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तिरुपति लड्डू विवाद: पूर्व TTD अध्यक्ष वाईवी सुब्बा रेड्डी को दिल्ली हाई कोर्ट से झटका, अंतरिम राहत देने से इनकार

नयी दिल्ली | डिजिटल डेस्क: तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद वाईवी सुब्बा रेड्डी (YV Subba Reddy) को दिल्ली उच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने तिरुपति मंदिर के प्रसाद (लड्डू) में मिलावट के आरोपों से जुड़े कथित मानहानिकारक लेखों के खिलाफ रेड्डी द्वारा दायर अंतरिम राहत की याचिका को खारिज कर दिया है।

न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि फिलहाल प्रतिवादियों (मीडिया घरानों और प्रकाशकों) के खिलाफ किसी भी तरह का अस्थायी रोक आदेश (Injunction Order) जारी करने का पर्याप्त आधार नहीं है।


क्या है पूरा मामला? (The Tirupati Laddu Controversy)

आंध्र प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर में दिए जाने वाले ‘श्रीवारी प्रसादम’ (लड्डू) की शुद्धता को लेकर हाल ही में एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हुआ था। वर्तमान आंध्र प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया था कि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान लड्डुओं को बनाने में इस्तेमाल होने वाले घी में जानवरों की चर्बी (Animal Fat) की मिलावट की गई थी।

वाईवी सुब्बा रेड्डी, जो जून 2019 से अगस्त 2023 तक TTD के अध्यक्ष रहे, ने इन आरोपों को निराधार बताया था। उन्होंने कई मीडिया घरानों, लेखकों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उनके खिलाफ “भ्रामक और मानहानिकारक” लेख प्रकाशित करने का आरोप लगाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया था।


अदालत की कार्यवाही और सुब्बा रेड्डी की दलीलें

अदालत में दायर अपनी याचिका में सुब्बा रेड्डी ने तर्क दिया कि उनके कार्यकाल के दौरान मंदिर की शुचिता का पूरा ध्यान रखा गया था। उन्होंने निम्नलिखित मांगें रखी थीं:

  • उनके खिलाफ प्रकाशित “अपमानजनक” लेखों को तुरंत हटाया जाए।

  • भविष्य में इस तरह के किसी भी कंटेंट के प्रकाशन पर रोक लगाई जाए।

  • संबंधित मीडिया घरानों से बिना शर्त माफी की मांग।

हालांकि, प्रतिवादियों की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि प्रकाशित लेख उपलब्ध रिपोर्टों और सार्वजनिक रूप से जारी किए गए बयानों पर आधारित हैं, और इसे मानहानि नहीं माना जा सकता।


दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख: क्यों नहीं मिली अंतरिम राहत?

दिल्ली हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है। अदालत ने कहा:

“वर्तमान स्तर पर, रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखते हुए, प्रतिवादियों को उनके संवैधानिक अधिकारों (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) से रोकने के लिए कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक हितों (Public Interest) से जुड़े मामलों में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, और जब तक यह साबित न हो जाए कि लेख पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण (Malice) हैं, तब तक उन पर रोक लगाना उचित नहीं है।


राजनीतिक गलियारों में हलचल

तिरुमाला लड्डू विवाद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) और तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के बीच इस मुद्दे को लेकर तीखी बयानबाजी जारी है। वाईवी सुब्बा रेड्डी का कहना है कि यह उनकी छवि को धूमिल करने की एक सोची-समझी साजिश है, जबकि सत्ता पक्ष इसे करोड़ों भक्तों की आस्था के साथ खिलवाड़ बता रहा है।

TTD प्रशासन और शुद्धता के मानक

विवाद के बाद, TTD ने अब घी की आपूर्ति और लड्डुओं की गुणवत्ता जांच के लिए कड़े प्रोटोकॉल लागू किए हैं। मंदिर प्रशासन ने अपनी खुद की लैब स्थापित करने और एनडीडीबी (NDDB) से तकनीकी सहायता लेने का भी निर्णय लिया है।


आगे क्या होगा?

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम राहत से इनकार करने के बाद, अब यह मामला नियमित सुनवाई की प्रक्रिया से गुजरेगा। कोर्ट ने सभी प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है।

यह फैसला उन सभी राजनेताओं और सार्वजनिक हस्तियों के लिए एक नजीर है जो मीडिया की रिपोर्टिंग पर तत्काल रोक की मांग करते हैं। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में चल रहे समानांतर मामलों पर टिकी हैं, जो इस ‘महाप्रसाद’ की शुद्धता और जांच प्रक्रिया से जुड़े हैं।

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