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Uttarakhand: सुमित पटवाल हत्याकांड: हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों को किया बरी, निचली अदालत का उम्रकैद का फैसला रद्द

The Hill India News
Last updated: January 10, 2026 12:49 pm
The Hill India News
Published: January 10, 2026
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नैनीताल | उत्तराखंड के कोटद्वार के चर्चित सुमित पटवाल हत्याकांड में नैनीताल हाईकोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा आरोपियों को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए तीनों मुख्य आरोपियों को तत्काल प्रभाव से बरी करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) आरोपियों के खिलाफ अपराध सिद्ध करने के लिए आवश्यक ‘पुख्ता कड़ियाँ’ जोड़ने में पूरी तरह विफल रहा है।

Contents
क्या था मामला? (घटनाक्रम पर एक नज़र)हाईकोर्ट के फैसले के 5 मुख्य आधार: क्यों बरी हुए आरोपी?1. धारा 65B और सीसीटीवी फुटेज की विफलता2. फॉरेंसिक रिपोर्ट और ‘चेन ऑफ कस्टडी’ में खामी3. चश्मदीद गवाहों का मुकरना4. सार्वजनिक स्थानों से हथियारों की बरामदगी5. सुसाइड नोट जैसी चिट्ठी की वैधता‘अधूरी श्रृंखला’ और न्याय का सिद्धांतजेल से तत्काल रिहाई के आदेशकानूनी विशेषज्ञों की राय

क्या था मामला? (घटनाक्रम पर एक नज़र)

यह मामला करीब एक दशक पुराना है। 22 मार्च 2015 को कोटद्वार के बेलाघाट क्रॉसिंग पर दिनदहाड़े सनसनीखेज वारदात हुई थी। बाइक सवार हमलावरों ने प्रॉपर्टी डीलर सुमित पटवाल की अंधाधुंध गोलियां बरसाकर हत्या कर दी थी। इस हत्याकांड ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने विशाल उर्फ जॉली, जोनी शर्मा और दीपक सिंह रावत समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया था। निचली अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर इन्हें दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।


हाईकोर्ट के फैसले के 5 मुख्य आधार: क्यों बरी हुए आरोपी?

नैनीताल हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में जांच प्रणाली और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने माना कि केवल संदेह के आधार पर किसी को अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता।

1. धारा 65B और सीसीटीवी फुटेज की विफलता

हाईकोर्ट ने इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (CCTV Footage) की साख को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत अनिवार्य ‘प्रमाण पत्र’ (Certificate) के बिना किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। पुलिस ने तकनीकी पहलुओं की अनदेखी की, जिसके कारण सीसीटीवी फुटेज कानूनी रूप से मान्य नहीं रहा।

2. फॉरेंसिक रिपोर्ट और ‘चेन ऑफ कस्टडी’ में खामी

न्यायालय ने फॉरेंसिक रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने पाया कि मृतक के शरीर से निकाली गई गोलियों को फॉरेंसिक लैब तक भेजने की प्रक्रिया (Chain of Custody) संदिग्ध थी। पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि डॉक्टर द्वारा सौंपी गई गोलियां मजिस्ट्रेट से होते हुए लैब तक पूरी तरह सुरक्षित और सीलबंद अवस्था में पहुँची थीं। इस प्रक्रियात्मक अंतराल (Gap) का लाभ आरोपियों को मिला।

3. चश्मदीद गवाहों का मुकरना

अभियोजन पक्ष की कहानी तब पूरी तरह धराशायी हो गई जब कोई भी चश्मदीद गवाह अदालत में अपने बयानों पर कायम नहीं रहा। कई महत्वपूर्ण गवाहों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनसे डरा-धमकाकर या जबरन खाली दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए थे। कोर्ट ने इसे अभियोजन की एक बड़ी विफलता माना।

4. सार्वजनिक स्थानों से हथियारों की बरामदगी

पिस्तौल की बरामदगी को लेकर कोर्ट ने कहा कि जोनी शर्मा और विशाल के पास से हथियारों की बरामदगी खुले और सार्वजनिक स्थानों से हुई थी। कानून के अनुसार, ऐसी जगह जहाँ किसी का भी नियंत्रण हो सकता है, वहां से हुई बरामदगी को आरोपी के खिलाफ निर्णायक और अकाट्य सबूत (Conclusive Proof) नहीं माना जा सकता।

5. सुसाइड नोट जैसी चिट्ठी की वैधता

मृतक सुमित पटवाल द्वारा पूर्व में लिखी गई एक चिट्ठी, जिसे अभियोजन पक्ष ने रंजिश का मुख्य आधार बनाया था, उसे भी कोर्ट ने अपर्याप्त माना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल हस्ताक्षर की पहचान कर लेने से फोटोकॉपी दस्तावेज के भीतर लिखी गई बातों की सत्यता प्रमाणित नहीं हो जाती।


‘अधूरी श्रृंखला’ और न्याय का सिद्धांत

हाईकोर्ट ने अपने फैसले के अंत में कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र (Criminal Jurisprudence) का सिद्धांत कहता है कि भले ही सौ गुनहगार बच जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। खंडपीठ ने माना कि इस मामले में घटनाओं की श्रृंखला (Chain of Events) अधूरी है और अभियोजन पक्ष “संदेह से परे” (Beyond Reasonable Doubt) आरोप साबित नहीं कर पाया है।

जेल से तत्काल रिहाई के आदेश

उच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद आरोपी विशाल, जोनी शर्मा और दीपक सिंह रावत की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है। कोर्ट ने संबंधित जेल प्रशासन को तीनों अपीलकर्ताओं को तत्काल रिहा करने के आदेश दिए हैं। मामले के चौथे आरोपी सुरेंद्र सिंह की पहले ही अपील के दौरान मृत्यु हो चुकी है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए एक सबक है। विशेषकर डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों को संभालते समय कानूनी प्रक्रियाओं (जैसे धारा 65B) का पालन न करना पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है। सुमित पटवाल हत्याकांड का यह परिणाम एक बार फिर यह संदेश देता है कि अदालतें केवल भावनात्मक दलीलों पर नहीं, बल्कि कठोर और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय लेती हैं।

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