तिरुवनंतपुरम/नई दिल्ली। केरल में स्थानीय निकाय चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उससे जुड़े संगठनों के भीतर टिकट बंटवारे को लेकर गहराती नाराजगी अब गंभीर घटनाओं का रूप लेती दिख रही है। तिरुवनंतपुरम ज़िले के नेदुमंगद इलाके में भाजपा महिला मोर्चा की एक जिला सचिव ने रविवार देर रात आत्महत्या का प्रयास कर राजनीतिक हलकों में सनसनी फैला दी। इससे कुछ ही घंटे पहले आरएसएस के एक सक्रिय कार्यकर्ता द्वारा टिकट न मिलने के आरोपों के बीच आत्महत्या किए जाने से पूरे मामले ने और भी संवेदनशील मोड़ ले लिया है।
इन दोनों घटनाओं ने भाजपा की आंतरिक कलह, टिकट चयन प्रक्रिया और जमीनी स्तर पर संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
महिला मोर्चा की जिला सचिव शालिनी का आत्महत्या का प्रयास
नेदुमंगद के पनायकोट्टला इलाके में रहने वाली भाजपा महिला मोर्चा की नेता शालिनी ने शनिवार और रविवार की मध्य रात्रि आत्महत्या का प्रयास किया। पुलिस के अनुसार, घटना के वक्त उनका बेटा घर पर मौजूद था, जिसने तुरंत स्थिति को संभालते हुए उन्हें अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टरों ने बताया कि समय पर पहुंचाने की वजह से उनकी जान बच गई और कुछ घंटे की प्राथमिक चिकित्सा के बाद रविवार सुबह उन्हें छुट्टी दे दी गई।
अस्पताल से बाहर आने के बाद शालिनी ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए यह दावा किया कि—
- वह महिला मोर्चा की जिला सचिव हैं,
- भाजपा ने नेदुमंगद नगरपालिका चुनाव के लिए उन्हें संभावित उम्मीदवार के रूप में चुना था,
- लेकिन पार्टी के भीतर कुछ लोगों ने निजी रंजिश के चलते उनके खिलाफ फर्जी आरोप लगाए,
- जिसके कारण उनकी उम्मीदवारी पर सवाल खड़े हो गए।
शालिनी ने कहा, “कुछ आरएसएस और भाजपा कार्यकर्ताओं ने मेरे खिलाफ झूठे आरोप लगाकर मेरी उम्मीदवारी रोकने की कोशिश की। मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। मैं बेहद तनाव में थी और यह स्थिति मेरे व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित कर रही थी।”
उन्होंने आगे बताया कि उन्हें हाल ही में पता चला था कि पार्टी किसी और नाम पर गंभीरता से विचार कर रही है, जिससे उनकी निराशा और बढ़ गई।
आरएसएस कार्यकर्ता की आत्महत्या से बढ़ी संवेदनशीलता
यह घटना ऐसे समय हुई जब शनिवार को ही आरएसएस कार्यकर्ता आनंद के. थम्पी (39) ने आत्महत्या कर ली।
आनंद कई वर्षों से संगठन के सक्रिय सदस्य थे और तिरुवनंतपुरम निगम के त्रिक्कण्णपुरम वार्ड से उम्मीदवार बनने की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन टिकट न मिलने की आशंका और आंतरिक विरोध के चलते, उन्होंने अपने सुसाइड नोट में कथित तौर पर टिकट कटने को प्रमुख कारण बताया।
आनंद की आत्महत्या ने भाजपा-आरएसएस खेमे को झकझोर दिया था। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने अब तक उनकी मौत या आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
शालिनी के आत्महत्या प्रयास ने इस विवाद को और भी गंभीर बना दिया है, जिससे यह मामला राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में प्रमुख मुद्दा बन गया है।
टिकट बंटवारे में बढ़ती खींचतान
स्थानीय निकाय चुनावों में टिकट बंटवारे को लेकर नाराजगी देशभर की राजनीति में आम बात है, लेकिन केरल में लगातार दो गंभीर घटनाओं ने माहौल को अत्यंत संवेदनशील बना दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि—
