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Dehradun News: जब पिता का साया उठा तो ‘अभिभावक’ बना जिला प्रशासन, देहरादून की 120 बेटियों के सपनों को मिले नए पंख

देहरादून: किस्मत ने जब सिर से पिता का साया छीना, तो आंखों में धुंधलाते भविष्य और टूटते सपनों की टीस थी। किसी को बी.फार्मा छोड़नी पड़ रही थी, तो किसी की पीएचडी की फीस आड़े आ रही थी। लेकिन देहरादून जिला प्रशासन ने ‘अभिभावक’ की भूमिका निभाते हुए इन बेटियों का हाथ थाम लिया है। जिलाधिकारी सविन बंसल की अनूठी पहल ‘प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा’ आज उन बालिकाओं के लिए उम्मीद की नई किरण बन गया है, जिनकी शिक्षा पारिवारिक आर्थिक तंगी या आपदा के कारण रुकने की कगार पर थी।

शनिवार को इस प्रोजेक्ट के 12वें संस्करण के दौरान जिलाधिकारी ने 26 और बालिकाओं की शिक्षा को ‘संजीवनी’ प्रदान की। अब तक इस योजना के माध्यम से लगभग 1 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च कर 120 बेटियों की शिक्षा को पुनर्जीवित किया जा चुका है।

26 और बेटियों की राह हुई आसान: सीधे स्कूल खातों में पहुंची फीस

जिलाधिकारी सविन बंसल ने कलेक्ट्रेट में आयोजित एक कार्यक्रम में 26 बालिकाओं के लिए 6.93 लाख रुपये की फीस राशि जारी की। प्रशासन की कार्यप्रणाली की खास बात यह है कि यह धनराशि किसी बिचौलिए या नकद के बजाय सीधे संबंधित स्कूल और कॉलेज के बैंक खातों में हस्तांतरित की जाती है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

शनिवार को लाभान्वित हुई बेटियों में:

  • प्राथमिक स्तर: 10 बालिकाएं

  • माध्यमिक स्तर: 08 बालिकाएं

  • उच्च शिक्षा: 08 बालिकाएं (प्रोफेशनल कोर्सेज सहित)

जिया, अनुष्का और फलक: संघर्ष से सफलता की ओर

इस योजना ने कई ऐसी कहानियों को नया मोड़ दिया है जो अधूरेपन की ओर बढ़ रही थीं।

  1. कु. जिया: पिता की मृत्यु के बाद बी.फार्मा की पढ़ाई रुक गई थी। प्रशासन ने ₹39,500 की फीस जमा कर उन्हें वापस कॉलेज भेजा।

  2. अनुष्का प्रजापति: एमए प्रथम वर्ष की छात्रा, जिनकी पढ़ाई पिता के निधन के बाद संकट में थी, उनकी ₹87,450 की फीस प्रशासन ने वहन की।

  3. मानसी साहू: जियोलॉजी में पीएचडी के चौथे सेमेस्टर की फीस के लिए संघर्ष कर रही मानसी को ₹50,000 की मदद दी गई।

  4. सृष्टि और पलक: जिनके पिता गंभीर बीमारियों (कैंसर) से जूझ रहे हैं, उनकी बीसीए और एमएससी की शिक्षा को रुकने से बचाया गया।

“शिक्षा ही सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार”: जिलाधिकारी

बेटियों का हौसला बढ़ाते हुए जिलाधिकारी सविन बंसल ने बेहद प्रेरणादायक बात कही। उन्होंने कहा, “शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि एक ऐसा टूल (हथियार) है जिससे सफलता और सशक्तिकरण के बंद रास्ते खुलते हैं। जब एक बेटी पढ़ती है, तो वह अपने छोटे भाई-बहनों और समाज के लिए एक मिसाल बनती है।”

बंसल ने यह भी साझा किया कि वे राज्य सरकार से अनुरोध करेंगे कि ‘प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा’ को एक आधिकारिक नीति के रूप में शामिल किया जाए, ताकि पूरे प्रदेश में उन बेटियों की शिक्षा को पुनर्जीवित किया जा सके जो मजबूरियों के कारण स्कूल-कॉलेज छोड़ देती हैं।

‘लिजेंड्री’ स्तर पर प्रशासन का कार्य: ईवा आशीष श्रीवास्तव

कार्यक्रम में उपस्थित जनगणना निदेशक ईवा आशीष श्रीवास्तव ने देहरादून जिला प्रशासन के प्रयासों को ‘लिजेंड्री’ (असाधारण) करार दिया। उन्होंने बालिकाओं से कहा कि जिला प्रशासन जो ‘हेल्पिंग हैंड’ उन्हें दे रहा है, उसका सम्मान करें और भविष्य में खुद सफल होकर दूसरों की मदद करने का संकल्प लें।

मुख्य विकास अधिकारी (CDO) अभिनव शाह ने बताया कि प्रशासन केवल फीस जमा करके शांत नहीं बैठता, बल्कि इन बालिकाओं का निरंतर ‘फॉलो-अप’ भी लिया जाता है ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि वे अपनी पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं।

भावुक हुईं माताएं, मुख्यमंत्री का जताया आभार

कार्यक्रम में मौजूद कई बालिकाओं की माताएं अपने आंसू नहीं रोक सकीं। उन्होंने बताया कि पिता के जाने के बाद उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे घर चलाएं या बेटियों को पढ़ाएं। बालिकाओं ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और जिला प्रशासन का आभार जताते हुए संकल्प लिया कि वे खूब मेहनत करेंगी और भविष्य में समाज सेवा के लिए समर्पित रहेंगी।

सुशासन की नई परिभाषा

प्रोजेक्ट ‘नंदा-सुनंदा’ इस बात का प्रमाण है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो प्रशासन जनता के दुखों का साथी बन सकता है। देहरादून कलेक्ट्रेट से निकली यह पहल आज केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उन 120 बेटियों का आत्मविश्वास है, जिन्हें अब यह यकीन है कि उनके सपनों के पीछे पूरी सरकार खड़ी है।

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