
मसूरी। ‘पहाड़ों की रानी‘ मसूरी में इन दिनों कड़ाके की ठंड के बीच राजनीतिक और सामाजिक पारा चरम पर है। लंबे समय से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे फुटपाथ विक्रेताओं का आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। ‘रेहड़ी-पटरी कमजोर वर्ग कल्याण समिति’ के बैनर तले आयोजित एक विशाल लोकतांत्रिक रैली ने न केवल प्रशासन की नींद उड़ा दी है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी स्पष्ट कर दिया है। पिक्चर पैलेस से किताब घर तक निकाली गई इस शांतिपूर्ण रैली में सैकड़ों व्यापारियों ने हिस्सा लिया, जिसे कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत का पुरजोर समर्थन प्राप्त हुआ।
संवैधानिक अधिकारों की मांग और अधिनियम का हवाला
इस आंदोलन के केंद्र में फुटपाथ विक्रेता (जीविका का संरक्षण और फुटपाथ विक्रय का विनियमन) अधिनियम 2014 और उत्तराखंड में लागू 2016 की नियमावली है। रैली में शामिल व्यापारियों का तर्क है कि कानून उन्हें आजीविका का अधिकार देता है, लेकिन स्थानीय प्रशासन और सरकार नियमों को ताक पर रखकर उन्हें विस्थापित करने पर तुली है।
व्यापारियों का कहना है कि वे वर्षों से माल रोड पर अपनी छोटी-छोटी दुकानें लगाकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं, लेकिन अब ‘सौंदर्यीकरण’ और ‘व्यवस्था’ के नाम पर उन्हें उनके मूल अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
हरक सिंह रावत का ‘तीखा वार’: भ्रष्टाचार और भेदभाव के आरोप
रैली में विशेष रूप से पहुंचे पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने जनसभा को संबोधित करते हुए प्रदेश की भाजपा सरकार और स्थानीय विधायक पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा, “मौजूदा सरकार गरीबों की कमर तोड़ने पर आमादा है। बिना किसी ठोस नीति और लिखित आदेश के पटरी व्यापारियों को सूची से बाहर करना ‘समानता के अधिकार’ का सीधा उल्लंघन है।”
हरक सिंह रावत ने प्रशासन पर चयनात्मक कार्रवाई का आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ व्यापारियों को राजनीतिक रसूख के चलते बैठने की अनुमति दी जा रही है, जबकि दशकों से काम कर रहे गरीब मेहनत कशों को हटाया जा रहा है। उन्होंने स्थानीय विधायक और कैबिनेट मंत्री को सीधे निशाने पर लेते हुए कृषि विभाग और सैन्य धाम परियोजना में करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहा कि एक समय उन्होंने ही मौजूदा नेतृत्व को राजनीति में आगे बढ़ने में मदद की थी, लेकिन आज वही नेतृत्व भ्रष्टाचार के दलदल में धंसा हुआ है।
आर्थिक नीतियों और बजट पर घेराबंदी
सिर्फ स्थानीय मुद्दे ही नहीं, हरक सिंह रावत ने केंद्र सरकार के हालिया बजट को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि बजट ने आम आदमी को निराशा के अलावा कुछ नहीं दिया।
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शेयर बाजार और रुपया: उन्होंने बजट के बाद बाजार में आई गिरावट और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुपये की गिरती साख को सरकार की विफल आर्थिक नीति का प्रमाण बताया।
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महंगाई का मुद्दा: सोने-चांदी की आसमान छूती कीमतों और खाद्य वस्तुओं की महंगाई को लेकर उन्होंने कहा कि भाजपा शासन में आम आदमी का घर चलाना मुश्किल हो गया है।
सामाजिक सौहार्द और 2027 का चुनावी शंखनाद
अपने संबोधन में हरक सिंह रावत ने उत्तराखंड की पारंपरिक पहचान ‘भाईचारे’ पर भी बल दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए प्रदेश को हिंदू-मुसलमान के नाम पर बांटने की साजिश रच रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि देवभूमि उत्तराखंड हमेशा से सामाजिक सौहार्द का प्रतीक रहा है और कांग्रेस ऐसी किसी भी विभाजनकारी कोशिश का पुरजोर विरोध करेगी।
उन्होंने घोषणा की कि मसूरी के पटरी व्यापारियों की यह लड़ाई अब कांग्रेस की लड़ाई है। जब तक हर एक पात्र व्यापारी को माल रोड पर सम्मानजनक स्थान नहीं मिल जाता, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा। इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में जनता इस अन्याय का बदला लेगी और प्रदेश में कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी।
प्रशासनिक रुख और आगे की राह
पटरी व्यापारियों की इस रैली ने स्थानीय प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है। व्यापारियों की मांग है कि:
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वेंडिंग जोन का स्पष्ट निर्धारण: 2014 के अधिनियम के तहत उन्हें उचित स्थान दिया जाए।
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पारदर्शी सर्वे: बिना किसी भेदभाव के सभी पुराने विक्रेताओं का पंजीकरण सुनिश्चित हो।
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उत्पीड़न पर रोक: पुलिस और नगर पालिका द्वारा की जा रही जब्ती की कार्रवाई को तुरंत रोका जाए।
समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर गौर नहीं किया गया, तो वे अपने आंदोलन को और उग्र करेंगे। वहीं, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हरक सिंह रावत की एंट्री ने इस स्थानीय मुद्दे को प्रदेश स्तरीय राजनीतिक बहस में बदल दिया है।
पर्यटन और आजीविका के बीच संतुलन की चुनौती
मसूरी जैसे पर्यटन स्थल के लिए माल रोड की सुव्यवस्था जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी वहां के गरीब व्यापारियों की आजीविका भी है। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे कानून के दायरे में रहकर बीच का रास्ता निकालें, ताकि पर्यटन की छवि भी बनी रहे और ‘स्ट्रीट वेंडर्स’ के संवैधानिक अधिकारों का हनन भी न हो। फिलहाल, मसूरी की फिजाओं में गूंजते ‘इंकलाब’ के नारों ने यह साफ कर दिया है कि यह लड़ाई लंबी खिंचने वाली है।



