
तमिलनाडु की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद जारी सियासी घमासान अब और तेज हो गया है। एएमएमके प्रमुख टीटीवी दिनाकरन ने अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके को समर्थन देने से साफ इनकार कर दिया है। इतना ही नहीं, दिनाकरन ने टीवीके पर उनकी पार्टी के इकलौते विधायक को तोड़ने और विधायकों की खरीद-फरोख्त करने का गंभीर आरोप भी लगाया है। इस घटनाक्रम ने तमिलनाडु में सरकार गठन की प्रक्रिया को और उलझा दिया है।
चेन्नई में गुरुवार देर रात राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर से मुलाकात के बाद दिनाकरन ने कहा कि उनकी पार्टी एआईएडीएमके को समर्थन देगी और राज्यपाल को एआईएडीएमके को सरकार बनाने का न्योता देना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि टीवीके के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है और केवल सबसे बड़ी पार्टी होने के आधार पर सरकार बनाने का अधिकार नहीं मिल जाता।
दरअसल, तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में विजय के नेतृत्व वाली टीवीके ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 108 सीटें जीती थीं, लेकिन बहुमत के आंकड़े से वह 10 सीट पीछे रह गई। राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में विजय लगातार अन्य दलों और निर्दलीय विधायकों से संपर्क कर समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच एएमएमके के रुख ने सियासी समीकरण बदल दिए हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा एएमएमके के इकलौते विधायक कामराज के अचानक लापता होने को लेकर हो रही है। दिनाकरन ने दावा किया कि उनके विधायक संदिग्ध परिस्थितियों में गायब हो गए हैं और उन्हें शक है कि यह विधायकों की खरीद-फरोख्त का मामला हो सकता है। उन्होंने कहा कि कामराज से फोन पर भी संपर्क नहीं हो पा रहा है। दिनाकरन ने राज्यपाल से इस पूरे मामले की तत्काल जांच कराने की मांग की है।
पत्रकारों से बातचीत में दिनाकरन ने कहा कि कामराज गुरुवार सुबह उनके घर आए थे। उस दौरान उन्होंने बताया था कि वह एआईएडीएमके विधायकों से मिलने के लिए पुडुचेरी जा रहे हैं। दिनाकरन के मुताबिक, उनके सहायक ने कामराज से कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी करवाए थे और उस समय विधायक सामान्य तरीके से बातचीत कर रहे थे। लेकिन उसके बाद से उनका कोई पता नहीं चल पा रहा है।
दिनाकरन ने सीधे तौर पर टीवीके पर निशाना साधते हुए कहा कि जो पार्टी खुद को “स्वच्छ राजनीति” का प्रतीक बताती है, वही सत्ता के लिए विधायकों को तोड़ने में जुटी हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीवीके पहले दिन से ही राजनीतिक जोड़तोड़ में लगी हुई है। दिनाकरन ने कहा, “लोगों ने विजय को 108 सीटें दी हैं, लेकिन सिर्फ इतना समर्थन सरकार बनाने के लिए काफी नहीं है। नैतिक राजनीति की बात करने वाली पार्टी अगर विधायकों की खरीद-फरोख्त करे तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।”
तमिलनाडु की राजनीति में यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि विजय ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और उनकी पार्टी ने उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। चुनाव नतीजों के बाद टीवीके ने वामपंथी दलों और अन्य सहयोगी दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश तेज कर दी थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी भाकपा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी माकपा ने विजय को समर्थन देने का संकेत दिया है। दोनों दलों के विधानसभा में दो-दो विधायक हैं।
इसके अलावा विजय ने वीसीके और द्रमुक गठबंधन के कुछ सहयोगी दलों से भी संपर्क किया था। हालांकि अभी तक सभी दलों ने खुलकर समर्थन की घोषणा नहीं की है। वीसीके की ओर से अंतिम फैसला आना बाकी है, जिस पर सबकी नजर बनी हुई है। अगर वीसीके टीवीके का समर्थन करती है तो विजय की स्थिति कुछ मजबूत हो सकती है, लेकिन अभी भी बहुमत का आंकड़ा हासिल करना आसान नहीं दिख रहा।
दूसरी ओर एआईएडीएमके भी सरकार बनाने के लिए सक्रिय हो गई है। पार्टी का दावा है कि टीवीके के पास बहुमत नहीं है और राज्यपाल को संवैधानिक परंपराओं के अनुसार सबसे स्थिर विकल्प को सरकार बनाने का मौका देना चाहिए। दिनाकरन का समर्थन मिलने के बाद एआईएडीएमके का मनोबल बढ़ा है।
राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने फिलहाल स्पष्ट बहुमत न होने का हवाला देते हुए विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने से इनकार कर दिया है। ऐसे में तमिलनाडु में राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है। आने वाले दिनों में छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका बेहद अहम होने वाली है।
तमिलनाडु की राजनीति में यह घटनाक्रम कई बड़े सवाल भी खड़े कर रहा है। क्या विजय पहली ही कोशिश में सरकार बना पाएंगे? क्या एआईएडीएमके सत्ता में वापसी कर सकती है? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि एएमएमके विधायक कामराज आखिर कहां हैं? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति की दिशा तय करेंगे।



