नई दिल्ली। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) धधक उठा है। ईरान द्वारा अपने पड़ोसी देशों के अमेरिकी एयर बेसों पर किए जा रहे ताबड़तोड़ मिसाइल हमलों ने पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ा कर दिया है। इस वैश्विक संकट के बीच, भारत सरकार ने अपनी सुरक्षा और रणनीतिक तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है।
रविवार रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की एक उच्च स्तरीय और आपातकालीन बैठक आयोजित की गई। राजस्थान और गुजरात के अपने व्यस्त दौरे से दिल्ली लौटते ही पीएम मोदी सीधे इस बैठक में शामिल हुए, जो इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है।
सीसीएस की बैठक: रणनीतिक और आर्थिक हितों पर मंथन
रविवार रात करीब 9:30 बजे शुरू हुई इस बैठक में देश के शीर्ष नेतृत्व ने हिस्सा लिया। बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण उपस्थित रहीं। सूत्रों के अनुसार, बैठक का मुख्य एजेंडा 28 फरवरी को ईरान में हुई एयर स्ट्राइक के बाद उत्पन्न हुई हिंसक परिस्थितियों की समीक्षा करना था।
कमेटी को विशेष रूप से यूएई (UAE), कतर और बहरीन जैसे गल्फ देशों में हुए हमलों और वहां की सुरक्षा स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई। इन देशों में बड़े पैमाने पर भारतीय प्रवासी रहते हैं, जिनकी सुरक्षा अब भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा: सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता
गल्फ देशों में रहने वाला भारतीय समुदाय भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ की तरह है। सीसीएस की बैठक में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई गई।
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छात्र और यात्री: युद्ध जैसी स्थिति के कारण वहां फंसे भारतीय छात्रों, विशेषकर जो प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले हैं, उनकी मुश्किलों पर चर्चा हुई।
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आर्थिक प्रभाव: खाड़ी क्षेत्र से होने वाली कमर्शियल एक्टिविटी और तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है।
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सुरक्षा प्रोटोकॉल: पीएम मोदी ने सभी संबंधित विभागों को निर्देश दिया है कि प्रभावित भारतीयों की मदद के लिए हर संभव कूटनीतिक और रसद (Logistics) सहायता सुनिश्चित की जाए।
क्या है सीसीएस (CCS) और इसकी अहमियत?
कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) भारत का वह सर्वोच्च निकाय है, जो देश की रक्षा, सुरक्षा और रणनीतिक नीति निर्धारण के लिए जिम्मेदार है। इसमें प्रधानमंत्री के अलावा गृह, रक्षा, विदेश और वित्त मंत्री शामिल होते हैं। देश के किसी भी बड़े सुरक्षा संकट, जैसे कि वर्तमान का पश्चिम एशिया संकट, पर अंतिम निर्णय यहीं लिया जाता है।
इस बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) और अन्य शीर्ष सैन्य व खुफिया अधिकारियों ने मौजूदा स्थिति का ‘थ्रेट असेसमेंट’ (खतरे का आकलन) पेश किया। भारत की चिंता न केवल अपने नागरिकों को लेकर है, बल्कि व्यापारिक जहाजों के सुरक्षित आवागमन को लेकर भी है।
डिप्लोमेसी और बातचीत पर भारत का जोर
भारत ने हमेशा से अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने की वकालत की है। सीसीएस की बैठक में भी इसी रुख को दोहराया गया। भारत ने आह्वान किया है कि सभी पक्ष तत्काल प्रभाव से दुश्मनी को खत्म करें और डिप्लोमेसी (कूटनीति) के रास्ते पर लौटें। क्षेत्र में बढ़ती हिंसा न केवल पश्चिम एशिया बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है।
आर्थिक और सामरिक प्रभाव: एक गंभीर चुनौती
ईरान और उसके पड़ोसियों के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक तेल कीमतों में उछाल ला सकता है, जिसका सीधा असर भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ेगा। इसके अलावा, बहरीन और कतर जैसे देशों में हो रहे मिसाइल हमलों से वहां काम कर रहे लाखों भारतीयों के रोजगार पर भी संकट मंडरा रहा है।
बैठक के मुख्य निष्कर्ष:
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इमरजेंसी हेल्पलाइन: खाड़ी देशों में दूतावासों को 24/7 सक्रिय रहने के निर्देश।
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वैकल्पिक मार्ग: भारतीय जहाजों और विमानों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक मार्गों की तलाश।
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अंतरराष्ट्रीय सहयोग: मित्र राष्ट्रों के साथ मिलकर स्थिति को शांत करने का प्रयास।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की यह बैठक स्पष्ट संदेश देती है कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। पश्चिम एशिया में बदलते हालात भारत के लिए परीक्षा की घड़ी हैं, जहाँ उसे अपने आर्थिक हितों और प्रवासियों की सुरक्षा के बीच एक महीन संतुलन साधना होगा। आने वाले कुछ दिन वैश्विक शांति और भारतीय कूटनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाले हैं।



