
दुनियाभर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और लगातार जारी संघर्षों के बीच सैन्य खर्च को लेकर एक बड़ी तस्वीर सामने आई है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में वैश्विक सैन्य खर्च में लगभग 2.9% की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे कुल खर्च बढ़कर 2.9 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 272 लाख करोड़ रुपये) हो गया। यह लगातार 11वां साल है जब दुनिया ने हथियारों और रक्षा पर अपना खर्च बढ़ाया है। रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता, युद्धों का खतरा और शक्ति संतुलन की राजनीति देशों को तेजी से सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रही है।
इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अमेरिका और यूरोप के बीच बदलते सैन्य समीकरण को लेकर है। डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य सहायता में कटौती कर दी। इसका सीधा असर यूरोप पर पड़ा, जिसे यूक्रेन की मदद और अपनी सुरक्षा के लिए खुद आगे आना पड़ा। नतीजतन, यूरोप का सैन्य खर्च 2024 के 694 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 792 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यानी एक ही साल में करीब 98 अरब डॉलर (भारतीय मुद्रा में लगभग 9.25 लाख करोड़ रुपये) का अतिरिक्त बोझ यूरोप पर पड़ा।
वहीं दूसरी ओर अमेरिका का सैन्य खर्च 2025 में 7.5% घटकर 954 अरब डॉलर रह गया। इसका मुख्य कारण यह था कि अमेरिका ने इस वर्ष यूक्रेन के लिए कोई नई सैन्य सहायता पैकेज को मंजूरी नहीं दी, जबकि इससे पहले के तीन वर्षों में वह लगभग 127 अरब डॉलर की मदद दे चुका था। हालांकि, यह गिरावट स्थायी नहीं मानी जा रही है। SIPRI के प्रोग्राम डायरेक्टर नान तियान के अनुसार, अमेरिकी संसद ने 2026 के लिए रक्षा बजट को फिर से 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक करने की मंजूरी दे दी है और 2027 तक यह आंकड़ा 1.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
यूरोप में सैन्य खर्च में आई तेज़ वृद्धि का प्रमुख कारण रूस-यूक्रेन युद्ध है, जो पिछले चार वर्षों से जारी है। इस संघर्ष ने यूरोप की सुरक्षा चिंताओं को काफी बढ़ा दिया है। रूस ने भी 2025 में अपने सैन्य खर्च में 5.9% की वृद्धि करते हुए इसे 190 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया। वहीं यूक्रेन ने तो अपने सैन्य बजट में 20% की बढ़ोतरी कर इसे 84.1 अरब डॉलर कर दिया है, जो उसकी GDP का लगभग 40% है—यह किसी भी देश के लिए बेहद असामान्य और चिंताजनक स्तर है।
SIPRI की रिपोर्ट बताती है कि NATO के 29 यूरोपीय सदस्य देशों ने मिलकर 2025 में 559 अरब डॉलर का सैन्य खर्च किया। इनमें से 22 देशों ने अपनी GDP का कम से कम 2% रक्षा पर खर्च किया, जो NATO के मानकों के अनुरूप है। जर्मनी ने इस मामले में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी की और अपना रक्षा बजट 24% बढ़ाकर 114 अरब डॉलर कर दिया। स्पेन ने भी 50% की बढ़ोतरी के साथ 40.2 अरब डॉलर खर्च किए, जो 1994 के बाद पहली बार उसकी GDP के 2% से अधिक हुआ है।
एशिया और ओशिनिया क्षेत्र में भी सैन्य खर्च में तेज़ वृद्धि देखी गई है। चीन ने लगातार 31वें वर्ष अपना रक्षा बजट बढ़ाते हुए इसे 336 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया, जो 7.4% की वृद्धि दर्शाता है। भारत ने भी 2025 में 92.1 अरब डॉलर का सैन्य खर्च किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.9% अधिक है। भारत इस समय दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बना हुआ है। वहीं पाकिस्तान ने भी 11% की वृद्धि के साथ अपना रक्षा बजट 11.9 अरब डॉलर कर लिया।
भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव, खासकर पहलगाम हमले और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी घटनाओं के बाद दोनों देशों ने अपनी सैन्य तैयारियों को और मजबूत किया है। चार दिनों तक चले संघर्ष के बाद हालांकि युद्ध टल गया, लेकिन इसने दोनों देशों को रक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
मिडिल ईस्ट क्षेत्र में भी तनाव बना रहा, लेकिन वहां सैन्य खर्च में अपेक्षाकृत कम वृद्धि (0.1%) दर्ज की गई। इजरायल ने 4.9% बढ़ोतरी के साथ 48.3 अरब डॉलर खर्च किए, जबकि तुर्की ने 7.2% बढ़ाकर 30 अरब डॉलर का बजट रखा। ईरान का सैन्य खर्च लगातार दूसरे साल घटा और 2025 में यह 7.4 अरब डॉलर रह गया। इसकी वजह वहां की खराब आर्थिक स्थिति और 42% तक पहुंच चुकी महंगाई दर मानी जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक सैन्य खर्च अब देशों की GDP का औसतन 2.5% हो गया है, जो 2009 के बाद सबसे अधिक है। यह इस बात का संकेत है कि दुनिया धीरे-धीरे एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां शांति से ज्यादा प्राथमिकता सुरक्षा और सैन्य ताकत को दी जा रही है।
SIPRI के रिसर्चर शियाओ लियांग का कहना है कि 2025 में सैन्य खर्च में हुई बढ़ोतरी वैश्विक अस्थिरता, युद्धों के बढ़ते खतरे और जियोपॉलिटिकल प्रतिस्पर्धा का सीधा परिणाम है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यही हालात बने रहे, तो 2026 और उसके बाद भी सैन्य खर्च में बढ़ोतरी जारी रह सकती है।
कुल मिलाकर, SIPRI की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि दुनिया एक नए ‘आर्म्स रेस’ यानी हथियारों की दौड़ की ओर बढ़ रही है। अमेरिका के रणनीतिक फैसलों, यूरोप की बढ़ती जिम्मेदारियों, एशिया में शक्ति संतुलन की होड़ और मिडिल ईस्ट के संघर्ष—all मिलकर एक ऐसे वैश्विक माहौल का निर्माण कर रहे हैं, जहां हर देश खुद को सुरक्षित रखने के लिए अधिक से अधिक सैन्य ताकत जुटाने में लगा हुआ है।



