शौर्य चक्र विजेता मोहन सिंह ने ड्यूटी के दौरान बचाई थी साथियों की जान, खुद 70 मीटर गहरी खाई में गिरे; 26 साल तक विशेष पारिवारिक पेंशन के लिए संघर्ष करती रहीं कुलदीप कौर
नई दिल्ली / सुप्रीम कोर्ट: देश की सीमाओं और दुर्गम इलाकों में अपनी जान जोखिम में डालकर राष्ट्र की सेवा करने वाले जवानों और कर्मचारियों के परिवारों के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला बेहद महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया है। अदालत ने एक ऐसी विधवा को राहत दी है, जिसने अपने शहीद पति के अधिकारों के लिए करीब 26 वर्षों तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। मामला शौर्य चक्र से सम्मानित दिवंगत मोहन सिंह की पत्नी कुलदीप कौर से जुड़ा है, जिन्हें उनके पति की ड्यूटी के दौरान हुई मौत के बाद मिलने वाली विशेष पारिवारिक पेंशन के लिए वर्षों तक सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर लगाने पड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया और केंद्र सरकार को कुलदीप कौर को 10 लाख रुपये की समेकित राशि देने का निर्देश दिया। अदालत ने केंद्र सरकार को यह रकम चार सप्ताह के भीतर जारी करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में राहत को केवल याचिका दाखिल करने से पहले के तीन वर्षों तक सीमित करना उचित नहीं होगा। अदालत ने विशेष परिस्थितियों को देखते हुए लाभ को शहीद मोहन सिंह की मृत्यु की तारीख से जोड़ने का निर्देश दिया।
जिसने दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान गंवा दी
यह पूरा मामला सिर्फ पेंशन से जुड़ा विवाद नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के अदम्य साहस और बलिदान की कहानी भी है, जिसने ड्यूटी के दौरान अपने साथियों की जान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की।
मोहन सिंह जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स यानी GREF में ओवरसियर के पद पर तैनात थे। अरुणाचल प्रदेश में उन्हें हैलियांग-मेटांगलियांग-चागलोहागोम सड़क के निर्माण कार्य की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। करीब 57 किलोमीटर लंबी यह सड़क भारत-चीन सीमा के लिहाज से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
10 जुलाई 2000 को सड़क निर्माण के दौरान एक बेहद खतरनाक और पथरीले स्थान पर काम चल रहा था। अचानक मोहन सिंह ने पहाड़ी के ऊपर से एक बड़ा पत्थर और मलबा तेजी से निर्माण स्थल की ओर आते देखा।
खतरे को भांपते ही उन्होंने वहां काम कर रहे डोजर और कंप्रेसर ऑपरेटरों को तुरंत सावधान किया और उन्हें सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने वहां मौजूद मशीनों और उपकरणों को भी नुकसान से बचाने की कोशिश की।
इसी दौरान वह खुद बड़े पत्थर और मलबे की चपेट में आ गए। हादसे में वह करीब 70 मीटर गहरी खाई में जा गिरे, जिससे उनकी मौत हो गई।
मोहन सिंह ने अपनी जान देकर अपने साथ काम कर रहे लोगों को बचाने का प्रयास किया। उनके इस अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान को केंद्र सरकार ने भी सम्मान दिया। उन्हें मरणोपरांत 19 अक्टूबर 2001 को शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया।
शौर्य चक्र देश का तीसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है।
लेकिन शहादत के बाद परिवार को मिला लंबा संघर्ष
मोहन सिंह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी कुलदीप कौर को सामान्य पारिवारिक पेंशन मिल रही थी। लेकिन उनका दावा था कि उनके पति की ड्यूटी के दौरान हुई मौत की परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें विशेष पारिवारिक पेंशन का लाभ मिलना चाहिए।
दिसंबर 2005 में उन्होंने CCS Rules, 1939 के तहत विशेष पारिवारिक पेंशन की मांग की। हालांकि, उनका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि उन्हें पहले ही वर्कमेन कॉम्पेंसेशन एक्ट, 1923 के तहत 1,84,170 रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है।
