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POCSO मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला: ‘केवल पुराने बयानों के आधार पर सजा संभव नहीं’, आरोपी दोषमुक्त

The Hill India News
Last updated: March 20, 2026 3:30 am
The Hill India News
Published: March 20, 2026
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नैनीताल। भारतीय न्यायशास्त्र के इस बुनियादी सिद्धांत को दोहराते हुए कि “संदेह का लाभ हमेशा आरोपी को मिलना चाहिए”, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नाबालिग से छेड़छाड़ और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता के अदालत में दिए गए बयान ठोस, सुसंगत और स्पष्ट नहीं हैं, तो पुलिस को दिए गए पिछले बयानों या मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज 164 के बयानों को सजा का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।

Contents
क्या था पूरा मामला?हाईकोर्ट में क्यों पलटा फैसला?स्वतंत्र गवाहों की कमी और साक्ष्यों का अभावराज्य की जिम्मेदारी: ‘संदेह से परे’ सबूत

न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए उसे सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया और निचली अदालत द्वारा सुनाई गई चार साल की सजा को निरस्त कर दिया है।

क्या था पूरा मामला?

यह कानूनी विवाद चंपावत जिले के रीठा साहिब थाना क्षेत्र से शुरू हुआ था। फरवरी 2024 में एक व्यक्ति ने तहरीर दी थी कि आरोपी ने उसकी 17 वर्षीय नाबालिग बेटी का रास्ता रोककर उसके साथ अभद्रता की। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने पीड़िता को झाड़ियों की ओर खींचने का प्रयास किया और उसे ₹500 का लालच देकर फुसलाने की कोशिश की। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पॉक्सो अधिनियम और छेड़छाड़ की धाराओं में चार्जशीट दाखिल की थी, जिसके आधार पर निचली अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट में क्यों पलटा फैसला?

उच्च न्यायालय ने मामले की गहराई से समीक्षा की और साक्ष्यों के विश्लेषण में पाया कि अभियोजन पक्ष का केस अदालत में टिकने योग्य नहीं था। न्यायालय के हस्तक्षेप के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण रहे:

1. बयानों में भारी विरोधाभास: सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पीड़िता ने निचली अदालत में दिए गए अपने मुख्य परीक्षण (Examination-in-chief) के दौरान प्रारंभिक कहानी से अलग बयान दिए। उसने अदालत को बताया कि आरोपी ने केवल उसे गाली दी और झाड़ियों में ₹500 का नोट फेंककर वहां से भाग गया। पीड़िता ने कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया कि आरोपी ने उसे ‘गलत नीयत’ से छुआ था या उसके साथ किसी भी प्रकार का यौन हमला (Sexual Assault) हुआ था।

2. धारा 164 के बयानों की कानूनी स्थिति: न्यायमूर्ति नैथानी ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की। उन्होंने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 (अब नई संहिता के तहत प्रभावी प्रावधान) के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए बयान ‘ठोस साक्ष्य’ (Substantive Evidence) की श्रेणी में नहीं आते।

“मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयानों का उपयोग केवल गवाह के अदालत में दिए गए बयानों की पुष्टि करने या उनमें विरोधाभास (Contradiction) दिखाने के लिए किया जा सकता है। यदि मुख्य गवाही ही कमजोर है, तो पुलिस डायरी या पुराने बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।”

स्वतंत्र गवाहों की कमी और साक्ष्यों का अभाव

न्यायालय ने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि कथित घटना दिनदहाड़े गांव के बीचों-बीच हुई थी, फिर भी पुलिस ने किसी स्वतंत्र चश्मदीद गवाह को पेश नहीं किया। ₹500 के नोट की बरामदगी पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि घटनास्थल से पैसे मिलना केवल वहां मुद्रा की मौजूदगी साबित करता है, यह किसी भी प्रकार से छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न के गंभीर अपराध की पुष्टि नहीं करता।

राज्य की जिम्मेदारी: ‘संदेह से परे’ सबूत

अपने ऐतिहासिक फैसले में हाईकोर्ट ने ‘क्रिमिनल ज्यूरिप्रूडेंस’ के सिद्धांतों को रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी के दोष को ‘संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने का भार पूरी तरह से राज्य और अभियोजन पक्ष पर होता है। यदि साक्ष्यों की कड़ी में कोई भी कमी है या पीड़िता के बयानों में ऐसा विरोधाभास है जो मामले की जड़ पर प्रहार करता है, तो इसका सीधा लाभ आरोपी को दिया जाना अनिवार्य है।

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को ‘त्रुटिपूर्ण’ मानते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस साक्ष्यों के किसी व्यक्ति को जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। इस फैसले के साथ ही आरोपी पर लगा जुर्माना और जेल की सजा पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है।

यह निर्णय उन मामलों में एक नजीर (Precedent) की तरह देखा जा रहा है जहां केवल शुरुआती बयानों के आधार पर गंभीर धाराओं में सजा सुना दी जाती है, जबकि ट्रायल के दौरान साक्ष्य कमजोर पड़ जाते हैं।

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