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उत्तराखंड: मॉनसून से पहले बढ़ी चिंता, हर्षिल-धराली में आपदा के बाद बनी झील बनी बड़ा खतरा, ग्रामीणों ने उठाए सवाल

The Hill India News
Last updated: April 15, 2026 10:36 am
The Hill India News
Published: April 15, 2026
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उत्तरकाशी: उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र हर्षिल और धराली में पिछले साल अगस्त में आई प्राकृतिक आपदा के घाव अभी तक भरे नहीं हैं। उस दौरान भागीरथी नदी के प्रवाह में आए बड़े बदलाव के कारण हर्षिल के समीप एक विशाल झील का निर्माण हो गया था। हैरानी की बात यह है कि आपदा के करीब नौ महीने बीत जाने के बावजूद इस झील का जलस्तर अब भी कम नहीं हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आने वाले मॉनसून सीजन में यह झील किसी बड़े खतरे का कारण बन सकती है।

ग्रामीणों के अनुसार, आपदा के समय नदी में भारी मात्रा में मलबा आने के कारण जलधारा बाधित हो गई थी, जिससे पानी एक स्थान पर एकत्रित होकर झील का रूप ले बैठा। हालांकि, बाद में सिंचाई विभाग द्वारा नदी को चैनलाइज करने का कार्य किया गया, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कार्य पूरी तरह से योजनाबद्ध नहीं था और केवल औपचारिकता तक सीमित रह गया।

हर्षिल क्षेत्र के निवासियों का कहना है कि विभाग द्वारा झील के मुहाने को सही तरीके से नहीं खोला गया, जिससे पानी की निकासी सुचारू रूप से नहीं हो पा रही है। इसके कारण झील का जलस्तर जस का तस बना हुआ है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि नदी के किनारों पर मलबे के बड़े-बड़े ढेर लगा दिए गए हैं, जिससे पानी आगे बढ़ने के बजाय वापस झील की ओर लौट रहा है।

स्थानीय निवासी और पूर्व प्रधान बसंती नेगी, शीशपाल सिंह, गोविंद और सचिन राणा ने बताया कि वर्तमान में भी झील लगभग एक किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। उन्होंने कहा कि इस समय नदी में पानी की मात्रा अपेक्षाकृत कम है, इसके बावजूद जलस्तर में कोई खास गिरावट नहीं आई है। ऐसे में जब मॉनसून के दौरान पानी का दबाव बढ़ेगा, तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।

ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि बरसात के समय पास से बहने वाली तेलगाड़ नदी उफान पर आ जाती है। यदि इस दौरान भागीरथी नदी में बनी झील का पानी और मलबा एक साथ दबाव बनाएंगे, तो इससे पूरे हर्षिल कस्बे को खतरा हो सकता है। लोगों का कहना है कि वर्तमान में जो सुरक्षात्मक कार्य किए गए हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं। कुछ स्थानों पर वायरक्रेट लगाकर काम को पूरा मान लिया गया है, जो किसी भी बड़ी आपदा को रोकने के लिए नाकाफी है।

स्थानीय लोगों ने प्रशासन और संबंधित विभागों से मांग की है कि जल्द से जल्द इस झील के स्थायी समाधान के लिए ठोस और वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाला मॉनसून हर्षिल और आसपास के क्षेत्रों के लिए भारी तबाही लेकर आ सकता है।

वहीं, सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता सचिन सिंघल का कहना है कि विभाग की ओर से झील को खोलने के लिए नदी को चैनलाइज किया गया है और अन्य आवश्यक सुरक्षात्मक कार्य भी किए जा रहे हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि विभाग स्थिति पर नजर बनाए हुए है और आवश्यकता के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

हालांकि, जमीनी हकीकत और विभागीय दावों के बीच अंतर साफ नजर आ रहा है। जहां एक ओर अधिकारी कार्यों के जारी रहने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में इस प्रकार की झीलें (लैंडस्लाइड डैम्ड लेक) बेहद खतरनाक होती हैं, क्योंकि अचानक इनके टूटने से नीचे के क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह समय रहते इस संभावित खतरे को गंभीरता से ले और समुचित उपाय सुनिश्चित करे। हर्षिल और धराली जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी संभावित आपदा को टाला जा सके।

कुल मिलाकर, हर्षिल में भागीरथी नदी पर बनी यह झील अब भी एक अनसुलझी समस्या बनी हुई है। मॉनसून के आगमन से पहले यदि इसका समाधान नहीं किया गया, तो यह क्षेत्र एक बार फिर बड़ी आपदा का सामना कर सकता है।

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