नई दिल्ली/चेन्नई: देश की राजनीति में जुबानी जंग अपने चरम पर है, लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का एक हालिया बयान अब उनके और उनकी पार्टी के लिए गले की फांस बन गया है। तमिलनाडु में चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘आतंकवादी’ कहने के मामले में निर्वाचन आयोग (ECI) ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। आयोग ने खरगे को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए मात्र 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है।
क्या है पूरा विवाद? मर्यादा लांघती सियासत
दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम तमिलनाडु में चुनाव प्रचार के आखिरी दिन का है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे, जहाँ वे कांग्रेस और DMK गठबंधन की ताकत का बखान कर रहे थे। इसी दौरान, AIADMK और भाजपा के बीच के समीकरणों पर सवाल उठाते हुए खरगे की जुबान फिसल गई।
खरगे ने कहा, “AIADMK के लोग, जो खुद अन्नादुरई की तस्वीर लगाते हैं, वे मोदी के साथ कैसे जा सकते हैं? वह (मोदी) एक आतंकवादी हैं। वे समानता और न्याय के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते।” खरगे के इस बयान ने देखते ही देखते राष्ट्रीय राजनीति में आग लगा दी। विपक्षी गठबंधन की रणनीतियों को धार देने की कोशिश में खरगे एक ऐसे विवाद को जन्म दे बैठे, जिसने भाजपा को एक बड़ा चुनावी मुद्दा दे दिया।
भाजपा का चौतरफा हमला: ‘यह लोकतंत्र का अपमान’
खरगे के इस बयान के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक रुख अपना लिया। गृह मंत्री अमित शाह समेत भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इसे न केवल प्रधानमंत्री पद की गरिमा का अपमान बताया, बल्कि इसे देश के करोड़ों मतदाताओं का अपमान करार दिया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए भाजपा का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल, जिसमें केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण, किरेन रिजिजू, अर्जुन राम मेघवाल और राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह शामिल थे, तुरंत चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचा। भाजपा ने लिखित शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि मल्लिकार्जुन खरगे ने आदर्श आचार संहिता (MCC) की धज्जियां उड़ाई हैं और एक लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री के लिए ‘आतंकवादी’ जैसे घृणित शब्द का प्रयोग कर चुनावी माहौल को दूषित करने का प्रयास किया है।
खरगे की सफाई: ‘मेरे कहने का मतलब वह नहीं था’
विवाद को राष्ट्रव्यापी होता देख और कानूनी व संवैधानिक संकट को भांपते हुए मल्लिकार्जुन खरगे ने कुछ ही समय बाद स्पष्टीकरण जारी किया। अपनी सफाई में उन्होंने कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है।
खरगे ने तर्क दिया, “मैंने प्रधानमंत्री को आतंकवादी नहीं कहा। मेरा आशय यह था कि केंद्र सरकार और मोदी जी विपक्ष के नेताओं को डरा-धमका रहे हैं, वे डराने की राजनीति (Politics of Intimidation) कर रहे हैं।“ हालांकि, भाजपा ने इस सफाई को सिरे से खारिज कर दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि वीडियो रिकॉर्डिंग में शब्द स्पष्ट हैं और यह बाद में किया गया ‘डैमेज कंट्रोल’ मात्र है।
चुनाव आयोग का ‘अल्टीमेटम’ और संभावित परिणाम
निर्वाचन आयोग ने प्रथम दृष्टया इस बयान को आचार संहिता के उल्लंघन का गंभीर मामला माना है। जारी नोटिस में आयोग ने पूछा है कि क्यों न उनके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए। यदि 24 घंटे के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो आयोग खरगे के चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध लगाने या अन्य कड़ी कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार रखता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के ऐन वक्त पर इस तरह की बयानबाजी कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है। तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहाँ मुकाबला काफी दिलचस्प है, इस तरह के व्यक्तिगत हमले मतदाताओं के बीच नकारात्मक संदेश भेज सकते हैं, जिसका सीधा लाभ एनडीए गठबंधन को मिल सकता है।
क्या लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव में शब्दों की मर्यादा पूरी तरह खत्म हो चुकी है? मल्लिकार्जुन खरगे जैसे वरिष्ठ राजनेता का यह बयान केवल एक मानवीय भूल है या सोची-समझी रणनीति? इन सवालों के जवाब अब चुनाव आयोग के फैसले और जनता के जनादेश में छिपे हैं।



