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उत्तराखंड: 50 करोड़ के खनन जुर्माने की ‘फाइल’ में बड़ा झोल, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से मांगा पुख्ता सबूतों वाला शपथपत्र

The Hill India News
Last updated: March 31, 2026 2:26 pm
The Hill India News
Published: March 31, 2026
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नैनीताल। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ नैनीताल हाईकोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अख्तियार किया है। नैनीताल के तत्कालीन जिलाधिकारी (2016-17) द्वारा 18 स्टोन क्रशरों पर लगे करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक के अवैध खनन और भंडारण जुर्माने को संदिग्ध रूप से माफ किए जाने के मामले में मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सुनवाई की। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता से दो सप्ताह के भीतर सभी संबंधित दस्तावेजों को अतिरिक्त शपथपत्र के माध्यम से पेश करने का आदेश दिया है।

Contents
सरकारी आंकड़ों और आरटीआई में ‘विरोधाभास’ का खेलचुनिंदा स्टोन क्रशरों पर ‘मेहरबानी’ का आरोपजांच के नाम पर चार साल से ‘फाइल’ का चक्करराजस्व की हानि और कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सरकारी आंकड़ों और आरटीआई में ‘विरोधाभास’ का खेल

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष हुई। याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता भुवन पोखरिया ने कोर्ट के सामने चौंकाने वाले तथ्य रखे। पोखरिया का आरोप है कि शासन के सचिव, जिला खान अधिकारी और जिलाधिकारियों द्वारा पेश की गई रिपोर्टों में जमीन-आसमान का अंतर है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, “आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी और सचिव खनन द्वारा कोर्ट में दाखिल शपथपत्र के आंकड़ों में 50 से 80 करोड़ रुपये का अंतर आ रहा है।” यह विसंगति सीधे तौर पर राजस्व चोरी और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है। जब पोखरिया ने आरटीआई से जिले के 18 स्टोन क्रशरों के जुर्माने की सूचना मांगी, तो उन्हें केवल 12 की जानकारी दी गई, जबकि शेष 6 का रिकॉर्ड न होने का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया गया।

चुनिंदा स्टोन क्रशरों पर ‘मेहरबानी’ का आरोप

जनहित याचिका (PIL) में सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि तत्कालीन जिलाधिकारी ने ‘पिक एंड चूज’ की नीति अपनाई। याचिका के अनुसार, जिलाधिकारी ने केवल उन्हीं स्टोन क्रशरों का जुर्माना माफ किया जिन पर करोड़ों रुपये की देनदारी थी। इसके विपरीत, जिन छोटे कारोबारियों पर कम जुर्माना था, उन्हें कोई राहत नहीं दी गई।

तुलनात्मक आंकड़ों को देखें तो सचिव की रिपोर्ट कहती है कि 2016 से अब तक नैनीताल में अवैध भंडारण के 23 केस दर्ज हुए, जिनमें 18 का जुर्माना माफ हुआ। लेकिन आरटीआई से मिले आंकड़े बताते हैं कि 2015 से 2019 के बीच कुल 144 केस दर्ज हुए थे, जिनमें से 90 प्रतिशत का जुर्माना शून्य कर दिया गया। यह उत्तराखंड अवैध खनन जुर्माना घोटाला शासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करता है।

जांच के नाम पर चार साल से ‘फाइल’ का चक्कर

हैरानी की बात यह है कि जब इस मामले की शिकायत मुख्य सचिव और सचिव खनन से की गई, तो इसे ‘जिलाधिकारी का विशेषाधिकार’ बताकर टाल दिया गया। हालांकि, आरटीआई से खुलासा हुआ कि औद्योगिक विभाग की नियमावली में जिलाधिकारी के पास ऐसा कोई विशेष अधिकार है ही नहीं जिससे वह करोड़ों का जुर्माना माफ कर सके।

वर्ष 2020 में तत्कालीन मुख्य सचिव के निर्देश पर औद्योगिक सचिव ने नैनीताल के जिलाधिकारी को ही जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया—यानी जिस पद पर आरोप थे, उसी पद को जांच सौंप दी गई। डीएम ने यह जांच एसडीएम हल्द्वानी को फॉरवर्ड कर दी। 21 अक्टूबर 2020 को जांच आख्या प्रस्तुत करने के आदेश दिए गए थे, लेकिन चार साल बीत जाने के बाद भी रिपोर्ट ठंडे बस्ते में है।

राजस्व की हानि और कोर्ट की सख्त टिप्पणी

याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि देवभूमि के सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये की सीधी चपत है। उत्तराखंड अवैध खनन जुर्माना घोटाला में दस्तावेजों की हेराफेरी इस कदर की गई है कि विभिन्न विभागों के रिकॉर्ड आपस में मेल नहीं खा रहे हैं।

अदालत ने अब याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वे अपनी आरटीआई रिपोर्ट और सचिव के शपथपत्र के बीच के अंतर को स्पष्ट करने वाले तमाम साक्ष्य कोर्ट के पटल पर रखें। यदि दो सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई में याचिकाकर्ता के दावे सही पाए जाते हैं, तो तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों और संबंधित स्टोन क्रशर स्वामियों पर कानून का शिकंजा कसना तय माना जा रहा है।

यह मामला केवल एक जिले के जुर्माने का नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की पोल खोलता है जहाँ नियम-कानूनों को ताक पर रखकर रसूखदारों को फायदा पहुँचाया जाता है। अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि उत्तराखंड के राजस्व को लगी इस चपत की भरपाई कैसे होगी और दोषियों पर क्या कार्रवाई की जाएगी।

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