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पहाड़ की ‘आत्मा’ बचाने की पुकार: घोस्ट विलेज पातली से सांसद अनिल बलूनी का आह्वान—’अपना घर, अपनी मिट्टी और अपना वोट’ न भूलें

पौड़ी/देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ आज एक मौन त्रासदी से गुजर रहे हैं। सुंदर नक्काशीदार घरों वाले वे गांव, जहां कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, आज ‘घोस्ट विलेज’ (Ghost Villages) के ठप्पे के साथ सन्नाटे में डूबे हैं। इसी सन्नाटे को तोड़ने और प्रवासियों की सोई हुई संवेदनाओं को जगाने के लिए गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी शुक्रवार को पौड़ी जिले के कोट ब्लॉक स्थित निर्जन हो चुके पातली गांव पहुंचे।

यह दौरा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि पहाड़ के अस्तित्व, संस्कृति और भविष्य को बचाने के लिए एक ‘जन-जागरण’ अभियान की शुरुआत थी। सांसद बलूनी ने यहां प्रवासियों से सीधा संवाद किया और उनसे अपने पैतृक गांवों को पुनर्जीवित करने का वचन मांगा।

‘घोस्ट विलेज’ की दहलीज पर भावुक हुए प्रवासी

पातली गांव आज उन सैकड़ों गांवों की सूची में शामिल है, जहां से बुनियादी सुविधाओं और रोजगार की तलाश में लोग पलायन कर चुके हैं। सांसद की पहल पर इस दिन देहरादून, दिल्ली और अन्य महानगरों में बसे कई ग्रामीण वापस अपने गांव लौटे। खंडहरों में तब्दील होते अपने पुश्तैनी घरों को देखकर प्रवासियों की आंखों में आंसू छलक आए।

संवाद के दौरान अनिल बलूनी का पहाड़ प्रेम उस समय स्पष्ट दिखा जब उन्होंने कहा, “अपनी आंखों के सामने अपने ही गांव को घोस्ट विलेज में तब्दील होते देखना हृदयविदारक है। यह केवल ईंट-पत्थरों के घरों के खाली होने का सवाल नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की गौरवशाली परंपरा और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।”

राजनीतिक अस्तित्व पर मंडराता खतरा: ‘कम होती विधानसभा सीटें’

सांसद बलूनी ने प्रवासियों के सामने एक बहुत ही गंभीर और व्यावहारिक चिंता रखी—पहाड़ का घटता राजनीतिक प्रतिनिधित्व। उन्होंने आंकड़ों के जरिए बताया कि कैसे पलायन के कारण पहाड़ की आवाज कमजोर हो रही है:

  • पौड़ी जिला: पहले 8 विधानसभा सीटें थीं, जो अब घटकर 06 रह गई हैं। भविष्य में इनके 4 या 5 होने का खतरा है।

  • चमोली: 4 विधानसभा सीटें थीं, जो आने वाले समय में केवल 2 रह सकती हैं।

  • अन्य जिले: नैनीताल और पिथौरागढ़ जैसे सीमांत जिलों में भी यही स्थिति बन रही है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि गांव खाली होते रहे, तो भविष्य में संसद और विधानसभा में पहाड़ की बात रखने वाले प्रतिनिधि ही नहीं बचेंगे। पहाड़ को आबाद रखना केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरी भी है।

सुरक्षा के ‘प्रथम प्रहरी’ हैं ग्रामीण

उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति का जिक्र करते हुए अनिल बलूनी ने कहा कि हमारा प्रदेश चीन की सीमा से सटा हुआ है। उन्होंने कहा, “उच्च हिमालयी क्षेत्रों के ग्रामीण हमारे लिए ‘सोल्जर’ (Soldier) की तरह हैं। खाली होते सीमांत गांव राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं। इन गांवों को गुलजार करना देश की सुरक्षा को मजबूत करना है।”

रिवर्स माइग्रेशन के लिए ‘तीन सूत्रीय’ मंत्र

सांसद बलूनी ने प्रवासियों के सामने एक बहुत ही सरल और प्रभावी समाधान रखा। उन्होंने अपील की कि हर प्रवासी को अपने गांव से जुड़ने के लिए कम से कम तीन काम जरूर करने चाहिए:

  1. लोकपर्व का आयोजन: साल में कम से कम एक बड़ा लोकपर्व (जैसे इगास या होली) अपने गांव में मनाएं।

  2. पारिवारिक उत्सव: परिवार के किसी एक सदस्य का जन्मदिन या विवाह कार्यक्रम गांव में आयोजित करें। इससे नई पीढ़ी अपने पुरुखों और विरासत से परिचित होगी।

  3. अपना वोट, अपना गांव: ‘अपना वोट, अपने गांव’ मुहिम के जरिए अपनी राजनीतिक जड़ें गांव में ही रखें।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वाइब्रेंट बॉर्डर विलेज’ और ‘वेडिंग इन उत्तराखंड’ विजन का हवाला देते हुए पूछा कि जब दुनिया उत्तराखंड में शादी करने आ सकती है, तो क्या हम अपने निजी आयोजनों के लिए अपने गांव नहीं लौट सकते?


इगास से लेकर वाइब्रेंट विलेज तक: एक निरंतर प्रयास

अनिल बलूनी पिछले कई वर्षों से उत्तराखंड के निर्जन गांवों को आबाद करने के लिए समर्पित रहे हैं। उन्होंने ‘इगास’ (बूढ़ी दीपावली) के माध्यम से प्रवासियों को गांव बुलाने की जो परंपरा शुरू की, उसका असर अब धरातल पर दिखने लगा है। पातली गांव में उमड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण है कि लोग अब अपने मूल की ओर लौटना चाहते हैं, बस उन्हें एक सकारात्मक नेतृत्व की जरूरत है।

“पहाड़ की पीड़ा केवल संवाद से दूर नहीं होगी, इसके लिए सामूहिक इच्छाशक्ति चाहिए। सरकार सुविधाएं दे सकती है, लेकिन घर में दीया जलाना प्रवासियों का ही काम है।” — अनिल बलूनी, सांसद गढ़वाल

भविष्य की राह: सुविधाओं और भावनाओं का संगम

सांसद ने आश्वासन दिया कि वे सरकार के स्तर पर बुनियादी सुविधाओं—सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा—को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने प्रवासियों से आग्रह किया कि वे होम-स्टे और कृषि आधारित योजनाओं का लाभ उठाकर स्वरोजगार की ओर बढ़ें। यह पहल केवल पातली गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे पूरे उत्तराखंड के निर्जन गांवों के लिए एक मॉडल बनाने की तैयारी है।

अनिल बलूनी का पातली दौरा एक स्पष्ट संदेश देता है: पहाड़ के गांव तभी बचेंगे जब वहां के लोग अपनी मिट्टी से जुड़ाव महसूस करेंगे। ‘घोस्ट विलेज’ के दाग को धोने के लिए केवल सरकारी नीतियां काफी नहीं हैं, बल्कि ‘रिवर्स माइग्रेशन’ को एक जन आंदोलन बनाना होगा। यदि आज प्रवासी नहीं जागे, तो कल हमारी संस्कृति केवल किताबों और तस्वीरों तक सीमित रह जाएगी।

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