग 86%) अपने माता-पिता के साथ रह रहे थे। केवल 2,216 ही ऐसे थे जो बेघर थे या जिनके माता-पिता नहीं थे। यह दर्शाता है कि घर की चारदीवारी के भीतर भी कुछ ऐसा घट रहा है जो बच्चों को अपराधी बना रहा है।

न्यायिक प्रक्रिया और सुधार की गुंजाइश

भारत में नाबालिगों के लिए ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ के तहत विशेष प्रावधान हैं। निर्भया कांड के बाद कानून में संशोधन कर 16 से 18 वर्ष के किशोरों के लिए जघन्य अपराधों में वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का प्रावधान किया गया। हालांकि, आंकड़ों से पता चलता है कि सिस्टम अभी भी ‘सुधार’ पर अधिक जोर देता है।

2024 में निपटाए गए 37,256 मामलों में से लगभग 48% (17,977) नाबालिगों को केवल चेतावनी देकर या समझा-बुझाकर घर भेज दिया गया। वहीं, करीब 10,286 को सुधार गृह (Observation Home) भेजा गया और केवल 927 को ही जेल (Heinous Crimes के तहत) भेजा गया। दोष सिद्धि की दर (Conviction Rate) 87.3% के करीब है, जो बताती है कि पुलिस की जांच और सबूतों का पक्ष मजबूत रहता है।

आखिर क्यों अपराधी बन रहे हैं मासूम?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विभिन्न मनोवैज्ञानिक अध्ययनों ने किशोरों में बढ़ती हिंसा के कई गहरे कारण बताए हैं:

  • पारिवारिक माहौल: यदि घर में माता-पिता के बीच हिंसा होती है, या पिता शराब पीकर मारपीट करता है, तो बच्चा हिंसा को समस्याओं के समाधान का एकमात्र तरीका समझने लगता है।

  • नशे की लत: नशीली चीजों की आसान उपलब्धता किशोरों को अपराध की पहली सीढ़ी पर खड़ा कर देती है। नशे की पूर्ति के लिए पैसे जुटाने के चक्कर में वे लूट और हत्या तक कर बैठते हैं।

  • डिजिटल प्रभाव और संगति: सोशल मीडिया पर ‘गैंगस्टर कल्चर’ का महिमामंडन और आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों के साथ उठना-बैठना किशोरों को काल्पनिक ‘स्वैग’ की दुनिया में ले जाता है।

  • आर्थिक गैर-बराबरी: संपन्नता और दरिद्रता के बीच की गहरी खाई बच्चों के मन में कुंठा (Frustration) पैदा करती है। अपनी जरूरतों या भड़ास को निकालने के लिए वे हिंसा का सहारा लेते हैं।

सुधार की राह: क्या है समाधान?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सख्त कानून बनाने से किशोर अपराध के आंकड़े भारत में कम नहीं होंगे। इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

  1. स्कूली स्तर पर काउंसलिंग: स्कूलों में केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ पर काम होना चाहिए।

  2. शहरी वातावरण में सुधार: झुग्गी-बस्तियों और संवेदनशील इलाकों में सामुदायिक केंद्रों और खेलों को बढ़ावा देना चाहिए ताकि बच्चों की ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगे।

  3. माता-पिता की जिम्मेदारी: बच्चों के साथ ‘क्वालिटी टाइम’ बिताना और उनके व्यवहार में आ रहे बदलावों को पहचानना माता-पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

  4. नशे के नेटवर्क पर चोट: सरकार को किशोरों तक पहुंचने वाले ड्रग्स और शराब के अवैध व्यापार को पूरी तरह ध्वस्त करना होगा।

नाबालिगों का अपराध की ओर बढ़ना केवल एक सांख्यिकीय वृद्धि नहीं है, बल्कि यह हमारे सामाजिक ताने-बाने के कमजोर होने का संकेत है। आंकड़े साफ कर चुके हैं कि अपराध का संबंध अब गरीबी या अशिक्षा से उतना नहीं है जितना कि गिरते नैतिक मूल्यों और पारिवारिक उपेक्षा से है। यदि समय रहते समाज और अभिभावक नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य और भी अंधकारमय हो सकता है। ‘नशामुक्त’ और ‘हिंसामुक्त’ बचपन ही एक स्वस्थ भारत की नींव रख सकता है।

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