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संविधान दिवस 2025: संसद के ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल में आज राष्ट्र देखेगा लोकतांत्रिक गौरव का उत्सव

The Hill India News
Last updated: November 26, 2025 1:23 am
The Hill India News
Published: November 26, 2025
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नई दिल्ली, 26 नवंबर। भारत आज अपने संवैधानिक इतिहास के एक और गौरवशाली क्षण का साक्षी बनने जा रहा है। संसद भवन परिसर के ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल में संविधान दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय समारोह आज सुबह 11 बजे आयोजित किया जाएगा, जिसमें देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि एकत्र होंगे। यह आयोजन न केवल संविधान के अंगीकृत होने के दिन को स्मरण करता है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संरचना को सुदृढ़ करने का संदेश भी देता है।

Contents
कार्यक्रम की शुरुआत: लोकसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति करेंगे उद्बोधनमुख्य आकर्षण: राष्ट्रपति मुर्मू का राष्ट्र के नाम संदेशसंविधान के नौ भारतीय भाषाई संस्करणों का ऐतिहासिक लोकार्पण‘भारत की संविधान से कला और कैलीग्राफी’ स्मरणिका का विमोचनकार्यक्रम का समापन: प्रस्तावना का सामूहिक वाचनसंविधान दिवस की परंपरा: 2015 से शुरू, आज राष्ट्रीय महत्वसेंट्रल हॉल—भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का साक्षीलोकतंत्र की आत्मा का उत्सव

समारोह की अध्यक्षता राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू करेंगी, जबकि मंच पर उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, विभिन्न केंद्रीय मंत्री और सांसद मौजूद रहेंगे। संसदीय कार्य मंत्रालय ने इस कार्यक्रम को “राष्ट्रीय महत्व का समारोह” बताते हुए व्यापक तैयारियों की पुष्टि की है।


कार्यक्रम की शुरुआत: लोकसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति करेंगे उद्बोधन

समारोह का औपचारिक आरंभ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के संबोधन से होगा, जिसमें वे संविधान के मूल्यों की प्रासंगिकता और संसदीय लोकतंत्र की मजबूती पर विचार रखेंगे। इसके बाद उपराष्ट्रपति व राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन सभा को संबोधित करेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान दिवस पर शीर्ष नेतृत्व के ये संबोधन नागरिकों को संविधान की आत्मा से जोड़ने और लोकतांत्रिक चेतना को सशक्त करने का अवसर होते हैं। दोनों संवैधानिक शीर्ष पदाधिकारी देश के सामने वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य में संविधान की भूमिका को रेखांकित करेंगे।


मुख्य आकर्षण: राष्ट्रपति मुर्मू का राष्ट्र के नाम संदेश

समारोह का सबसे अहम हिस्सा होगा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का मुख्य संबोधन। राष्ट्रपति देश को संविधान की भावना, नागरिक कर्तव्यों की अहमियत और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर विस्तृत संदेश देंगी। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के संदेशों को नए सत्र की दिशा, नागरिक जिम्मेदारियों और संवैधानिक आदर्शों पर सरकार और राष्ट्र के दृष्टिकोण के रूप में देखा जाता है।

संविधान दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति का भाषण कई मायनों में मार्गदर्शक माना जाता है, विशेषकर उस समय जब भारत सामाजिक-आर्थिक बदलावों के दौर से गुजर रहा है।


संविधान के नौ भारतीय भाषाई संस्करणों का ऐतिहासिक लोकार्पण

इस वर्ष के समारोह की एक विशेष उपलब्धि है—संविधान के नौ भारतीय भाषाई संस्करणों का औपचारिक लोकार्पण। इन भाषाओं में शामिल हैं—मलयालम, मराठी, नेपाली, पंजाबी, बोडो, कश्मीरी, तेलुगु, ओड़िया और असमिया।

यह भाषा-सम्पन्न पहल संविधान को भारत की भाषायी विविधता से और अधिक जोड़ने का प्रयास है। इससे संविधान आम नागरिकों की भाषा में उपलब्ध होगा, जिससे उसकी समझ और स्वीकार्यता बढ़ेगी। विशेषज्ञ इसे ‘संविधान तक पहुंच’ को लोकतांत्रिक रूप से और व्यापक बनाने की बड़ी उपलब्धि मानते हैं।


