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उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने संविदा फार्मासिस्टों की नई याचिका को किया खारिज, ‘रेजुडिकाटा’ के सिद्धांत का दिया हवाला

The Hill India News
Last updated: January 27, 2026 2:34 pm
The Hill India News
Published: January 27, 2026
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नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हेमवती नंदन बहुगुणा बेस अस्पताल, श्रीनगर में लंबे समय से कार्यरत संविदा फार्मासिस्टों को बड़ा कानूनी झटका दिया है। न्यायालय ने 14 वर्षों से सेवा दे रहे कर्मचारियों द्वारा दायर नई याचिका को सुनने से इनकार करते हुए उसे सिरे से खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति आलोक महरा की अवकाश कालीन एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि जब एक ही विषय पर न्यायालय पहले ही विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर चुका है और उन आदेशों के अनुपालन की समय-सीमा अभी शेष है, तो बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाना न्यायसंगत नहीं है।

Contents
क्या है पूरा मामला?‘रेजुडिकाटा’ के आधार पर याचिका खारिजनियमितीकरण नियमावली 2025 और सरकार का पक्षसंविदा कर्मचारियों के भविष्य पर क्या होगा असर?

क्या है पूरा मामला?

मामले की जड़ें वर्ष 2024 की एक भर्ती विज्ञप्ति से जुड़ी हैं। दरअसल, चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 19 अक्टूबर 2024 को 73 फार्मासिस्टों के पदों पर सीधी भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। इस विज्ञापन को बेस अस्पताल श्रीनगर में 2011 से कार्यरत उपेंद्र बंगवाल व अन्य संविदा फार्मासिस्टों ने चुनौती दी थी। उनकी मुख्य चिंता यह थी कि नई भर्ती होने से उनकी वर्षों की सेवा और भविष्य के नियमितीकरण (Regularization) के अवसर समाप्त हो सकते हैं।

पूर्व में इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देशित किया था कि वह छह माह के भीतर इन संविदा कर्मियों के नियमितीकरण की पात्रता की जांच के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन करे। साथ ही, अंतरिम राहत देते हुए कोर्ट ने कहा था कि जब तक समिति कोई अंतिम निर्णय नहीं ले लेती, तब तक इन कर्मचारियों की सेवा में कोई व्यवधान (Disturbance) पैदा नहीं किया जाएगा।

‘रेजुडिकाटा’ के आधार पर याचिका खारिज

मौजूदा सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति आलोक महरा ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने फिर से उन्हीं मांगों को लेकर नई याचिका दायर की है जो पिछली याचिका में शामिल थीं। कानूनी शब्दावली में इसे ‘रेजुडिकाटा’ (Res Judicata) कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि यदि किसी सक्षम न्यायालय ने किसी विषय पर अंतिम निर्णय दे दिया है, तो उसी पक्षकार द्वारा उन्हीं तथ्यों के आधार पर दोबारा मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि चूंकि पूर्व में दिए गए ‘6 महीने की सुरक्षा’ और ‘समीक्षा अवधि’ का समय अभी समाप्त नहीं हुआ है, इसलिए वर्तमान में नई याचिका दायर करने का कोई ठोस या नया आधार (Cause of Action) मौजूद नहीं है।

नियमितीकरण नियमावली 2025 और सरकार का पक्ष

सुनवाई के दौरान उत्तराखंड सरकार की नई नियमितीकरण नियमावली का भी उल्लेख हुआ। राज्य सरकार ने 5 दिसंबर 2025 को अपनी नियमावली में संशोधन किया है। नए नियमों के प्रावधानों के अनुसार:

  1. केवल वे ही संविदा कर्मचारी नियमितीकरण के पात्र होंगे जिन्होंने 4 दिसंबर 2018 तक 10 साल की निरंतर सेवा पूरी कर ली हो।

  2. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वे 2011 से कार्यरत हैं, अतः वे इस श्रेणी में आते हैं।

राज्य सरकार के अधिवक्ताओं ने अदालत को आश्वस्त किया कि याचियों के प्रत्यावेदन (Representations) अभी विभाग के विचाराधीन हैं। चयन प्रक्रिया को लेकर सरकार ने बताया कि 19 अक्टूबर 2024 के विज्ञापन के आधार पर भर्ती प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है और सफल अभ्यर्थियों का परिणाम 17 जनवरी 2026 को पहले ही घोषित किया जा चुका है।

संविदा कर्मचारियों के भविष्य पर क्या होगा असर?

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल संविदा फार्मासिस्टों के पास विभाग की उस समिति की रिपोर्ट का इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, जिसे कोर्ट ने गठित करने का आदेश दिया था। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नई भर्ती प्रक्रिया जारी रह सकती है, लेकिन मौजूदा संविदा कर्मियों को दिसंबर 2025 में मिली अंतरिम सुरक्षा तब तक जारी रहेगी जब तक उनके नियमितीकरण पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला उत्तराखंड में संविदा पर तैनात हजारों अन्य कर्मचारियों के लिए भी नजीर बनेगा। सरकार के पास अब कुछ ही महीनों का समय बचा है जब उसे यह तय करना होगा कि 14 वर्षों से सेवा दे रहे इन कर्मचारियों को पक्की नौकरी दी जाए या उन्हें नई भर्ती के सफल अभ्यर्थियों के लिए रास्ता खाली करना होगा।

नैनीताल हाईकोर्ट का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने और अनावश्यक मुकदमों की बाढ़ रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि राहत पाने के लिए कानून की प्रक्रिया का सम्मान करना अनिवार्य है। अब सबकी नजरें उत्तराखंड शासन की उस समिति पर टिकी हैं, जिसे इन फार्मासिस्टों के 14 साल के संघर्ष और भविष्य का फैसला करना है।

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