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उत्तराखंड: मसूरी में छलका उत्तराखंड फिल्म इडस्ट्री से जुड़े लोगों का दर्द, ‘फिल्म बोर्ड गठन की मांग ने पकड़ा जोर

The Hill India News
Last updated: April 15, 2026 11:08 am
The Hill India News
Published: April 15, 2026
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मसूरी: उत्तराखंड की खूबसूरत वादियां, बर्फ से ढके पहाड़, झरने, नदियां और हरियाली लंबे समय से फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों को अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं। यही वजह है कि राज्य को फिल्म शूटिंग के लिए एक बेहतरीन डेस्टिनेशन माना जाता है। बावजूद इसके, राज्य की स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकार, निर्माता और तकनीशियन खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। मसूरी में आयोजित एक बैठक के दौरान उत्तराखंड फिल्म, टेलीविजन एवं रेडियो एसोसिएशन (UFTARA) के पदाधिकारियों ने अपनी पीड़ा खुलकर जाहिर की और सरकार से जल्द से जल्द “उत्तराखंड फिल्म बोर्ड” के गठन की मांग उठाई।

बैठक में एसोसिएशन के केंद्रीय अध्यक्ष प्रदीप भंडारी और महामंत्री कांता प्रसाद ने कहा कि राज्य में फिल्म बोर्ड के गठन में हो रही देरी के कारण पूरी इंडस्ट्री संकट के दौर से गुजर रही है। उनका कहना था कि कलाकारों से लेकर निर्माता और निर्देशक तक सभी को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने “उत्तराखंड फिल्म नीति 2024” तो बनाई, लेकिन उसका लाभ जमीनी स्तर पर नहीं पहुंच पा रहा है।

एसोसिएशन के अनुसार, फिल्म नीति 2024 का उद्देश्य राज्य में फिल्म निर्माण को बढ़ावा देना, स्थानीय कलाकारों को अवसर देना और शूटिंग के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना था। इसके तहत फिल्मों को आकर्षित करने के लिए भारी-भरकम सब्सिडी देने का भी प्रावधान किया गया था। साथ ही, सिंगल विंडो सिस्टम के जरिए शूटिंग की अनुमति देने की व्यवस्था भी शामिल थी, ताकि फिल्म निर्माताओं को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है।

UFTARA के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि क्षेत्रीय फिल्म निर्माताओं को मिलने वाली 50 प्रतिशत सब्सिडी अभी तक जारी नहीं की गई है। इसके अलावा, पिछले करीब 10 वर्षों से फिल्म पुरस्कारों की राशि, जो लगभग 50 लाख रुपए बताई जा रही है, वह भी लंबित पड़ी है। इससे कलाकारों का मनोबल लगातार गिर रहा है और वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि जब भी कोई क्षेत्रीय फिल्म रिलीज होती है, तो उसे बड़े सिनेमा हॉल में स्क्रीन नहीं मिल पाती। इसका सीधा असर फिल्म की पहुंच और कमाई पर पड़ता है। बड़े मल्टीप्लेक्स और सिनेमा घर अक्सर बाहरी यानी बॉलीवुड फिल्मों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि स्थानीय फिल्मों को नजरअंदाज किया जाता है। इससे उत्तराखंड की क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री को गंभीर नुकसान हो रहा है।

एसोसिएशन के नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार बाहरी फिल्म निर्माताओं को ज्यादा सुविधाएं और सब्सिडी दे रही है, जबकि स्थानीय कलाकार और निर्माता उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। उनका आरोप है कि यह असंतुलन राज्य की अपनी फिल्म इंडस्ट्री के विकास में सबसे बड़ी बाधा बन गया है।

बैठक में यह भी मुद्दा उठाया गया कि पड़ोसी राज्य जैसे पंजाब, हिमाचल प्रदेश और बिहार अपनी फिल्म इंडस्ट्री को तेजी से विकसित कर रहे हैं। वहां की सरकारें स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए ठोस कदम उठा रही हैं। इसके मुकाबले उत्तराखंड की फिल्म इंडस्ट्री पिछड़ती नजर आ रही है और अब यह बंद होने की कगार पर पहुंच गई है।

एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि जल्द से जल्द “उत्तराखंड फिल्म बोर्ड” का गठन किया जाए और इसमें फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े अनुभवी लोगों को शामिल किया जाए। उनका मानना है कि फिल्म बोर्ड के गठन से नीतियों का सही तरीके से क्रियान्वयन संभव हो सकेगा और इंडस्ट्री को एक नई दिशा मिलेगी। इसके अलावा, लंबित सब्सिडी और पुरस्कार राशि को तुरंत जारी करने की भी मांग की गई है।

गौरतलब है कि राज्य में पहले से “उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद” का गठन किया जा चुका है, जिसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी बंशीधर तिवारी हैं। इसके बावजूद एसोसिएशन का कहना है कि एक सशक्त और सक्रिय फिल्म बोर्ड की आवश्यकता है, जो नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू कर सके और स्थानीय कलाकारों के हितों की रक्षा कर सके।

उत्तराखंड को राष्ट्रीय स्तर पर “मोस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट” का पुरस्कार भी मिल चुका है और यहां कई बड़ी बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। राज्य की प्राकृतिक सुंदरता और लोकेशनों की विविधता इसे फिल्म निर्माताओं के लिए आकर्षक बनाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए 3 फरवरी 2024 को राज्य कैबिनेट ने फिल्म नीति 2024 को मंजूरी दी थी।

सरकार का दावा था कि इस नीति से उत्तराखंड फिल्म शूटिंग का एक बड़ा हब बनकर उभरेगा और इससे रोजगार, पर्यटन और स्थानीय कला-संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह साफ है कि नीति के प्रभावी क्रियान्वयन में कई खामियां हैं, जिन्हें दूर करना बेहद जरूरी है।

अब देखना यह होगा कि सरकार फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों की इन मांगों पर कितना ध्यान देती है और क्या वाकई “उत्तराखंड फिल्म बोर्ड” का गठन कर राज्य की फिल्म इंडस्ट्री को नई ऊर्जा देने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाता है या नहीं।

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