‘भारत की संविधान से कला और कैलीग्राफी’ स्मरणिका का विमोचन

संविधान की मूल प्रति अपनी कलात्मक शैली और कैलीग्राफी के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस विरासत को संरक्षित और प्रचारित करने के लिए संस्कृति मंत्रालय ने विशेष स्मरणिका—‘भारत की संविधान से कला और कैलीग्राफी’ (हिंदी संस्करण) तैयार की है, जिसका विमोचन समारोह के दौरान किया जाएगा।

यह स्मरणिका संविधान के उस कलात्मक पक्ष को सामने लाती है जिसकी चर्चा सामान्यतः कम होती है, लेकिन जिसने भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को संवैधानिक दस्तावेज में अमर किया है।


कार्यक्रम का समापन: प्रस्तावना का सामूहिक वाचन

समारोह के अंत में राष्ट्रपति मुर्मू स्वयं संविधान की प्रस्तावना का वाचन करेंगी। सेंट्रल हॉल में उपस्थित सभी सदस्य एक स्वर में प्रस्तावना का पाठ करेंगे। विशेषज्ञ इसे लोकतांत्रिक एकता और भारतीय गणतंत्र की सामूहिक चेतना का अनूठा क्षण बताते हैं।

प्रस्तावना का सामूहिक वाचन हर वर्ष संविधान दिवस के समारोह का सबसे प्रेरक और प्रतीकात्मक हिस्सा रहा है, जो संविधान की मूल भावना—“We, the People of India”—को पुनः जीवित कर देता है।


संविधान दिवस की परंपरा: 2015 से शुरू, आज राष्ट्रीय महत्व

भारत में संविधान दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 2015 में हुई थी, जब केंद्र सरकार ने 26 नवंबर को “संविधान दिवस” घोषित किया।
26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने देश के संविधान को अंतिम रूप दिया था। उसी ऐतिहासिक दिन के सम्मान में यह परंपरा शुरू की गई।

हालांकि संविधान के कुछ प्रावधान तत्काल लागू हुए, जबकि कई प्रावधान 26 जनवरी 1950 को तब लागू हुए जब भारत आधिकारिक रूप से “गणतंत्र” बना। हर वर्ष संविधान दिवस पर—

  • न्यायपालिका
  • विश्वविद्यालय
  • सरकारी विभाग
  • स्कूल-कॉलेज
  • नागरिक समाज

देशभर में जागरूकता कार्यक्रम और विचार गोष्ठियाँ आयोजित करते हैं। इसका उद्देश्य संविधान को जन-जन तक पहुँचाना और उसके मूल्यों का प्रसार करना है।


सेंट्रल हॉल—भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का साक्षी

आज का समारोह जिस सेंट्रल हॉल में आयोजित हो रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र की कई ऐतिहासिक घटनाओं का प्रतीक है।
यहीं

  • संविधान सभा की प्रमुख बैठकें हुईं,
  • स्वतंत्र भारत की पहली सरकार ने शपथ ली,
  • कई ऐतिहासिक विधायी चर्चाएँ संपन्न हुईं।

आज जब राष्ट्र 75 वर्षों की संवैधानिक यात्रा को गर्व से देख रहा है, वही सेंट्रल हॉल संविधान दिवस का साक्षी बन रहा है।


लोकतंत्र की आत्मा का उत्सव

संविधान दिवस का यह राष्ट्रीय समारोह केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक चरित्र और संविधान की सर्वोच्चता का सार्वजनिक उत्सव है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत का लोकतंत्र संविधान में निहित आदर्शों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व—पर ही टिका है।

आज का समारोह इन मूल्यों को पुनः पुष्ट करने का अवसर है, और देश की नई पीढ़ी के लिए यह संदेश कि भारत का भविष्य तभी मजबूत होगा जब संविधान की भावना हर भारतीय के दिल में जीवित रहेगी।

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