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बंगाल और असम में कांग्रेस के मुस्लिम विधायकों का दबदबा, 2026 चुनाव परिणामों ने बदल दी सियासी बहस

The Hill India News
Last updated: May 5, 2026 10:10 am
The Hill India News
Published: May 5, 2026
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2026 के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। पश्चिम बंगाल, असम और केरल जैसे राज्यों में कांग्रेस के विधायकों की सामाजिक और धार्मिक संरचना ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। खासकर पश्चिम बंगाल और असम में कांग्रेस के मुस्लिम विधायकों की संख्या ने यह संकेत दिया है कि पार्टी ने अल्पसंख्यक वोट बैंक पर अपनी रणनीति को और अधिक केंद्रित किया है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने इन राज्यों में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा, जिससे दोनों दलों की राजनीतिक सोच और चुनावी रणनीति का अंतर साफ दिखाई देता है।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का प्रदर्शन भले ही सीमित सीटों तक सिमटा रहा हो, लेकिन पार्टी के दोनों विजयी विधायक मुस्लिम समुदाय से हैं। फरक्का सीट से मोताब शेख और रानीनगर सीट से जुल्फिकार अली ने जीत दर्ज की। इस तरह बंगाल में कांग्रेस के 100 प्रतिशत विधायक मुस्लिम समुदाय से हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल संयोग नहीं बल्कि कांग्रेस की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। पार्टी ने राज्य में सबसे अधिक 78 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इससे यह स्पष्ट संकेत गया कि कांग्रेस ने अल्पसंख्यक वोटों को साधने के लिए टिकट वितरण में विशेष प्राथमिकता दी।

बंगाल की राजनीति लंबे समय से मुस्लिम वोटों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राज्य की कई विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियां इस वर्ग को अपने साथ बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास करती रही हैं। हालांकि इस बार भाजपा की बड़ी जीत के बावजूद कांग्रेस ने अपने सीमित प्रभाव वाले क्षेत्रों में मुस्लिम समुदाय के भरोसे को कायम रखा।

दिलचस्प बात यह रही कि भारतीय जनता पार्टी ने 2026 के चुनाव में पश्चिम बंगाल में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा। जबकि 2021 के चुनाव में भाजपा ने 9 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, जिनमें से 6 दूसरे स्थान पर रहे थे। इस बार पार्टी ने पूरी तरह अलग रणनीति अपनाई और अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने पर जोर दिया। भाजपा का यह कदम राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

असम में भी लगभग इसी तरह की तस्वीर देखने को मिली। यहां कांग्रेस के कुल 19 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे, जिनमें से 18 मुस्लिम समुदाय से हैं। यानी पार्टी के लगभग 95 प्रतिशत विधायक मुस्लिम हैं। केवल नवबोइचा सीट से डॉ. जॉय प्रकाश दास गैर-मुस्लिम विधायक हैं। खास बात यह रही कि कांग्रेस के सभी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी को मुस्लिम बहुल इलाकों में मजबूत समर्थन प्राप्त हुआ।

असम में लंबे समय से नागरिकता, घुसपैठ और पहचान की राजनीति प्रमुख मुद्दे रहे हैं। भाजपा ने इन मुद्दों को लेकर मजबूत हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति की, जबकि कांग्रेस ने सामाजिक संतुलन और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व पर अधिक ध्यान दिया। चुनाव नतीजों के बाद यह स्पष्ट दिखाई दिया कि कांग्रेस का मुस्लिम समुदाय में प्रभाव अभी भी मजबूत बना हुआ है।

केरल की तस्वीर बंगाल और असम से थोड़ी अलग दिखाई देती है। यहां कांग्रेस के 62 विधायकों में से 8 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं। इसके अलावा राज्य में ईसाई समुदाय का भी मजबूत प्रतिनिधित्व देखने को मिला। केरल की राजनीति सामाजिक और धार्मिक संतुलन पर आधारित मानी जाती है, इसलिए यहां किसी एक समुदाय का अत्यधिक प्रभुत्व नहीं दिखता। हालांकि 2021 की तुलना में कांग्रेस के मुस्लिम विधायकों की संख्या में बढ़ोतरी जरूर दर्ज की गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी दक्षिण भारत में भी अपने पारंपरिक सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने में लगी हुई है।

इन चुनाव परिणामों के बाद भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक रणनीतियों की तुलना भी तेज हो गई है। भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर “मुस्लिम तुष्टीकरण” का आरोप लगाती रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस केवल वोट बैंक की राजनीति करती है और टिकट वितरण में धार्मिक समीकरणों को प्राथमिकता देती है। वहीं कांग्रेस का तर्क है कि वह समाज के हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देने में विश्वास रखती है और उम्मीदवारों का चयन स्थानीय परिस्थितियों तथा जीत की संभावना के आधार पर किया जाता है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 के चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश की राजनीति अब पहले से अधिक पहचान आधारित होती जा रही है। कई दल अपने-अपने कोर वोट बैंक को मजबूत करने के लिए उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक और धार्मिक समीकरणों को खुलकर ध्यान में रख रहे हैं। कांग्रेस जहां अल्पसंख्यक समुदायों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा हिंदुत्व और बहुसंख्यक समर्थन के आधार पर चुनावी रणनीति बना रही है।

आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में यह रणनीतिक अंतर और अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है। पश्चिम बंगाल और असम के नतीजों ने यह संकेत दे दिया है कि मुस्लिम वोट बैंक अभी भी कई राज्यों में निर्णायक भूमिका निभाता है। वहीं भाजपा का मुस्लिम उम्मीदवारों से दूरी बनाए रखना यह दर्शाता है कि पार्टी अपने पारंपरिक समर्थकों के भरोसे चुनावी लड़ाई लड़ना चाहती है।

2026 के चुनाव परिणामों ने केवल सरकारें नहीं बदलीं, बल्कि देश की राजनीति में प्रतिनिधित्व, वोट बैंक और सामाजिक समीकरणों को लेकर नई बहस भी छेड़ दी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों में किस तरह बदलाव करते हैं और इसका भारतीय लोकतंत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है।

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