- केरल में भाजपा तेजी से अपने संगठन का विस्तार कर रही है,
- स्थानीय स्तर पर महत्वाकांक्षाएँ बढ़ी हैं,
- कई नेता पहली बार चुनाव लड़ने की तैयारी में थे,
- लेकिन टिकट चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और गुटबाजी तनाव को बढ़ा रही है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि टिकट न मिलने की आशंका से किसी कार्यकर्ता द्वारा आत्महत्या जैसी घटनाएँ लोकतांत्रिक राजनीति के लिए अत्यंत चिंताजनक संकेत हैं।
पार्टी की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
घटना के बाद भाजपा राज्य नेतृत्व की चुप्पी चर्चा का विषय बनी हुई है।
पार्टी की ओर से न तो शालिनी के दावों पर कोई बयान आया है और न ही आनंद की आत्महत्या को लेकर कोई सार्वजनिक टिप्पणी।
कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अभी चुनावी रणनीति, क्षति नियंत्रण और आंतरिक शांति बहाल करने के लिए अपने स्तर पर प्रयास कर रहा हो सकता है।
लेकिन सोशल मीडिया और जनता के बीच यह मुद्दा तेजी से चर्चा में है और पार्टी पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वह साफ-साफ स्थिति स्पष्ट करे।
सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा, भाजपा के अंदर ‘हेल्थ सपोर्ट सिस्टम’ पर बहस
घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थकों और विपक्षी दलों दोनों की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं।
कुछ भाजपा समर्थक मान रहे हैं कि—
- संगठन को अपने कार्यकर्ताओं का बेहतर काउंसलिंग सपोर्ट देना चाहिए,
- टिकट बंटवारे पर स्पष्ट दिशानिर्देश और शिकायत निवारण तंत्र होना चाहिए।
वहीं विपक्ष का कहना है कि—
- भाजपा में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और अंदरूनी गुटबाजी से कार्यकर्ता मानसिक तनाव में हैं,
- टिकट की राजनीति कार्यकर्ताओं को मानसिक रूप से तोड़ रही है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि राजनीति में अक्सर कार्यकर्ताओं पर अत्यधिक दबाव होता है।
चुनाव से पहले—
- उम्मीदें बढ़ जाती हैं,
- सामाजिक पहचान दांव पर लग जाती है,
- और निराशा की स्थिति तेजी से मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं के लिए भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन प्रणाली विकसित करनी चाहिए।
केरल में चुनावी माहौल और भाजपा की चुनौती
केरल में भाजपा का राजनीतिक आधार अब भी सीमित है, लेकिन पार्टी लगातार अपना विस्तार चाहती है।
स्थानीय निकाय चुनाव भाजपा के लिए—
- संगठनात्मक ताकत को प्रदर्शित करने का अवसर होते हैं,
- जमीनी स्तर पर नेतृत्व विकसित करने का माध्यम होते हैं।
लेकिन लगातार दो आत्महत्या से जुड़े मामलों ने पार्टी के अंदर गहरे असंतोष और तनाव का संकेत दे दिया है।
केरल में टिकट बंटवारे को लेकर उत्पन्न हुए विवाद के बीच आरएसएस कार्यकर्ता और भाजपा महिला मोर्चा नेता की आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाओं ने राज्य की राजनीति को हिला दिया है। यह घटनाएँ सिर्फ आंतरिक गुटबाजी का मामला नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक दलों के भीतर मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिता की कमी और संगठनात्मक समर्थन तंत्र की मजबूती पर सवाल उठाती हैं।
अब सबकी निगाहें भाजपा के आधिकारिक बयान और आगे की कार्रवाई पर हैं — क्योंकि यह सिर्फ चुनावी टिकट का मसला नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के जीवन और मानसिक स्वास्थ्य का भी सवाल है।



