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ईरान में सत्ता का समीकरण बदला? रिवोल्यूशनरी गार्ड के बढ़ते प्रभाव से शांति वार्ता पर संकट

The Hill India News
Last updated: April 20, 2026 4:40 am
The Hill India News
Published: April 20, 2026
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मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर गहराता नजर आ रहा है, जहां ईरान के भीतर सत्ता संतुलन में बड़े बदलाव की खबरें सामने आ रही हैं। ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान की ताकतवर सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने देश के रणनीतिक और कूटनीतिक फैसलों पर अपना प्रभाव काफी हद तक बढ़ा लिया है। इस बदलाव के केंद्र में IRGC के वरिष्ठ कमांडर मेजर जनरल अहमद वाहिदी बताए जा रहे हैं, जिनके बारे में दावा किया जा रहा है कि वे अब प्रमुख निर्णयों में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही तनाव चरम पर है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में हालिया घटनाओं ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। बताया जा रहा है कि अमेरिका द्वारा ईरानी कार्गो जहाज पर की गई सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान के भीतर कट्टरपंथी ताकतों को और मजबूती मिली है। इससे उन नेताओं की स्थिति कमजोर होती दिख रही है जो पश्चिमी देशों के साथ बातचीत के पक्षधर माने जाते थे।

ईरान के भीतर इस कथित सत्ता बदलाव का असर उसकी विदेश नीति और कूटनीतिक रणनीति पर साफ दिखाई दे रहा है। पहले जहां विदेश मंत्री अब्बास अराघची जैसे नेता अमेरिका के साथ वार्ता के जरिए समाधान तलाशने की कोशिश कर रहे थे, वहीं अब IRGC के प्रभाव में यह प्रक्रिया लगभग ठप पड़ती नजर आ रही है। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि अराघची द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के संकेत दिए गए थे, लेकिन IRGC ने इस फैसले को खारिज कर दिया।

होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करता है। हाल के दिनों में ईरान द्वारा इस मार्ग से गुजरने वाले कई जहाजों को निशाना बनाए जाने की खबरें भी सामने आई हैं, जिससे सैकड़ों जहाज फंस गए हैं और वैश्विक चिंता बढ़ गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि IRGC का बढ़ता प्रभाव केवल सैन्य मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह कूटनीतिक फैसलों को भी प्रभावित कर रहा है। इससे ईरान के भीतर शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत मिलता है, जहां पारंपरिक राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका कमजोर होती दिख रही है। इसी कड़ी में मोहम्मद बाघेर जोलघदर का नाम भी सामने आ रहा है, जो IRGC के वरिष्ठ सदस्य रहे हैं और वर्तमान में सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल से जुड़े हैं। उनका समर्थन अहमद वाहिदी की स्थिति को और मजबूत कर रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की वार्ता टीम के भीतर भी मतभेद उभर कर सामने आए हैं। कहा जा रहा है कि जोलघदर ने वार्ता के दौरान दिखाई गई नरमी को लेकर आपत्ति जताई थी, जिसके बाद बातचीत टीम को वापस तेहरान बुला लिया गया। इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि देश के भीतर अब अंतिम निर्णय लेने की शक्ति किसके पास है।

इस पूरे घटनाक्रम का असर ईरान और पश्चिमी देशों के बीच चल रही संभावित शांति वार्ता पर भी पड़ सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि जब तक ईरान के भीतर सत्ता का स्पष्ट और स्थिर ढांचा सामने नहीं आता, तब तक किसी भी तरह की बातचीत सफल होना मुश्किल होगा। खासकर तब, जब बातचीत करने वाले नेताओं के पास वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति ही न हो।

वहीं, अमेरिका की रणनीति पर भी सवाल उठने लगे हैं। माना जा रहा है कि सैन्य दबाव बनाकर ईरान को झुकाने की कोशिश उलटी पड़ सकती है, क्योंकि इससे कट्टरपंथी गुटों को और मजबूती मिलती है। ऐसे में क्षेत्र में स्थिरता की संभावना और कम हो जाती है।

फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच संभावित युद्धविराम कायम रह पाएगा या नहीं। जिस तरह से हालात तेजी से बदल रहे हैं, उससे यह कहना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में स्थिति किस दिशा में जाएगी। हालांकि इतना तय है कि ईरान के भीतर बदलता सत्ता समीकरण न केवल उसके आंतरिक राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करेगा, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की भू-राजनीति पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा।

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