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उत्तराखंडफीचर्ड

Uttarakhand: अंकिता भंडारी हत्याकांड में CBI जांच की घोषणा के बाद ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ पर छिड़ी रार, कांग्रेस ने उठाए सरकार की नीयत पर सवाल

The Hill India News
Last updated: January 10, 2026 12:45 pm
The Hill India News
Published: January 10, 2026
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उत्तराखंड कांग्रेस
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देहरादून | उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय की मांग एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में गूँज उठी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा मामले की जांच सीबीआई (CBI) से कराने की संस्तुति के बाद, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे ‘अधूरा न्याय’ और ‘जांच भटकाने की नई चाल’ करार दिया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाते हुए ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ (Terms of Reference) को सार्वजनिक करने की पुरजोर मांग की है।

Contents
“क्या छिपा रही है सरकार?” – गणेश गोदियाल का सीधा प्रहार‘वीआईपी’ पर जांच सीमित करने का आरोपकांग्रेस की मांग: जांच के दायरे में शामिल हों ये बिंदुहरीश रावत ने बताया ‘अधूरा न्याय’11 जनवरी को बड़े आंदोलन की तैयारीसरकार का पक्ष और आगामी चुनौतियां

“क्या छिपा रही है सरकार?” – गणेश गोदियाल का सीधा प्रहार

शनिवार को देहरादून में मीडिया से मुखातिब होते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अंकिता भंडारी मामले में सीबीआई जांच की मांग पूरे प्रदेश की मातृशक्ति, सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने एकजुट होकर की थी। लेकिन अब जब सरकार ने झुककर सीबीआई जांच की सिफारिश की है, तो वह इसकी शर्तों (Terms of Reference) को सार्वजनिक करने से बच रही है।

गोदियाल ने आरोप लगाया, “सरकार ने पहले दिन से इस जांच को दबाने और भटकाने का प्रयास किया है। हम जानना चाहते हैं कि केंद्र सरकार को भेजे गए प्रत्यावेदन में जांच के बिंदु क्या हैं? आखिर सरकार उसे जनता के सामने क्यों नहीं ला रही है? सरकार की नीयत में खोट है, इसलिए वह तथ्यों को छिपा रही है।”

‘वीआईपी’ पर जांच सीमित करने का आरोप

अंकिता भंडारी प्रकरण में शुरू से ही एक ‘कथित वीआईपी’ का जिक्र आता रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार इस वीआईपी को बचाने के लिए कानूनी दांव-पेच खेल रही है। गोदियाल ने दावा किया कि उनकी जानकारी के अनुसार, सरकार ने सीबीआई जांच के दायरे को बेहद सीमित कर दिया है।

उन्होंने कहा, “सरकार सीबीआई जांच को केवल इस बिंदु पर सीमित करना चाहती है कि कोई वीआईपी था या नहीं? वे इसे एक ‘हाइपोथेटिकल’ (काल्पनिक) सवाल बनाना चाहते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि उस वीआईपी की मौजूदगी के ठोस संकेत मिलते रहे हैं। सरकार की यह नई चाल आरोपियों को बचाने के लिए बुनी गई है।”

कांग्रेस की मांग: जांच के दायरे में शामिल हों ये बिंदु

विपक्ष ने मांग की है कि सीबीआई जांच केवल सतह पर न होकर गहराई तक होनी चाहिए। कांग्रेस ने निम्नलिखित बिंदुओं को जांच के दायरे में शामिल करने की मांग की है:

  1. संपर्क विवरण: अंकिता ने रिजॉर्ट में नौकरी शुरू करने के दिन से लेकर अपनी अंतिम सांस तक किन-किन प्रभावशाली लोगों से फोन पर बात की?

  2. डिजिटल साक्ष्य: अंकिता की अपने मित्र के साथ हुई चैट और फोन रिकॉर्डिंग की वास्तविकता और उसमें छिपे सच को उजागर किया जाए।

  3. रिजॉर्ट की गतिविधियां: हत्याकांड से पहले रिजॉर्ट में आने वाले ‘विशिष्ट मेहमानों’ की पहचान और उनके रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच हो।


हरीश रावत ने बताया ‘अधूरा न्याय’

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है। उन्होंने सीबीआई जांच की सिफारिश को ‘देर से लिया गया और अधूरा फैसला’ बताया। रावत ने कहा कि जब तक जांच की शर्तें और बिंदु सार्वजनिक नहीं होते, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि न्याय होगा। उन्होंने न्यायिक देखरेख (Judicial Supervision) में सीबीआई जांच की आवश्यकता पर जोर दिया।

11 जनवरी को बड़े आंदोलन की तैयारी

अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए उत्तराखंड में जन-आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। गणेश गोदियाल ने घोषणा की है कि 11 जनवरी को राज्य के तमाम सामाजिक संगठन, विपक्षी दल और जागरूक नागरिक सड़कों पर उतरेंगे। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य पारदर्शी और तटस्थ जांच के लिए सरकार पर दबाव बनाना है।

कांग्रेस का कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं और जांच के बिंदुओं को सार्वजनिक नहीं किया जाता, तब तक विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा। पार्टी ने स्पष्ट किया कि वे उत्तराखंड की ‘बेटी’ के सम्मान और प्रदेश की ‘अस्मिता’ के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे।

सरकार का पक्ष और आगामी चुनौतियां

हालांकि, मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से यह स्पष्ट किया जा चुका है कि सरकार इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रही है और इसीलिए सीबीआई जांच की संस्तुति की गई है। लेकिन विपक्ष के इन ताजा आरोपों ने सरकार के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। अब गेंद शासन के पाले में है कि क्या वह ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ को सार्वजनिक कर विपक्ष के सवालों का जवाब देती है या यह कानूनी और राजनीतिक खींचतान अभी और लंबी खिंचेगी।

अंकिता भंडारी हत्याकांड केवल एक आपराधिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह उत्तराखंड की न्याय प्रणाली और राजनीतिक शुचिता की परीक्षा बन गया है। सीबीआई जांच की घोषणा एक कदम तो है, लेकिन इसकी पारदर्शिता ही यह तय करेगी कि अंकिता को वास्तव में न्याय मिला या नहीं।

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