रीवा सांसद जनार्दन मिश्रा ने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का किया बचाव, बोले- भारत में पेट्रोलियम जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है; एथेनॉल से रोजगार और आत्मनिर्भरता को मिलेगा बढ़ावा
रीवा: पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को लेकर देश में जारी बहस के बीच मध्य प्रदेश के रीवा से भाजपा सांसद जनार्दन मिश्रा का एक बयान चर्चा में आ गया है। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का विरोध करने वालों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अगर लोग शुद्ध पेट्रोल की मांग कर रहे हैं तो आखिर वह पेट्रोल आएगा कहां से? सांसद ने बेहद आक्रामक अंदाज में सवाल किया, “शुद्ध पेट्रोल तुम्हारे बाप के घर से आएगा?” उनके इस बयान के बाद एथेनॉल को लेकर चल रही राजनीतिक और सार्वजनिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है।
रीवा एयरपोर्ट पर भोपाल-रीवा और कोलकाता-रीवा फ्लाइट के कार्यक्रम में संबोधन के दौरान सांसद ने सरकार की एथेनॉल नीति का बचाव किया। उन्होंने कहा कि देश को रोजगार बढ़ाने, आयात पर निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए एथेनॉल जैसे विकल्पों को बढ़ावा देना जरूरी है।
एथेनॉल विरोध पर भड़के सांसद
जनार्दन मिश्रा ने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में रोजगार की समस्या है, जबकि भारत में नए अवसर पैदा करने की दिशा में काम हो रहा है। इसी संदर्भ में उन्होंने पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण की नीति का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि जब सरकार ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की बात कही तो इसका विरोध शुरू हो गया और कुछ लोग केवल शुद्ध पेट्रोल इस्तेमाल करने की मांग कर रहे हैं। इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए सांसद ने कहा कि देश में शुद्ध पेट्रोल की उपलब्धता को लेकर वास्तविकता को समझना जरूरी है।
उनका तर्क था कि भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। ऐसे में घरेलू स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और वैकल्पिक ईंधन का इस्तेमाल बढ़ाना देश की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
सांसद ने अपने भाषण में कहा कि अगर एथेनॉल का उत्पादन नहीं होगा और उसका इस्तेमाल नहीं किया जाएगा तो पेट्रोल और डीजल की जरूरत कैसे पूरी होगी? उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय वाहन एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर चलने की क्षमता रखते हैं।
“हिंदुस्तान की गाड़ी एथेनॉल से चलेगी”
भाजपा सांसद ने कहा कि देश में ऐसी तकनीक और वाहन मौजूद हैं जो एथेनॉल मिश्रित ईंधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि एथेनॉल के इस्तेमाल से वाहनों को चलाने की क्षमता भारत में मौजूद है।
उनके मुताबिक, एथेनॉल का उत्पादन बढ़ने से केवल ईंधन की जरूरत पूरी करने में मदद नहीं मिलेगी, बल्कि इससे कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी फायदा हो सकता है। गन्ने और अन्य कृषि उत्पादों से एथेनॉल तैयार किया जाता है, इसलिए इसका उत्पादन किसानों और इससे जुड़े उद्योगों के लिए अतिरिक्त आर्थिक अवसर पैदा कर सकता है।
हालांकि, एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर उपभोक्ताओं और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में अलग-अलग राय भी सामने आती रही है। वाहन की उम्र, इंजन की तकनीक और निर्माता की ओर से दी गई संगतता जैसी चीजें ईंधन के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं। यही वजह है कि एथेनॉल मिश्रण का मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि तकनीकी और आर्थिक बहस का विषय भी बना हुआ है।
विदेशों से तेल खरीदने की मजबूरी का दिया हवाला
जनार्दन मिश्रा ने अपने संबोधन में वैश्विक परिस्थितियों और भारत की तेल आयात पर निर्भरता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी जरूरत का पेट्रोलियम विदेशों से मंगाना पड़ता है और इसके लिए समुद्री रास्तों से तेल की लंबी दूरी तय करके आपूर्ति की जाती है।
