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संसद में गूंजी ‘वेतन क्रांति’ की मांग: राघव चड्ढा ने उठाई ‘इन्फ्लेशन लिंक्ड सैलरी रिवीजन एक्ट’ बनाने की आवाज

नई दिल्ली: देश की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बीच क्या आम आदमी की जेब वाकई भर रही है या महंगाई उसे खोखला कर रही है? इस सुलगते सवाल को गुरुवार को आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद के पटल पर रखा। यूनियन बजट 2026-27 पर बहस के दौरान चड्ढा ने एक क्रांतिकारी प्रस्ताव पेश करते हुए भारत में तुरंत ‘इन्फ्लेशन लिंक्ड सैलरी रिवीजन एक्ट’ (महंगाई से जुड़ा वेतन संशोधन कानून) बनाने की पुरजोर मांग की। उन्होंने आंकड़ों के साथ दावा किया कि पिछले आठ वर्षों में भारतीयों की ‘वास्तविक आय’ में भारी गिरावट आई है।

‘साइलेंट पे कट’: 2018 से 2026 के बीच 16% घटी असली कमाई

संसद को संबोधित करते हुए राघव चड्ढा ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2018 से 2026 के बीच सैलरीड क्लास (वेतनभोगी वर्ग) की असली कमाई में 16 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। चड्ढा के अनुसार, भले ही कागजों पर लोगों की सैलरी बढ़ी हो, लेकिन महंगाई (Inflation) की दर वेतन वृद्धि से कहीं अधिक रही।

उन्होंने इसे ‘साइलेंट पे कट’ करार देते हुए कहा, “महंगाई चुपचाप आम आदमी की मेहनत की कमाई को खा रही है। आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम होने के कारण लाखों लोगों के लिए यह स्थिति एक अनिवार्य कटौती जैसी बन गई है।”

निजी क्षेत्र के 85% कर्मचारियों के पास कोई ‘सुरक्षा कवच’ नहीं

राघव चड्ढा ने सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच के बड़े अंतर को रेखांकित किया। उन्होंने तर्क दिया कि सरकारी कर्मचारियों को तो डियरनेस अलाउंस (DA) और समय-समय पर आने वाले पे कमीशन (वेतन आयोग) से महंगाई के खिलाफ सुरक्षा मिल जाती है, लेकिन देश के औपचारिक निजी क्षेत्र (Formal Private Sector) के 85 प्रतिशत कर्मचारियों के पास ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

“निजी क्षेत्र का कर्मचारी आज केवल अपनी कंपनी की मेहरबानी या अपनी व्यक्तिगत बातचीत की क्षमता (Negotiation Power) पर निर्भर है। उनके पास महंगाई के थपेड़ों से बचने के लिए कोई वैधानिक सुरक्षा तंत्र नहीं है,” चड्ढा ने जोर देकर कहा।

वैश्विक मॉडल: अमेरिका से जापान तक का दिया उदाहरण

अपनी मांग को तर्कसंगत बनाने के लिए राघव चड्ढा ने दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में लागू कानूनों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि भारत को भी वैश्विक मानकों की राह पर चलना चाहिए:

  • अमेरिका: यहां COLA (Cost of Living Adjustment) सिस्टम है, जो महंगाई के आधार पर सामाजिक सुरक्षा लाभ और वेतन को स्वतः समायोजित करता है।

  • जर्मनी: यहां हर 18-24 महीने में वेतन का अनिवार्य अपडेट किया जाना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।

  • जापान: यहां का प्रसिद्ध ‘शुनतो’ (Shunto) सिस्टम हर साल महंगाई के हिसाब से वेतन वृद्धि सुनिश्चित करता है।

  • बेल्जियम: यहां हर तिमाही में इंडेक्सेशन होता है, जिससे महंगाई बढ़ते ही वेतन में सुधार हो जाता है।

‘इन्फ्लेशन लिंक्ड सैलरी रिवीजन एक्ट’ की आवश्यकता क्यों?

चड्ढा ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2026 की आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए यह एक्ट समय की मांग है। इस कानून के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित होने चाहिए:

  1. न्यूनतम वेतन की गारंटी: न्यूनतम वेतन वृद्धि को सीधे इन्फ्लेशन इंडेक्स (महंगाई सूचकांक) से जोड़ना।

  2. समान विकास: यह सुनिश्चित करना कि जीडीपी ग्रोथ का लाभ केवल कॉरपोरेट्स को नहीं, बल्कि कामगारों को भी मिले।

  3. कामगारों का सम्मान: वेतन वृद्धि को ‘इनाम’ के बजाय महंगाई के खिलाफ एक ‘अधिकार’ के रूप में स्थापित करना।

विकास की निष्पक्षता पर सवाल

संसद में अपने भाषण के अंत में राघव चड्ढा ने एक गंभीर सवाल छोड़ा। उन्होंने कहा कि यदि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो इसका लाभ उन लोगों तक क्यों नहीं पहुंच रहा जो इस विकास के पहिए को घुमाते हैं? उन्होंने मांग की कि इस कानून के जरिए विकास को निष्पक्ष बनाया जाए और कामगारों के सम्मान की रक्षा की जाए।

राघव चड्ढा द्वारा प्रस्तावित ‘इन्फ्लेशन लिंक्ड सैलरी रिवीजन एक्ट’ यदि धरातल पर आता है, तो यह भारत के कॉर्पोरेट और श्रम जगत के इतिहास में सबसे बड़ा सुधार होगा। हालांकि, उद्योग जगत और विशेषज्ञों के बीच इस पर बहस छिड़ना लाजमी है, लेकिन मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोगों के लिए यह मांग एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरी है।

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