
हल्द्वानी/नैनीताल। उत्तराखंड के प्रशासनिक गलियारों में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने ‘राजकीय शक्तियों के अवैध हस्तांतरण’ के मामले में बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक की। नैनीताल जिले में राजस्व अभिलेखों (Revenue Records) जैसे संवेदनशील कार्यों को निजी और अनधिकृत व्यक्तियों से कराने के गंभीर आरोप में दो रजिस्ट्रार कानूनगो को दोषी पाते हुए उनका डिमोशन कर दिया गया है।
प्रशासन ने इसे न केवल अनुशासनहीनता माना है, बल्कि सरकारी गोपनीयता और सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा करार दिया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तब प्रकाश में आया जब शिकायत मिली कि रजिस्ट्रार कानूनगो भूपेश चंद और अर्जुन सिंह बिष्ट अपने पद से जुड़े महत्वपूर्ण वैधानिक कार्य खुद करने के बजाय बाहरी और निजी व्यक्तियों से करा रहे थे। मामला संज्ञान में आते ही जिलाधिकारी ने इसे गंभीरता से लिया और तत्काल प्रभाव से दोनों को निलंबित करते हुए विभागीय जांच के आदेश दिए थे।
जांच के दौरान दस्तावेजी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट हो गया कि सरकारी दफ्तरों में बाहरी लोगों की दखलअंदाजी इन दोनों कार्मिकों की शह पर ही हो रही थी।
कार्यभार का बहाना नहीं आया काम
विभागीय जांच पूरी होने के बाद जब दोनों आरोपित कार्मिकों को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया गया, तो उन्होंने एक चौंकाने वाली दलील दी। दोनों कानूनगो ने स्वीकार किया कि उन्होंने निजी व्यक्तियों की मदद ली थी, लेकिन इसके पीछे उन्होंने ‘अत्यधिक कार्यभार’ और ‘लंबित फाइलों के दबाव’ को मुख्य कारण बताया।
हालांकि, जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक कार्यभार किसी भी सरकारी सेवक को अपनी वैधानिक शक्तियां किसी बाहरी व्यक्ति को सौंपने का अधिकार नहीं देता। यह न केवल राजकीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि भ्रष्टाचार की संभावनाओं को भी जन्म देता है।
राजस्व अभिलेखों की गोपनीयता पर बड़ा खतरा
राजस्व विभाग के दस्तावेज किसी भी जिले की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं। जमीन की रजिस्ट्री, खतौनी और अन्य अभिलेखों में हेरफेर से बड़े विवाद खड़े हो सकते हैं। जिलाधिकारी ने अपने आदेश में कहा कि:
“राजस्व अभिलेखों जैसे संवेदनशील कार्यों में निजी व्यक्तियों को शामिल करना सरकारी दस्तावेजों की गोपनीयता और विश्वसनीयता के साथ खिलवाड़ है। यह गंभीर कदाचार और कर्तव्य के प्रति घोर लापरवाही की श्रेणी में आता है।”
दंडादेश: ऊंचे पद से नीचे गिराए गए अधिकारी
विभागीय जांच रिपोर्ट के आधार पर जिलाधिकारी ने दोनों कार्मिकों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की है:
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भूपेश चंद और अर्जुन सिंह बिष्ट को उनके वर्तमान पद (रजिस्ट्रार कानूनगो) से तत्काल प्रभाव से पदावनत (Demoted) कर दिया गया है।
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उन्हें अब निम्न पद और कम वेतनमान पर कार्य करना होगा।
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यह दंडादेश उनकी सेवा पुस्तिका (Service Book) में भी दर्ज किया जाएगा, जिससे भविष्य में उनकी पदोन्नति पर भी असर पड़ेगा।
भ्रष्टाचार और लापरवाही पर ‘जीरो टॉलरेंस’
नैनीताल प्रशासन की इस कार्रवाई ने जिले के अन्य विभागों के लिए भी एक नजीर पेश की है। जिलाधिकारी ने यह भी साफ कर दिया है कि यह प्रशासनिक दंड है और यह मामला यहीं खत्म नहीं होता। यदि भविष्य में किसी अन्य एजेंसी जैसे विजिलेंस या आपराधिक जांच में इनकी संलिप्तता पाई जाती है, तो यह कार्रवाई उस जांच को प्रभावित नहीं करेगी, यानी इनके खिलाफ एफआईआर (FIR) की तलवार भी लटक रही है।
हल्द्वानी और नैनीताल के सरकारी दफ्तरों में हड़कंप
इस आदेश के बाद नैनीताल जिले के तहसील और ब्लॉक कार्यालयों में हड़कंप मचा हुआ है। अक्सर यह देखा जाता है कि कई बाबू और अधिकारी अपना काम हल्का करने के लिए ‘प्राइवेट लड़कों’ को दफ्तरों में बिठा लेते हैं। जिलाधिकारी की इस ‘क्लीन स्वीप’ कार्रवाई ने साफ संदेश दे दिया है कि सरकारी कुर्सियों पर बाहरी लोगों की मौजूदगी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सुशासन की दिशा में बड़ा कदम
उत्तराखंड की धामी सरकार लगातार ‘भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड’ का नारा दे रही है। नैनीताल जिलाधिकारी की यह कार्रवाई उसी विजन का हिस्सा मानी जा रही है। राजस्व विभाग जैसे महत्वपूर्ण महकमे में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ऐसे कड़े फैसले अनिवार्य हैं।



