
नई दिल्ली | विशेष संवाददाता राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने हरियाणा के कुख्यात गैंगस्टर विकास गुलिया और उसके सक्रिय सहयोगी के खिलाफ ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उन्हें आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा सुनाई है। यह कार्रवाई महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के कड़े प्रावधानों के तहत की गई है। 1 जनवरी 2026 को सुनाए गए इस फैसले ने संगठित अपराध करने वाले गिरोहों के बीच एक कड़ा संदेश भेजा है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि समाज में भय पैदा करने वाले और संगठित सिंडिकेट चलाने वाले अपराधियों के साथ कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।
मकोका (MCOCA) के तहत चला मुकदमा: क्या था मामला?
गैंगस्टर विकास गुलिया लंबे समय से दिल्ली और हरियाणा में हत्या, रंगदारी और डकैती जैसे दर्जनों संगीन मामलों में वांछित था। जांच एजेंसियों ने पाया कि गुलिया केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं कर रहा था, बल्कि वह एक संगठित अपराध सिंडिकेट (Organized Crime Syndicate) चला रहा था।
कानूनी प्रक्रिया की मुख्य बातें:
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मकोका का शिकंजा: दिल्ली पुलिस ने गुलिया के खिलाफ मकोका के तहत मामला दर्ज किया था, जो विशेष रूप से संगठित अपराध को रोकने के लिए बनाया गया एक सख्त कानून है।
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सहयोगी को भी सजा: अदालत ने न केवल मुख्य गैंगस्टर गुलिया, बल्कि उसके उस सहयोगी को भी उम्रकैद की सजा दी है, जो गिरोह के लॉजिस्टिक और वित्तीय कार्यों को संभालता था।
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आर्थिक दंड: सजा के साथ-साथ अदालत ने दोषियों पर भारी जुर्माना भी लगाया है, जिसका भुगतान न करने पर सजा की अवधि और बढ़ सकती है।
‘दुर्लभतम’ नहीं था मामला: कोर्ट ने फांसी से क्यों किया इनकार?
अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने दलील दी थी कि विकास गुलिया के अपराधों की गंभीरता को देखते हुए उसे ‘मृत्युदंड’ (Death Penalty) दिया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस मांग को खारिज कर दिया।
अदालत की टिप्पणी: विशेष न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा, “यद्यपि अपराधी के कृत्य समाज के लिए खतरनाक हैं और उसने संगठित तरीके से कानून को चुनौती दी है, लेकिन यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) श्रेणी के मानदंडों को पूरी तरह पूरा नहीं करता है।”
कानूनी जानकारों के अनुसार, फांसी की सजा केवल उन मामलों में दी जाती है जो समाज की अंतरात्मा को झकझोर देते हैं और जहां अपराधी के सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बचती। इस मामले में कोर्ट ने उम्रकैद को ही न्यायोचित माना।
गुलिया गिरोह का खौफ और पुलिस की कार्रवाई
विकास गुलिया का नेटवर्क मुख्य रूप से हरियाणा के झज्जर, रोहतक और दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय था। यह गिरोह व्यापारियों से रंगदारी मांगने और जमीन कब्जाने के लिए कुख्यात था।
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गवाहों की सुरक्षा: इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती गवाहों को अदालत तक लाना था, क्योंकि गुलिया का खौफ इतना था कि लोग सामने आने से डरते थे।
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स्पेशल सेल की भूमिका: दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने तकनीकी सर्विलांस और खुफिया जानकारी के आधार पर इस गिरोह के सिंडिकेट का पर्दाफाश किया था।
संगठित अपराध के खिलाफ बड़ी जीत
इस फैसले को दिल्ली और हरियाणा पुलिस की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। मकोका के तहत सजा मिलने का मतलब है कि अब इन अपराधियों के लिए पैरोल या सजा कम कराना बेहद मुश्किल होगा।
कानूनी विशेषज्ञों की राय: वरिष्ठ वकीलों का मानना है कि इस तरह के फैसलों से अपराधियों के आर्थिक और नेटवर्क वाले ढांचे पर चोट पहुंचती है। उम्रकैद की सजा यह सुनिश्चित करती है कि अपराधी लंबे समय तक समाज से दूर रहे और उसका गिरोह बिखर जाए।
अपराधियों के लिए चेतावनी
साल 2026 की शुरुआत में आया यह फैसला यह दर्शाता है कि न्यायपालिका और पुलिस प्रशासन संगठित अपराध को जड़ से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। विकास गुलिया को मिली यह सजा उन सभी गैंगस्टर के लिए एक चेतावनी है जो सीमा पार या जेल के भीतर से अपना नेटवर्क चलाने का दुस्साहस करते हैं।



