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उत्तराखंडफीचर्ड

अपनी ही माटी में ‘बेगाना’ हुआ उत्तराखंड का राज्य गीत? वर्षगांठ पर छलका लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी का दर्द

The Hill India News
Last updated: February 7, 2026 2:14 am
The Hill India News
Published: February 7, 2026
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देहरादून: राजनीति के गलियारों में अक्सर श्रेय लेने की होड़ मचती है, लेकिन जब बात किसी राज्य की पहचान और उसकी सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ी हो, तो यह विवाद गहरा हो जाता है। शुक्रवार को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। अवसर था उत्तराखंड राज्य गीत (Uttarakhand Rajya Geet) की वर्षगांठ का, लेकिन उत्सव के बजाय यहाँ आक्रोश और सरकारी उपेक्षा पर गहरी चिंता व्यक्त की गई।

Contents
“मातृभूमि की सेवा का पारिश्रमिक नहीं, सम्मान चाहिए था”हरीश रावत का वार: “संकीर्ण राजनीति की भेंट चढ़ी राज्य की धरोहर”6 फरवरी: अब हर साल होगा सामूहिक गायनराज्य गीत का सफर और इसकी विशेषतासरकारी उपेक्षा या राजनीतिक रणनीति?

उत्तराखंड के ‘गढ़ रत्न’ कहे जाने वाले प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने खुद इस कार्यक्रम में शिरकत की और राज्य गीत के प्रति वर्तमान सरकार के उदासीन रवैये पर अपनी पीड़ा व्यक्त की।


“मातृभूमि की सेवा का पारिश्रमिक नहीं, सम्मान चाहिए था”

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता नरेंद्र सिंह नेगी ने मंच से जब ‘उत्तराखंड देवभूमि–मातृभूमि, शत-शत वंदन, अभिनंदन…’ की पंक्तियाँ गुनगुनाईं, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो उठा। नेगी जी ने एक बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि उन्होंने इस गीत को तैयार करने के लिए सरकार से एक भी रुपया पारिश्रमिक (Fees) के रूप में नहीं लिया था।

उन्होंने कहा:

“यह गीत मैंने अपनी मातृभूमि के प्रति सेवा के रूप में बनाया था। एक कलाकार के लिए इससे बड़ा सम्मान क्या होगा कि उसका स्वर राज्य की पहचान बने। लेकिन, जिस तरह से इस गीत को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, वह अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं व्यक्तिगत रूप से राज्य गीत की इस उपेक्षा से बहुत आहत हूँ।”


हरीश रावत का वार: “संकीर्ण राजनीति की भेंट चढ़ी राज्य की धरोहर”

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, जिनके कार्यकाल में 6 फरवरी 2016 को इस गीत को आधिकारिक दर्जा दिया गया था, ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला। रावत ने कहा कि राज्य गठन के 15 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद उत्तराखंड को अपनी विशिष्ट पहचान के रूप में यह गीत मिला था।

रावत ने आरोप लगाया कि “संकीर्ण राजनीतिक सोच और श्रेय लेने की होड़ में भाजपा सरकार ने इस गीत को भुला दिया है। यह किसी पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की धरोहर है। सिर्फ इसलिए इसे हाशिए पर धकेल देना कि इसे कांग्रेस सरकार के समय अपनाया गया था, उत्तराखंड की भावनाओं के साथ सरासर अन्याय है।”


6 फरवरी: अब हर साल होगा सामूहिक गायन

कांग्रेस नेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने इस अवसर पर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और कार्यक्रम आयोजक अभिनव थापर ने संयुक्त रूप से घोषणा की कि भले ही सरकार इसे आधिकारिक कार्यक्रमों से दूर रखे, लेकिन जनता और कांग्रेस कार्यकर्ता हर साल 6 फरवरी को इस गीत का सामूहिक गायन करेंगे।

उत्तराखंड की सांस्कृतिक अस्मिता को बचाए रखने के संकल्प के साथ यह तय किया गया कि इस गीत की गूंज हर गांव और शहर तक पहुंचाई जाएगी ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।


राज्य गीत का सफर और इसकी विशेषता

‘उत्तराखंड देवभूमि–मातृभूमि’ महज एक गीत नहीं, बल्कि राज्य के भूगोल, इतिहास और संघर्ष का संकलन है।

विवरण जानकारी
गीत के बोल उत्तराखंड देवभूमि–मातृभूमि, शत-शत वंदन, अभिनंदन…
गायक नरेंद्र सिंह नेगी और अनुराधा निराला
संगीत निर्देशक नरेंद्र सिंह नेगी
आधिकारिक घोषणा 6 फरवरी 2016
चयन समिति लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ की अध्यक्षता वाली समिति

इस गीत में उत्तराखंड के पहाड़ों की सुंदरता, नदियों की कलकल और यहाँ के शहीदों के बलिदान का जिक्र है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य न करना राज्य की लोक चेतना को कमजोर करने जैसा है।


सरकारी उपेक्षा या राजनीतिक रणनीति?

कार्यक्रम में मौजूद गरिमा दसौनी और अन्य वक्ताओं ने कहा कि ‘देवभूमि की आत्मा’ को स्वर देने वाला यह गीत आज सरकारी फाइलों में दबकर रह गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में सांस्कृतिक प्रतीकों की उपेक्षा सत्ताधारी दल के लिए भारी पड़ सकती है, क्योंकि यहाँ की जनता अपनी भाषा और संगीत से गहरा भावनात्मक लगाव रखती है।

आयोजक अभिनव थापर ने भावुक होते हुए कहा कि यह वही राज्य गीत है जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बड़ी उम्मीदों के साथ जनता को समर्पित किया था, ताकि उत्तराखंड की एक अलग भाषाई और सांस्कृतिक पहचान वैश्विक मंच पर स्थापित हो सके।

देहरादून में आयोजित यह वर्षगांठ कार्यक्रम केवल एक राजनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को बचाने की एक पुकार बनकर उभरा है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार नरेंद्र सिंह नेगी जैसे सम्मानित कलाकार की पीड़ा और विपक्ष के इन सवालों का संज्ञान लेती है, या उत्तराखंड राज्य गीत इसी तरह राजनीतिक उठापटक के बीच अपनी पहचान के लिए संघर्ष करता रहेगा।

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