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The Hill India > Blog > होम > बॉलीवुड > फिल्मों से दूरी रखने वाले उस्ताद बड़े गुलाम अली खां ने ‘मुगल-ए-आजम’ के लिए क्यों ली 25,000 रुपये की फीस?
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फिल्मों से दूरी रखने वाले उस्ताद बड़े गुलाम अली खां ने ‘मुगल-ए-आजम’ के लिए क्यों ली 25,000 रुपये की फीस?

The Hill India News
Last updated: April 24, 2026 11:41 am
The Hill India News
Published: April 24, 2026
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भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का नाम अत्यंत सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है। अपनी विलक्षण आवाज, अद्भुत तानों और भावपूर्ण गायन के लिए प्रसिद्ध इस महान गायक ने संगीत की दुनिया में ऐसा मुकाम हासिल किया, जिसे आज भी कोई छू नहीं पाया है। लेकिन उनकी जिंदगी का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि फिल्मों में गाने के सख्त खिलाफ होने के बावजूद उन्होंने सुपरहिट फिल्म मुगल-ए-आजम के लिए अपनी आवाज दी—वह भी उस दौर की सबसे बड़ी फीस लेकर।

Contents
बचपन से ही संगीत की गहरी साधनामहात्मा गांधी भी हुए थे प्रभावितफिल्मों से दूरी क्यों रखते थे उस्ताद?‘मुगल-ए-आजम’ के लिए कैसे माने?जब निर्देशक ने तुरंत मान ली शर्तविभाजन के बाद का जीवनसम्मान और विरासतएक अनोखी विरासत

बचपन से ही संगीत की गहरी साधना

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का जन्म 2 अप्रैल 1902 को वर्तमान पाकिस्तान के कसूर (पंजाब) में हुआ था। उनका परिवार पूरी तरह से संगीत से जुड़ा हुआ था। उनके पिता अली बख्श खां और चाचा काले खां प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे। बचपन से ही उन्हें घर में ही संगीत की शिक्षा मिली, जिससे उनकी नींव बेहद मजबूत बनी। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत सारंगी वादक के रूप में की, लेकिन बाद में अपनी गायकी से पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध कर दिया।

वे पटियाला घराने के प्रमुख प्रतिनिधि थे और उन्होंने ठुमरी, खयाल और भजन गायन में अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी गायकी में ध्रुपद, ग्वालियर और जयपुर घरानों की झलक मिलती थी। उनकी आवाज में जो मिठास और लचक थी, उसने उन्हें आम जनता के बीच भी बेहद लोकप्रिय बना दिया।

महात्मा गांधी भी हुए थे प्रभावित

एक बार जब उन्होंने “राधेश्याम बोल” भजन प्रस्तुत किया, तो महात्मा गांधी भी उनकी गायकी से गहरे प्रभावित हुए थे। यह उनके संगीत की ताकत को दर्शाता है कि वे केवल शास्त्रीय संगीत के श्रोताओं तक सीमित नहीं थे, बल्कि हर वर्ग के लोगों के दिलों में अपनी जगह बना चुके थे।

फिल्मों से दूरी क्यों रखते थे उस्ताद?

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का मानना था कि फिल्मी संगीत शास्त्रीय संगीत की गहराई और गरिमा को पूरी तरह नहीं दर्शा पाता। वे मानते थे कि फिल्मों में गाने से शास्त्रीय संगीत की शुद्धता प्रभावित हो सकती है। यही कारण था कि उन्होंने जीवनभर फिल्मों में गाने से दूरी बनाए रखी।

‘मुगल-ए-आजम’ के लिए कैसे माने?

जब मशहूर निर्देशक के. आसिफ अपनी फिल्म मुगल-ए-आजम बना रहे थे, तो उन्होंने फिल्म में तानसेन के किरदार के लिए असली शास्त्रीय आवाज की तलाश की। उनकी यह तलाश उस्ताद बड़े गुलाम अली खां पर जाकर खत्म हुई।

हालांकि, जब के. आसिफ ने उनसे गाने का अनुरोध किया, तो उन्होंने साफ मना कर दिया। लेकिन निर्देशक ने हार नहीं मानी और लगातार उनसे आग्रह करते रहे। अंततः उस्ताद ने उन्हें टालने के लिए एक ऐसी शर्त रखी, जो उस समय लगभग असंभव मानी जाती थी।

उन्होंने प्रति गाना 25,000 रुपये की फीस मांगी—जो उस दौर में बेहद बड़ी रकम थी। उस समय लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे दिग्गज गायक भी एक गाने के लिए लगभग 500 रुपये लेते थे।

जब निर्देशक ने तुरंत मान ली शर्त

उस्ताद को लगा कि इतनी बड़ी रकम सुनकर के. आसिफ पीछे हट जाएंगे, लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। निर्देशक ने बिना किसी हिचकिचाहट के उनकी शर्त स्वीकार कर ली। इसके बाद उस्ताद बड़े गुलाम अली खां को फिल्म के लिए गाना पड़ा।

उन्होंने फिल्म में तानसेन के लिए “प्रेम जोगन बन के” और “शुभ दिन आयो” जैसे गीत गाए, जो आज भी शास्त्रीय संगीत प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी आवाज ने फिल्म को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया।

विभाजन के बाद का जीवन

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वे कुछ समय के लिए पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन जल्द ही भारत लौट आए और यहीं बस गए। उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया और जीवन के अंतिम समय तक संगीत की सेवा करते रहे।

सम्मान और विरासत

उनकी अद्वितीय कला के लिए उन्हें 1962 में पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी आवाज आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा है।

एक अनोखी विरासत

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का फिल्मों से दूरी बनाकर रखना और फिर एक फिल्म के लिए इतनी बड़ी फीस लेना केवल एक किस्सा नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों और आत्मसम्मान का प्रतीक है। उन्होंने यह साबित किया कि कला का मूल्य समझने वाले लोग हमेशा उसे सही सम्मान देते हैं।

आज भी जब “याद पिया की आए” या “नैना मोरे तरस गए” जैसे उनके गीत सुनाई देते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे संगीत की दुनिया में उनका जादू अभी भी कायम है।

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