
रामनगर (नैनीताल)। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल स्थित आस्था के केंद्र और विश्व प्रसिद्ध गर्जिया देवी मंदिर के ऐतिहासिक टीले को सुरक्षित करने के लिए सिंचाई विभाग ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। कोसी नदी के बीचों-बीच स्थित इस मंदिर की नींव को मजबूती देने के लिए करीब 12 करोड़ रुपये की लागत से चल रहे सुरक्षात्मक कार्यों का निरीक्षण करने पहुंचे मुख्य अभियंता संजय शुक्ल ने स्पष्ट कर दिया है कि मानसून की पहली दस्तक से पहले मंदिर को ‘सुरक्षा घेरे’ में लेना अनिवार्य है।
संकट में था मंदिर का अस्तित्व: 2010 की बाढ़ का वो दंश
गर्जिया देवी मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और उत्तराखंड पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र भी है। हालांकि, प्रकृति के थपेड़ों ने इसकी नींव को कमजोर कर दिया था। गौरतलब है कि साल 2010 में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद मंदिर के प्राकृतिक टीले में गहरी दरारें दिखाई देने लगी थीं। बीते वर्षों में ये दरारें न केवल चौड़ी हुईं, बल्कि मंदिर की ऊपरी संरचना के लिए भी गंभीर खतरा बन गईं।
कोसी नदी के लगातार हो रहे कटाव और ढीले होते पत्थरों (ब्लॉक्स) के कारण टीला नीचे की ओर स्लाइड हो रहा था। हजारों श्रद्धालुओं की सुरक्षा और मंदिर के पौराणिक महत्व को देखते हुए सिंचाई विभाग ने शासन को इसके जीर्णोद्धार का प्रस्ताव भेजा था, जिस पर अब युद्ध स्तर पर काम हो रहा है।
निर्माण कार्य में तेजी: 8 नहीं, अब 12 घंटे चलेगी शिफ्ट
निरीक्षण के दौरान मुख्य अभियंता संजय शुक्ल ने कार्य की धीमी गति और भविष्य की चुनौतियों को भांपते हुए कड़े निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में कार्य की मात्रा (क्वांटिटी) में वृद्धि हुई है, जिसके कारण एस्टीमेट को रिवाइज किया गया है।
परियोजना की संवेदनशीलता को देखते हुए मुख्य अभियंता ने आदेश दिया है कि:
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कार्य के घंटे बढ़ाए जाएं: अब साइट पर काम 8 घंटे के बजाय 12 घंटे या उससे अधिक समय तक चलेगा।
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दो शिफ्ट में काम: आवश्यकतानुसार मजदूरों और तकनीकी टीम को दो शिफ्टों में तैनात करने को कहा गया है ताकि समय की बचत हो सके।
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समय सीमा में विस्तार: हालांकि जून तक लक्ष्य रखा गया था, लेकिन तकनीकी कारणों और बढ़े हुए कार्यभार को देखते हुए ‘टाइम एक्सटेंशन’ (समय विस्तार) दिया जाएगा, लेकिन मानसून पूर्व के लक्ष्य में कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी।
मानसून से पहले ‘रिटेनिंग वॉल’ का लक्ष्य
सिंचाई विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोसी नदी का जलस्तर बढ़ने से पहले पानी के भीतर होने वाले कार्यों को पूरा करना है। मुख्य अभियंता ने बताया कि मानसून से पहले HFL (Highest Flood Level) यानी उच्चतम बाढ़ स्तर तक रिटेनिंग वॉल का निर्माण हर हाल में पूरा किया जाना अनिवार्य है।
“हमारा प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मानसून आने तक अब तक किया गया कार्य और मंदिर का टीला पूरी तरह सुरक्षित हो जाए। यदि हम जलस्तर बढ़ने से पहले रिटेनिंग वॉल और फाउंडेशन का काम पूरा कर लेते हैं, तो बाढ़ का खतरा काफी हद तक टल जाएगा। शेष फिनिशिंग और प्लाटिंग का कार्य मानसून के बाद किया जा सकता है।” — संजय शुक्ल, मुख्य अभियंता
सेकंड फेज का कार्य: कटाव रोकने की रणनीति
परियोजना वर्तमान में अपने दूसरे चरण (Second Phase) में है। मई 2024 में पहले चरण का कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण होने के बाद, अब सारा ध्यान नदी की ओर से हो रहे भू-कटाव को रोकने पर है। इस चरण में निम्नलिखित तकनीकी पहलुओं पर काम किया जा रहा है:
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स्लाइड कंट्रोल: टीले के उन हिस्सों को ग्राउटिंग और अन्य विधियों से मजबूत किया जा रहा है जो नीचे की ओर खिसक रहे हैं।
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ब्लॉक स्टेबलाइजेशन: ढीले हो रहे ब्लॉक्स को कंक्रीट और विशेष तकनीकी सपोर्ट से बांधा जा रहा है।
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पानी के भीतर निर्माण: नदी के बहाव के बीच फाउंडेशन को मजबूती देने के लिए ‘वाटरप्रूफिंग’ और विशेष रिटेनिंग वॉल का निर्माण किया जा रहा है।
गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं
संजय शुक्ल ने स्थानीय विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों को हिदायत दी है कि निर्माण सामग्री और तकनीकी मानकों में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। चूंकि यह कार्य सीधे तौर पर मंदिर के अस्तित्व और हजारों लोगों की जान से जुड़ा है, इसलिए गुणवत्ता की निरंतर मॉनिटरिंग के निर्देश दिए गए हैं।
श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों में जगी उम्मीद
गर्जिया मंदिर में चल रहे इस व्यापक सुरक्षा कार्य से स्थानीय व्यापारियों और श्रद्धालुओं ने राहत की सांस ली है। कोसी नदी के रौद्र रूप को देखते हुए हर साल बरसात में मंदिर के ढहने की आशंका बनी रहती थी। ₹12 करोड़ की यह सुरक्षा योजना न केवल मंदिर को दीर्घायु प्रदान करेगी, बल्कि कुमाऊं के पर्यटन मानचित्र पर इस पौराणिक स्थल की चमक को भी बरकरार रखेगी।