कुलदीप कौर ने इसके बाद भी अपने अधिकार की लड़ाई नहीं छोड़ी। वर्ष 2011 में उन्होंने एक बार फिर विशेष पेंशन की मांग की, लेकिन उनकी मांग को फिर स्वीकार नहीं किया गया।
इसके बाद उन्हें न्याय के लिए अदालत का रुख करना पड़ा।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा मामला
लगातार सरकारी स्तर पर राहत नहीं मिलने के बाद कुलदीप कौर ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने मामले पर विचार करते हुए माना कि मोहन सिंह की मौत लागू पेंशन योजना की कैटेगरी ‘C’ के अंतर्गत आती है और इसलिए उनकी पत्नी को असाधारण यानी विशेष पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया जाना चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पहले मिल चुकी मुआवजे की राशि को 6 प्रतिशत ब्याज के साथ वापस किया जाए।
इसके बाद मामला हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने पहुंचा। डिवीजन बेंच ने भी मोहन सिंह के मामले को कैटेगरी ‘C’ में रखे जाने के निष्कर्ष को बरकरार रखा, लेकिन राहत को याचिका दाखिल करने से पहले के तीन वर्षों तक सीमित कर दिया।
यहीं से मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा—26 साल के संघर्ष की कीमत सिर्फ तीन साल क्यों?
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि मोहन सिंह का मामला कैटेगरी ‘C’ के तहत आता है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने अहम सवाल यह था कि आखिर शहीद की विधवा को मिलने वाली आर्थिक राहत को केवल तीन साल तक सीमित क्यों किया जाए?
अदालत ने मामले की परिस्थितियों को व्यापक दृष्टिकोण से देखा। कोर्ट ने माना कि मोहन सिंह ने सरकारी ड्यूटी के दौरान अपनी जान गंवाई थी। उन्होंने अपने साथियों की जान बचाने की कोशिश करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था। इतना ही नहीं, सरकार ने उनके साहस और बलिदान को अगले ही वर्ष शौर्य चक्र देकर सम्मानित भी किया था।
ऐसे में उनकी पत्नी को अपने अधिकार के लिए वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ना अदालत के लिए गंभीर विचार का विषय बना।
‘विधवा को अपने अधिकार के लिए अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाना चाहिए’
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति ने ड्यूटी के दौरान सर्वोच्च बलिदान दिया हो और सरकार ने उसके साहस को देश के प्रतिष्ठित वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया हो, तो उसके परिवार या विधवा को अपने वैधानिक अधिकारों के लिए सामान्य परिस्थितियों में अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी माना कि इंसाफ पाने में हुई देरी को इस मामले में कुलदीप कौर के खिलाफ नहीं माना जा सकता।
यही वजह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य सीमाओं से आगे जाकर मामले की विशेष परिस्थितियों में राहत देने का फैसला किया।
केंद्र ने बताया—पहले ही जारी हो चुकी है बड़ी रकम
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर संबंधित अधिकारियों ने कार्रवाई शुरू कर दी है।
कुलदीप कौर को 14,28,200 रुपये जारी किए जा चुके हैं और उनकी पेंशन भी प्रोसेस कर दी गई है। इसके अलावा, असाधारण पेंशन के बकाए के तौर पर 4,12,064 रुपये भी जारी किए गए।
केंद्र की ओर से अदालत को बताया गया कि 12 जुलाई 2000 से 12 जुलाई 2015 तक की पेंशन की राशि 6,62,268 रुपये बनती है। इसमें 6 प्रतिशत ब्याज जोड़ने पर यह रकम लगभग 8.32 लाख रुपये हो जाती है।
सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि कुलदीप कौर को वर्कमेन कॉम्पेंसेशन एक्ट के तहत मिली 1,84,170 रुपये की राशि ब्याज सहित 2,78,092 रुपये हो जाती है और नियमों के अनुसार 4,62,262 रुपये वापस किए जाने थे।
हालांकि, कुलदीप कौर की ओर से उनके वकील ने अदालत को बताया कि मूल राशि यानी 1,84,170 रुपये वह पहले ही वापस कर चुकी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 10 लाख रुपये की समेकित राशि तय की
पूरे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राहत को केवल तीन वर्षों तक सीमित नहीं किया। अदालत ने 13 जुलाई 2000 से 12 जुलाई 2015 की अवधि के लिए कुल 10 लाख रुपये की समेकित राशि तय की।
अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस राशि को चार सप्ताह के भीतर कुलदीप कौर को जारी करे।
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 5 अगस्त 2026 को पारित किया।
कोर्ट ने यह राहत संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दी। अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश देने की शक्ति प्राप्त है।
26 साल की लड़ाई में आखिरकार मिली राहत
कुलदीप कौर के लिए यह फैसला सिर्फ 10 लाख रुपये की आर्थिक राहत तक सीमित नहीं है। यह उस लंबे संघर्ष की समाप्ति का प्रतीक है, जो उन्होंने अपने पति के अधिकार और परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए शुरू किया था।
एक ओर उनके पति ने देश की सेवा करते हुए अपनी जान गंवाई और अपने साथियों को बचाने की कोशिश में शहीद हुए। दूसरी ओर उनकी पत्नी को उनके अधिकारों के लिए वर्षों तक सरकारी प्रक्रिया और न्यायिक लड़ाई से गुजरना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐसे मामलों में यह संदेश देता है कि शहीद के परिवार को मिलने वाले वैधानिक लाभ केवल कागजों पर दर्ज अधिकार नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे उस बलिदान की कीमत जुड़ी होती है जिसे देश के लिए दिया गया है।
शौर्य चक्र से सम्मानित बलिदान को मिला न्यायिक सम्मान
मोहन सिंह की कहानी उन हजारों कर्मचारियों और जवानों के बलिदान की याद दिलाती है जो कठिन और जोखिम भरे इलाकों में देश के महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों और सुरक्षा से जुड़े दायित्वों को निभाते हैं।
उन्होंने अरुणाचल प्रदेश जैसे दुर्गम क्षेत्र में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़क निर्माण के दौरान अपनी जान गंवाई। उनके सामने खतरा था, लेकिन उन्होंने पहले अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश की। यही साहस बाद में शौर्य चक्र के रूप में देश की ओर से सम्मानित हुआ।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उनकी पत्नी को भी वर्षों बाद राहत दी है।
सरकार की त्वरित कार्रवाई की कोर्ट ने की सराहना
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल और संबंधित विभाग की ओर से मामले में त्वरित प्रतिक्रिया की भी सराहना की।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए राहत को सामान्य तीन साल की सीमा में बांधना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने शहीद की ड्यूटी के दौरान हुई मौत, उनके वीरता पुरस्कार और उनकी विधवा के लंबे संघर्ष को ध्यान में रखते हुए विशेष राहत प्रदान की।
अब केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर 10 लाख रुपये जारी करने हैं।
फैसले का बड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक परिवार की आर्थिक मदद का मामला नहीं है। यह सरकारी व्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि देश की सेवा में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार को उसके अधिकारों के लिए अनावश्यक रूप से लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
मोहन सिंह ने जिस समय अपने साथियों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली थी, उस समय उन्होंने यह नहीं सोचा था कि उनके परिवार को भविष्य में उनके अधिकार के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़ेगा।
लेकिन उनकी शहादत के करीब 26 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पत्नी कुलदीप कौर के पक्ष में ऐसा आदेश दिया है, जिसने न केवल उन्हें आर्थिक राहत दी है, बल्कि उनके लंबे संघर्ष को न्यायिक मान्यता भी दी है।
शहीद की शहादत को सलाम और उनकी पत्नी के 26 साल लंबे संघर्ष को मिला न्याय—सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन परिवारों के लिए भी उम्मीद की किरण है, जो अपने प्रियजन के बलिदान के बाद अपने वैधानिक अधिकारों के लिए सरकारी प्रक्रिया में वर्षों तक भटकते रहते हैं।
