उत्तर प्रदेशफीचर्ड

उत्तर प्रदेश: महोबा में सरकारी लापरवाही की हद, 18 महीने पहले मृत आंगनबाड़ी सहायिका को थमा दिया नोटिस, 2 दिन में मांगा जवाब

महोबा (उत्तर प्रदेश): डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस के दौर में भी सरकारी तंत्र की लापरवाही किस हद तक जा सकती है, इसका हैरान कर देने वाला मामला उत्तर प्रदेश के महोबा जिले से सामने आया है। यहां बाल विकास विभाग ने एक ऐसी महिला कर्मचारी को नोटिस जारी कर दिया, जिसकी मृत्यु लगभग 18 महीने पहले ही हो चुकी है। इतना ही नहीं, विभाग ने मृत महिला को दो दिन के भीतर जवाब देने का अल्टीमेटम भी दे दिया, जिससे पूरे इलाके में आक्रोश और हैरानी का माहौल है।

यह मामला महोबा के पनवाड़ी विकासखंड के नैपुरा गांव का है, जहां आंगनबाड़ी केंद्र में सहायिका के पद पर कार्यरत पार्वती की बीमारी के चलते 1 नवंबर 2024 को मृत्यु हो गई थी। परिवार का दावा है कि पार्वती के निधन के महज 8 दिन के भीतर ही उन्होंने संबंधित विभाग में मृत्यु प्रमाण पत्र जमा कर दिया था। इसके बावजूद, लगभग डेढ़ साल बाद बाल विकास परियोजना कार्यालय से उनके नाम पर नोटिस जारी कर दिया गया।

जारी किए गए नोटिस में आरोप लगाया गया है कि निरीक्षण के दौरान संबंधित आंगनबाड़ी केंद्र बंद मिला। नोटिस में मृतका से कहा गया है कि वह दो दिन के भीतर हॉट-कुक्ड मील योजना से जुड़े बिल, वाउचर और अन्य रिकॉर्ड के साथ कार्यालय में उपस्थित हों, अन्यथा उनकी सेवा समाप्त कर दी जाएगी। इस नोटिस पर पनवाड़ी की बाल विकास परियोजना अधिकारी यासमीन जहां के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने मृतका के परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है। पार्वती के पति किशुनलाल ने एक ओर अपनी पत्नी की तस्वीर और दूसरी ओर मृत्यु प्रमाण पत्र दिखाते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि उन्होंने समय पर सभी दस्तावेज जमा कर दिए थे, फिर भी विभाग ने न तो रिकॉर्ड अपडेट किया और न ही स्थिति की जांच की।

मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब पार्वती के बेटे महेश ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए तंज कसा। उसने कहा कि अब वह यह नोटिस लेकर “स्वर्ग” जाएगा और अपनी मां से पूछेगा कि वह ड्यूटी पर क्यों नहीं जा रही हैं। बेटे का यह बयान सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गया है और लोग सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं।

ग्रामीणों और परिजनों के मन में अब यह संदेह भी पैदा हो गया है कि कहीं मृतका के नाम पर पिछले 18 महीनों से किसी और द्वारा मानदेय तो नहीं उठाया जा रहा था। यदि ऐसा है तो यह मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि संभावित भ्रष्टाचार का भी हो सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विभाग को इतने लंबे समय तक अपनी कर्मचारी की मृत्यु की जानकारी न होना अपने आप में गंभीर चूक है।

परिजनों ने अब इस मामले की शिकायत जिलाधिकारी से करने का निर्णय लिया है और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल एक परिवार की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मामला नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।

इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सरकारी रिकॉर्ड और फाइलों में अपडेट की प्रक्रिया इतनी कमजोर है कि एक मृत व्यक्ति को भी जीवित मानकर कार्रवाई की जा सकती है। डिजिटल युग में जहां डेटा प्रबंधन और पारदर्शिता की बात की जाती है, वहां इस तरह की घटनाएं सिस्टम की खामियों को उजागर करती हैं।

अब देखना यह होगा कि इस गंभीर लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होती है और क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं। फिलहाल, यह मामला प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता का एक बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button