
देहरादून/बरेली। महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड विश्वविद्यालय, बरेली में सोमवार को आयोजित एक विशेष सत्र में प्रख्यात ट्रॉमा विशेषज्ञ और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. बी.के.एस. संजय ने देश में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि भारत में सड़क दुर्घटनाएँ सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि हर दिन टूटते परिवारों, बिखरते सपनों और असमय छिनती जिंदगियों की त्रासदियां हैं—जिन्हें जागरूकता और अनुशासन से काफी हद तक रोका जा सकता है।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के छात्र, शोधार्थी, संकाय सदस्य और कई वरिष्ठ चिकित्सक बड़ी संख्या में मौजूद थे। सड़क सुरक्षा पर केंद्रित यह व्याख्यान न केवल सूचनात्मक रहा, बल्कि युवाओं के भीतर सामाजिक जिम्मेदारी की नई चेतना भी जगाता दिखाई दिया।
रात 12 से सुबह 8 बजे तक सबसे खतरनाक समय—70% दुर्घटनाएं इसी अवधि में
डॉ. संजय ने अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) सहित विभिन्न सरकारी रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारक रात का समय है।
उन्होंने कहा:
“देश में होने वाली करीब 70% सड़क दुर्घटनाएँ आधी रात से सुबह 8 बजे के बीच होती हैं, और इनमें लगभग आधी दुर्घटनाएँ घातक होती हैं। यह आंकड़ा अत्यंत गंभीर स्थिति की ओर संकेत करता है।”
इसके पीछे उन्होंने कई प्रमुख कारण बताए—
- रात में दृश्यता कम होना
- वाहन चालकों की थकान
- तेज गति से वाहन चलाने की प्रवृत्ति
- हाईवे पर सुरक्षा निगरानी में कमी
- शराब पीकर वाहन चलाना
डॉ. संजय ने चेतावनी दी कि यदि सामूहिक स्तर पर सजगता नहीं बढ़ाई गई तो आने वाले वर्षों में सड़क दुर्घटनाएँ “राष्ट्रीय आपदा” के रूप में सामने आ सकती हैं।
सीट बेल्ट, हेलमेट और ‘जिम्मेदार ड्राइविंग’ ही बचा सकती हैं लाखों जिंदगियाँ
डॉ. संजय ने यह भी कहा कि भारत में होने वाली अधिकांश सड़क दुर्घटनाएँ “रोकने योग्य दुर्घटनाएँ” हैं। यदि लोग मूलभूत सुरक्षा नियमों का पालन करें, तो सड़क हादसों से होने वाली मौतों में भारी कमी लाई जा सकती है।
उन्होंने निम्न बिंदुओं पर विशेष जोर दिया—
1. सीट बेल्ट का अनिवार्य उपयोग
डॉ. संजय ने कहा कि
- दुर्घटना में मरने वालों में बड़ी संख्या उन लोगों की होती है जिन्होंने सीट बेल्ट नहीं लगाई होती।
- केवल फ्रंट सीट ही नहीं, पीछे बैठने वाले यात्रियों—सभी के लिए सीट बेल्ट आवश्यक है।
2. हेलमेट की गुणवत्ता पर समझौता न करें
उन्होंने बताया कि हेलमेट केवल पुलिस जांच से बचने के लिए नहीं, बल्कि जीवन बचाने के लिए होते हैं।
“सही ISI मार्क वाला हेलमेट गंभीर सिर की चोटों का खतरा 70% तक कम कर देता है।”
3. तेज रफ्तार और लापरवाही—मुख्य कारण
डॉ. संजय ने कहा:
“तेज रफ्तार से वाहन पर नियंत्रण एक पल में खत्म हो सकता है। सड़क नियमों का पालन सिर्फ कानून नहीं, बल्कि जीवन रक्षा का मूल मंत्र है।”
4. ध्यान भटकाने वाली ड्राइविंग को बताया ‘साइलेंट किलर’
मोबाइल फोन का उपयोग, संगीत बदलना, बात करना—ये सब गंभीर दुर्घटनाओं के बड़े कारण हैं।
गोल्डन आवर: सड़क दुर्घटनाओं में ‘जीवन और मृत्यु’ का असली फर्क
डॉ. संजय के व्याख्यान का सबसे महत्वपूर्ण भाग था “गोल्डन आवर” पर उनका जोर।
उन्होंने समझाया कि:
- सड़क दुर्घटना के बाद पहला घंटा सबसे कीमती होता है।
- यदि घायल को इस दौरान सही प्राथमिक उपचार और अस्पताल तक सुरक्षित पहुँच मिल जाए, तो मृत्यु की आशंका 60-70% तक कम की जा सकती है।
उन्होंने राज्यों से यह भी अपील की कि
- एम्बुलेंस नेटवर्क
- ट्रॉमा सेंटर
- प्राथमिक उपचार प्रशिक्षण
- ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में मेडिकल एक्सेस
को और अधिक मजबूत किया जाए।
युवाओं से किया सीधा आह्वान—“सड़क सुरक्षा अभियान की बागडोर आप संभालें”
डॉ. संजय ने व्याख्यान के दौरान विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा:
“देश का भविष्य आप हैं। यदि युवा सड़क सुरक्षा अभियान का नेतृत्व कर लें, तो भारत को सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों में विश्व की शीर्ष सूची से बाहर निकाला जा सकता है।”
उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों को—
- सड़क सुरक्षा क्लब,
- हेलमेट अवेयरनेस ड्राइव,
- सेफ ड्राइविंग वर्कशॉप,
- प्राथमिक उपचार प्रशिक्षण
जैसी गतिविधियों को अपने नियमित कार्यक्रम में शामिल करना चाहिए।
छात्रों ने पूछे महत्वपूर्ण प्रश्न, ट्रॉमा केयर पर हुई गहन चर्चा
सत्र के अंत में छात्रों ने कई गंभीर प्रश्न पूछे—
- दुर्घटना स्थल पर आम नागरिक क्या कर सकते हैं?
- किन परिस्थितियों में घायल को हिलाना सुरक्षित होता है?
- एम्बुलेंस आने से पहले ‘पहली प्रतिक्रिया’ क्या होनी चाहिए?
- क्या विश्वविद्यालय स्तर पर ट्रॉमा केयर प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए?
डॉ. संजय ने सभी प्रश्नों के विस्तृत उत्तर दिए और कहा कि सड़क सुरक्षा केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने व्यक्त किया आभार
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के निदेशक डॉ. ए.के. श्रीवास्तव, डॉ. ब्रजेश कुमार सहित कई वरिष्ठ संकाय सदस्य उपस्थित रहे।
प्रशासन ने डॉ. संजय के व्याख्यान को “अत्यंत प्रेरक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण” बताया और भविष्य में ऐसे जागरूकता कार्यक्रम जारी रखने की बात कही।
सड़क सुरक्षा राष्ट्रीय अभियान बने—यही है डॉ. संजय का संदेश
भारत में हर वर्ष लगभग 1.5 लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। यदि समाज और प्रशासन दोनों मिलकर प्रयास करें, तो यह संख्या तेजी से कम हो सकती है।
डॉ. संजय का संदेश स्पष्ट है— सड़क सुरक्षा केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा का संस्कार है। और इस बदलाव की शुरुआत युवाओं से ही होगी।



