
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के एक बयान को लेकर देश की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में कथित तौर पर ‘आतंकवादी’ शब्द के इस्तेमाल पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कड़ा रुख अपनाते हुए भारत का चुनाव आयोग (ECI) में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनावी माहौल को और अधिक गरमा दिया है, खासकर तब जब तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू है।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू पार्टी के अन्य नेताओं के साथ चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचे और इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने आयोग से अपील की कि ऐसे बयान न सिर्फ लोकतांत्रिक मूल्यों को ठेस पहुंचाते हैं बल्कि चुनावी माहौल को भी प्रभावित करते हैं। बीजेपी का कहना है कि किसी भी शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी करना बेहद आपत्तिजनक और अनुचित है।
शिकायत में बीजेपी ने आरोप लगाया है कि खरगे का बयान आदर्श आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन है और इससे मतदाताओं की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। पार्टी ने यह भी कहा कि यह बयान भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं—विशेष रूप से अनुचित प्रभाव और मानहानि से संबंधित प्रावधानों—के तहत दंडनीय हो सकता है। बीजेपी ने चुनाव आयोग से इस बयान पर तत्काल संज्ञान लेने, सार्वजनिक माफी या बयान वापसी की मांग करने और आवश्यक होने पर चुनावी प्रतिबंध लगाने की भी मांग की है।
इस मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस लगातार अपने राजनीतिक आचरण का स्तर गिरा रही है और इस तरह की भाषा लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। शाह ने यह भी कहा कि देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए इस तरह के शब्दों का प्रयोग करना न केवल उनका अपमान है बल्कि उन करोड़ों लोगों का भी अपमान है जो उनका समर्थन करते हैं। उन्होंने दावा किया कि पिछले कई वर्षों में सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है और ऐसे में प्रधानमंत्री को ‘आतंकवादी’ कहना पूरी तरह से निंदनीय है।
विवाद बढ़ने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने अपनी सफाई भी पेश की। उन्होंने कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। खरगे के मुताबिक, उन्होंने प्रधानमंत्री को सीधे तौर पर ‘आतंकवादी’ नहीं कहा, बल्कि उनका आशय यह था कि सरकार की कार्यशैली के कारण राजनीतिक दलों और नेताओं में डर का माहौल बन रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों—जैसे ED, I-T और CBI—का इस्तेमाल विपक्ष को दबाने के लिए किया जा रहा है, और इसी संदर्भ में उन्होंने ‘डराने-धमकाने’ वाली बात कही थी।
खरगे ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का अपमान करना नहीं था, बल्कि वे राजनीतिक परिस्थितियों पर टिप्पणी कर रहे थे। हालांकि, बीजेपी ने इस सफाई को खारिज करते हुए कहा कि बयान स्पष्ट रूप से आपत्तिजनक था और इससे पीछे हटने की कोशिश की जा रही है।
दरअसल, यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब खरगे तमिलनाडु की राजनीति और AIADMK-बीजेपी गठबंधन पर टिप्पणी कर रहे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि अन्नादुरै और अन्य दिग्गज नेताओं के विचारों का अनुसरण करने वाली पार्टी कैसे बीजेपी के साथ जा सकती है। इसी दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री और उनकी नीतियों पर तीखी टिप्पणी की, जिसने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर चुनावी भाषणों की मर्यादा और राजनीतिक संवाद के स्तर पर बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के समय नेताओं के बयान अधिक संवेदनशील हो जाते हैं और ऐसे में शब्दों का चयन बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए।
फिलहाल, इस मामले में चुनाव आयोग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा तेज है कि आयोग इस शिकायत पर क्या कदम उठाता है। आने वाले दिनों में आयोग की कार्रवाई इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकती है।