उन्होंने लगभग 18 हजार किलोमीटर अतिरिक्त दूरी का उल्लेख करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई कई जटिल परिस्थितियों से होकर गुजरती है। ऐसे में भारत के लिए अपनी ऊर्जा जरूरतों के वैकल्पिक स्रोत विकसित करना महत्वपूर्ण है।
उनका कहना था कि यदि देश में एथेनॉल का उत्पादन और इस्तेमाल बढ़ाया जाता है तो पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है।
ब्राजील का उदाहरण देकर समझाया एथेनॉल का इस्तेमाल
अपने भाषण में रीवा सांसद ने ब्राजील का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि ब्राजील में बड़ी मात्रा में एथेनॉल आधारित ईंधन का इस्तेमाल होता है और वहां वाहन एथेनॉल पर चल रहे हैं।
मिश्रा ने इसी उदाहरण के जरिए यह तर्क देने की कोशिश की कि एथेनॉल को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना कोई असंभव या नया प्रयोग नहीं है। दुनिया के कई देशों में जैव ईंधन का इस्तेमाल लंबे समय से किया जा रहा है और भारत में भी इसके उत्पादन एवं उपयोग की संभावनाएं मौजूद हैं।
हालांकि, भारत और ब्राजील की ईंधन नीति, वाहन तकनीक, एथेनॉल उत्पादन व्यवस्था और बाजार की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए दोनों देशों की तुलना करते समय इन पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
बयान के बाद फिर चर्चा में आए जनार्दन मिश्रा
रीवा सांसद जनार्दन मिश्रा अपने बेबाक और कई बार विवादित बयानों को लेकर पहले भी सुर्खियों में रहे हैं। इस बार उनका बयान ऐसे समय आया है जब पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लेकर देशभर में चर्चा चल रही है।
उनकी टिप्पणी का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन सकता है, क्योंकि उन्होंने एथेनॉल का विरोध करने वालों को जवाब देते हुए बेहद तीखे और व्यक्तिगत अंदाज में सवाल किया। राजनीतिक बयानों में इस तरह की भाषा अक्सर विवाद को जन्म देती है और मुद्दे की मूल बहस से ध्यान हटकर बयान की भाषा पर केंद्रित हो जाता है।
एथेनॉल को लेकर असली बहस क्या है?
एथेनॉल मिश्रण के समर्थकों का तर्क है कि इससे भारत की तेल आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार तैयार करने और घरेलू स्तर पर वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
वहीं, विरोध करने वालों की मुख्य चिंताओं में पुराने वाहनों के इंजन पर संभावित प्रभाव, ईंधन की गुणवत्ता, माइलेज, कीमत और अलग-अलग वाहनों में एथेनॉल मिश्रण की अनुकूलता जैसे सवाल शामिल हैं। इसलिए इस मुद्दे पर केवल राजनीतिक बयानबाजी के बजाय उपभोक्ताओं को वाहन निर्माता की सलाह और अपने वाहन की ईंधन संगतता पर भी ध्यान देना जरूरी है।
ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने की कोशिश
भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए घरेलू और वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहा है। एथेनॉल इसी रणनीति का एक हिस्सा है। सरकार की कोशिश पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने के साथ-साथ कृषि आधारित जैव ईंधन के उत्पादन को बढ़ावा देने की भी है।
ऐसे में जनार्दन मिश्रा का बयान इस बड़ी बहस के बीच आया है कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किन विकल्पों पर आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि सांसद की भाषा को लेकर विवाद हो सकता है, लेकिन उनके बयान ने एक बार फिर एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल, पेट्रोलियम आयात और ऊर्जा आत्मनिर्भरता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
फिलहाल एथेनॉल को लेकर बहस दो हिस्सों में बंटी दिखाई देती है—एक तरफ सरकार और समर्थक इसे ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और आत्मनिर्भरता से जोड़कर देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ उपभोक्ता और कुछ विशेषज्ञ वाहन तकनीक, माइलेज और ईंधन की अनुकूलता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में एथेनॉल नीति के साथ-साथ वाहनों की तकनीकी तैयारी और उपभोक्ताओं की चिंताओं का समाधान भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
