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जेपी इन्सॉल्वेंसी मामला: NCLAT ने फैसला सुरक्षित रखा, वेदांत और अडानी आमने-सामने

The Hill India News
Last updated: April 22, 2026 11:04 am
The Hill India News
Published: April 22, 2026
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जेपी एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) के दिवाला समाधान (Insolvency Resolution) मामले में एक अहम कानूनी मोड़ सामने आया है। नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने इस हाई-प्रोफाइल मामले में लंबी सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी पक्षों को निर्देश दिया है कि वे आगामी दो से तीन दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें अदालत में जमा करें। इस मामले को लेकर अब देश के कॉरपोरेट और रियल एस्टेट सेक्टर में काफी हलचल देखी जा रही है।

Contents
वेदांत समूह के गंभीर आरोपअडानी समूह और समाधान पेशेवर का बचावसमाधान पेशेवर की दलीलआगे क्या होगा?

यह मामला केवल एक कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े हजारों घर खरीदारों, वित्तीय संस्थानों और बड़े कॉरपोरेट समूहों के हित भी प्रभावित हो सकते हैं। इसी वजह से NCLAT का अंतिम फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

वेदांत समूह के गंभीर आरोप

सुनवाई के दौरान वेदांत समूह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिजीत सिन्हा ने पूरी समाधान प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि जेपी एसोसिएट्स के लिए अपनाई गई दिवाला समाधान प्रक्रिया में कई “गंभीर खामियां” मौजूद हैं और इसमें पारदर्शिता का अभाव रहा है।

वेदांत समूह का मुख्य आरोप यह है कि उनकी ओर से दी गई बोली ₹17,926 करोड़ की थी, जो अडानी समूह की ₹14,535 करोड़ की बोली से काफी अधिक थी। इसके बावजूद उनकी योजना का उचित और निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं किया गया। वकील ने अदालत में तर्क दिया कि लेनदारों की समिति (Committee of Creditors – CoC) ने अपने निर्णय लेने में पारदर्शिता नहीं दिखाई और “व्यावसायिक बुद्धिमत्ता” के नाम पर मनमाने फैसलों को उचित ठहराने की कोशिश की गई।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मूल्यांकन मैट्रिक्स को सही तरीके से लागू नहीं किया गया और प्रक्रिया के दौरान कुछ नियमों में बदलाव किया गया, जिससे पूरी बोली प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। वेदांत का कहना है कि यदि नियमों को समान रूप से लागू किया जाता तो परिणाम अलग हो सकता था।

इसके अलावा वेदांत समूह ने यह भी दावा किया कि CoC की बैठकों में उनके प्रस्ताव पर बहुत कम समय चर्चा की गई और पूरी प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह गई। उनके अनुसार, यह स्थिति निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों के खिलाफ है।

अडानी समूह और समाधान पेशेवर का बचाव

दूसरी ओर, सफल बोलीदाता के रूप में सामने आए अडानी समूह ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। अडानी समूह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रितिन राय ने अदालत में कहा कि पूरी बोली प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और नियमों के अनुरूप थी।

उन्होंने बताया कि ₹12,000 करोड़ के रिजर्व प्राइस के मुकाबले जो बोलियां आईं, वे प्रतिस्पर्धी माहौल को दर्शाती हैं। अडानी पक्ष का तर्क है कि उनकी समाधान योजना में “अपफ्रंट पेमेंट” यानी तत्काल भुगतान की शर्त शामिल थी, जिससे ऋणदाताओं को जल्दी और व्यावहारिक समाधान मिल सकता था।

अडानी समूह का कहना है कि वित्तीय संस्थानों ने भी उनकी योजना को अधिक व्यवहारिक और समयबद्ध समाधान देने वाली माना, जिससे कंपनी के पुनर्गठन की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ सके।

समाधान पेशेवर की दलील

इस मामले में समाधान पेशेवर (Resolution Professional – RP) अरुण कतपालिया ने भी प्रक्रिया का बचाव किया। उन्होंने अदालत को बताया कि सभी बोलीदाताओं को अपनी पेशकश सुधारने और संशोधित करने के पर्याप्त अवसर दिए गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि CoC की आंतरिक चर्चाओं को सार्वजनिक करना अनिवार्य नहीं होता और निर्णय तय कानूनी ढांचे के भीतर ही लिया गया है।

RP की ओर से यह भी कहा गया कि पूरी प्रक्रिया दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के प्रावधानों के अनुसार संचालित की गई है और इसमें किसी प्रकार की अनियमितता नहीं हुई है।

आगे क्या होगा?

अब इस मामले में सभी की निगाहें NCLAT के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। ट्रिब्यूनल का निर्णय न केवल जेपी एसोसिएट्स के भविष्य को तय करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि दिवाला समाधान प्रक्रिया में मूल्यांकन और पारदर्शिता के मानकों को किस तरह देखा जाएगा।

यदि NCLAT वेदांत समूह की दलीलों को स्वीकार करता है, तो संभव है कि पूरी बोली प्रक्रिया की समीक्षा या पुनः बोली की प्रक्रिया शुरू करने के आदेश दिए जाएं। इससे समाधान प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आ सकता है।

वहीं, यदि अडानी समूह के पक्ष में फैसला आता है, तो जेपी एसोसिएट्स के पुनर्गठन और समाधान योजना के कार्यान्वयन का रास्ता साफ हो जाएगा, जिससे कंपनी के ऋणदाताओं और अन्य हितधारकों को आगे की दिशा मिल सकेगी।

कुल मिलाकर यह मामला भारत की दिवाला प्रक्रिया प्रणाली, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और बड़े औद्योगिक समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। अब देश की नजरें NCLAT के फैसले पर टिकी हुई हैं, जो इस लंबे विवाद का अंतिम अध्याय लिख सकता है।

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