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Reading: ‘इस्लामाबाद डील’ के बेहद करीब पहुंचकर क्यों पलटी बाजी? ईरान-अमेरिका वार्ता बेनतीजा, तेहरान ने वाशिंगटन को दिखाया आईना
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‘इस्लामाबाद डील’ के बेहद करीब पहुंचकर क्यों पलटी बाजी? ईरान-अमेरिका वार्ता बेनतीजा, तेहरान ने वाशिंगटन को दिखाया आईना

The Hill India News
Last updated: April 13, 2026 2:01 am
The Hill India News
Published: April 13, 2026
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इस्लामाबाद/तेहरान: मध्य-पूर्व की राजनीति और वैश्विक कूटनीति के केंद्र में रहे ईरान और अमेरिका के बीच चल रही ऐतिहासिक ‘इस्लामाबाद वार्ता’ अंततः बेनतीजा समाप्त हो गई है। दुनिया जिस शांति समझौते की उम्मीद लगाए बैठी थी, वह हकीकत बनने से महज कुछ इंच की दूरी पर दम तोड़ गया। ईरान ने आरोप लगाया है कि जब दोनों देश Islamabad MoU Iran US Peace Talks के तहत एक अंतिम सहमति के करीब थे, तब अमेरिका ने अपनी शर्तों में अचानक बदलाव कर पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया।

Contents
अराघची का बड़ा खुलासा: ’47 साल में पहली बार हुआ ऐसा संवाद’राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का कड़ा संदेश: ‘सम्मान से समझौता नहीं’क्यों विफल हुई ‘इस्लामाबाद डील’? तीन मुख्य कारणक्षेत्रीय स्थिरता पर क्या होगा असर?कूटनीति के लिए अब आगे क्या?

ईरानी नेतृत्व के बयानों से यह स्पष्ट है कि अमेरिका उन रियायतों को बातचीत की मेज पर हासिल करना चाहता था, जिन्हें वह दशकों के प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के बावजूद युद्ध के मैदान में नहीं पा सका।

अराघची का बड़ा खुलासा: ’47 साल में पहली बार हुआ ऐसा संवाद’

ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर इस पूरी वार्ता का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया है। अराघची के मुताबिक, पिछले 47 वर्षों के कड़वाहट भरे इतिहास में यह पहली बार था जब दोनों देशों के बीच उच्चतम स्तर पर इतनी गहन और गंभीर चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि ईरान ‘इस्लामाबाद एमओयू’ (Memorandum of Understanding) पर हस्ताक्षर करने के लिए पूरी तरह तैयार था और शांति बहाली के प्रति उसकी नियत ‘नेक’ थी।

अराघची ने अफसोस जताते हुए लिखा, “हमने ईमानदारी के साथ मेज पर कदम रखा था, लेकिन जैसे ही समझौता फाइनल होने वाला था, अमेरिका ने अपनी पुरानी ‘मैक्सिमलिस्ट’ (अधिकतम लाभ) की रणनीति अपना ली। उन्होंने अचानक शर्तें बदल दीं और नए अड़ंगे लगा दिए।” ईरानी विदेश मंत्री ने तीखे लहजे में कहा कि अमेरिका ने इतिहास से ‘जीरो सबक’ लिया है और उसे यह समझना चाहिए कि ‘सद्भावना के बदले ही सद्भावना’ मिलती है।

राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का कड़ा संदेश: ‘सम्मान से समझौता नहीं’

ईरान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भी इस कूटनीतिक विफलता पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान बातचीत के पक्ष में है, लेकिन अपनी राष्ट्रीय गरिमा और संप्रभुता की कीमत पर नहीं। पेजेश्कियान ने कहा कि अगर अमेरिकी प्रशासन अपनी ‘तानाशाही’ और सर्वसत्तावादी मानसिकता को त्याग दे और ईरानी राष्ट्र के मौलिक अधिकारों का सम्मान करे, तो समझौता आज भी संभव है।

राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट के जरिए वार्ता में शामिल ईरानी दल की सराहना की और संसद अध्यक्ष डॉ. गलिबाफ को ‘प्रिय भाई’ बताते हुए एकजुटता का संदेश दिया। उनके बयान ने यह साफ कर दिया है कि ईरान के भीतर इस समझौते को लेकर शीर्ष स्तर पर पूर्ण सहमति थी, लेकिन अमेरिकी रुख ने इसे विफल कर दिया।


क्यों विफल हुई ‘इस्लामाबाद डील’? तीन मुख्य कारण

1. शिफ्टिंग गोलपोस्ट (बार-बार शर्तें बदलना): ईरानी पक्ष का सबसे बड़ा आरोप यह है कि अमेरिका ने ‘शिफ्टिंग गोलपोस्ट’ की नीति अपनाई। जब दोनों पक्ष मुख्य बिंदुओं पर सहमत हो गए, तब वाशिंगटन ने कुछ ऐसी अतिरिक्त मांगें जोड़ दीं जो समझौते के मूल ढांचे के खिलाफ थीं।

2. युद्ध की विफलता को मेज पर भुनाने की कोशिश: ईरान का मानना है कि अमेरिका सैन्य और आर्थिक मोर्चे पर जिन लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाया, उन्हें वह इस समझौते के जरिए कानूनी जामा पहनाना चाहता था। तेहरान ने इसे ‘कूटनीतिक ब्लैकमेलिंग’ करार दिया है।

3. विश्वास की कमी और पुरानी रणनीति: अराघची के अनुसार, अमेरिका अभी भी शीत युद्ध की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। ईरान ने लचीलापन दिखाया, लेकिन वाशिंगटन ने इसे ईरान की कमजोरी समझकर दबाव और बढ़ाने की कोशिश की, जिससे वार्ता टूट गई।


क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या होगा असर?

Islamabad MoU Iran US Peace Talks के विफल होने के बाद अब मध्य-पूर्व में तनाव फिर से बढ़ने की आशंका है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह समझौता सिरे चढ़ जाता, तो न केवल तेल की कीमतों में स्थिरता आती, बल्कि सीरिया, यमन और लेबनान जैसे संघर्ष क्षेत्रों में भी तनाव कम होता। अब जबकि बातचीत टूट चुकी है, तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर अधिक आक्रामक रुख अपना सकता है।

कूटनीति के लिए अब आगे क्या?

इस्लामाबाद वार्ता का बेनतीजा रहना वैश्विक शांति के लिए एक बड़ा झटका है। ईरान ने गेंद अब अमेरिका के पाले में डाल दी है। तेहरान का रुख स्पष्ट है—दुश्मनी का जवाब दुश्मनी से और सम्मान का जवाब सम्मान से। अब देखना यह होगा कि क्या बाइडन प्रशासन (या तत्कालीन अमेरिकी नेतृत्व) अपनी शर्तों पर पुनर्विचार करता है या फिर दोनों देश एक बार फिर ‘कोल्ड वॉर’ की उसी पुरानी स्थिति में लौट जाते हैं जहां से उन्होंने शुरुआत की थी।

फिलहाल, ‘इस्लामाबाद डील’ इतिहास के पन्नों में एक ‘खोए हुए अवसर’ के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने हकीकत बनने से ठीक पहले दम तोड़ दिया।

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