
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की राजनीति ने एक बार फिर विपक्षी INDIA गठबंधन के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है। बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की चुनावी हार के बाद अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या विपक्षी दलों का यह गठबंधन 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक मजबूती से टिक पाएगा या फिर राज्यों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं इसे कमजोर कर देंगी।
दरअसल, INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा से यही रही है कि इसके घटक दल राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, लेकिन केंद्र की राजनीति में बीजेपी के खिलाफ साथ खड़े नजर आते हैं। अब यही विरोधाभास खुलकर सामने आने लगा है। कांग्रेस की रणनीति को लेकर सहयोगी दलों में असहजता बढ़ रही है और आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी दिखाई दे सकता है।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया। राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी सरकार पर तीखे हमले किए और भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलता तथा लोकतंत्र को कमजोर करने जैसे आरोप लगाए। कांग्रेस ने राज्य की 292 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर साफ संकेत दिया कि वह बंगाल में अपनी जमीन दोबारा मजबूत करना चाहती है। हालांकि चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस का रवैया कुछ नरम दिखाई देने लगा है। राहुल गांधी ने बंगाल में बीजेपी पर “वोट चोरी” और “सरकार चोरी” जैसे आरोप लगाए, जिससे यह संदेश गया कि राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकता अभी भी कांग्रेस की प्राथमिकता बनी हुई है।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का कोलकाता पहुंचना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इससे यह तस्वीर पेश करने की कोशिश हुई कि विपक्ष अभी भी एकजुट है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह एकजुटता केवल संसद और राष्ट्रीय राजनीति तक सीमित रह सकती है, क्योंकि राज्यों में दलों की महत्वाकांक्षाएं अलग-अलग हैं।
तमिलनाडु में स्थिति और ज्यादा जटिल दिखाई दे रही है। यहां कांग्रेस और डीएमके लंबे समय से सहयोगी रहे हैं। लोकसभा चुनाव में भी दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन अब कांग्रेस के अभिनेता-राजनेता विजय के साथ जाने की अटकलों ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। चर्चा है कि कांग्रेस का एक धड़ा डीएमके से दूरी बनाकर विजय की पार्टी के साथ नई राजनीतिक संभावनाएं तलाशना चाहता है।
अगर ऐसा होता है तो इसका असर सीधे संसद की राजनीति पर पड़ेगा। डीएमके के लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 8 सांसद हैं, जो अब तक कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहे हैं। कांग्रेस यदि डीएमके से दूरी बनाती है तो संसद में विपक्षी एकता कमजोर हो सकती है। हालांकि कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि विजय के साथ गठबंधन बनाकर पार्टी तमिलनाडु में नई ऊर्जा के साथ उभर सकती है और भविष्य में राज्य की सभी 39 लोकसभा सीटों पर मजबूत दावेदारी पेश कर सकती है।
कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद रहे हैं। तमिलनाडु कांग्रेस के कई नेता पहले से डीएमके के साथ गठबंधन को लेकर असहज थे। उनका मानना था कि डीएमके के साथ रहने से कांग्रेस की स्वतंत्र पहचान कमजोर हो रही है। लेकिन राहुल गांधी ने गठबंधन की राजनीति को प्राथमिकता दी और अंततः डीएमके के साथ चुनावी समझौता हुआ। अब जबकि राजनीतिक परिस्थितियां बदल रही हैं, कांग्रेस फिर से अपने विकल्प तलाशती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस की यह रणनीति “राज्यों में प्रतिस्पर्धा और केंद्र में सहयोग” की नीति पर आधारित है। हालांकि विपक्षी दल इसे अवसरवादी राजनीति भी बता सकते हैं। लेकिन कांग्रेस के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई भी है, क्योंकि कई राज्यों में पार्टी लगातार कमजोर हुई है और उसे अपने संगठन को पुनर्जीवित करने के लिए नए राजनीतिक समीकरण बनाने पड़ रहे हैं।
इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल उत्तर प्रदेश को लेकर है। 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव INDIA गठबंधन की असली परीक्षा माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और इसका फायदा भी मिला। कांग्रेस के छह और समाजवादी पार्टी के 37 सांसद मिलाकर विपक्षी खेमे को राज्य में नई ताकत मिली। लेकिन विधानसभा चुनाव आते-आते क्या यह गठबंधन कायम रहेगा, यह सबसे बड़ा प्रश्न है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सीट बंटवारा हमेशा से बड़ा मुद्दा रहा है। समाजवादी पार्टी राज्य में खुद को प्रमुख विपक्षी शक्ति मानती है, जबकि कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटी है। ऐसे में दोनों दलों के बीच तालमेल बनाए रखना आसान नहीं होगा। यदि दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि INDIA गठबंधन का भविष्य अब केवल संसद की रणनीति से तय नहीं होगा, बल्कि राज्यों में दलों के व्यवहार और आपसी विश्वास पर निर्भर करेगा। बंगाल और तमिलनाडु की घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि विपक्षी एकता फिलहाल कई अंतर्विरोधों से घिरी हुई है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अपने सहयोगियों के साथ रिश्तों को कैसे संभालती है और क्या विपक्ष 2027 तक एकजुट रह पाता है या नहीं।



