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उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा कदम: गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति पर UGC को नोटिस, जानें क्या है पूरा विवाद?

नैनीताल: उत्तराखंड के शैक्षिक गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया जब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय (HNBGU) के कुलपति की नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठाने वाली एक जनहित याचिका पर कड़ा रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब पेश करने का आदेश दिया है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब प्रोफेसर नवीन प्रकाश नौटियाल ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर वर्तमान कुलपति प्रोफेसर प्रकाश सिंह की नियुक्ति को निरस्त (Quash) करने की मांग की। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह नियुक्ति न केवल केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 का उल्लंघन है, बल्कि यह यूजीसी (UGC) के कड़े मानकों की भी अनदेखी करती है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही और विज्ञापन में निर्धारित शर्तों को दरकिनार कर एक ऐसी नियुक्ति की गई जो ‘मेरिट-आधारित’ प्रणाली की पवित्रता को भंग करती है।


अनुभव की पात्रता पर छिड़ी कानूनी जंग

मामले का सबसे विवादास्पद पहलू यूजीसी विनियम, 2018 (विनियम 7.3) है। इस नियम के तहत, किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के लिए किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय में ‘प्रोफेसर’ के रूप में न्यूनतम 10 वर्षों का अनुभव अनिवार्य है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रोफेसर प्रकाश सिंह इस पात्रता को पूरा नहीं करते हैं। विवाद के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • IIPA का अनुभव: प्रोफेसर सिंह ने भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) में चेयर प्रोफेसर के रूप में कार्य किया है। याचिका में कहा गया है कि IIPA न तो कोई पूर्णकालिक विश्वविद्यालय है और न ही यह यूजीसी के शैक्षणिक मानदंडों द्वारा शासित संस्था है।

  • समकक्षता का अभाव: शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी मूल विज्ञापन में स्पष्ट रूप से ‘विश्वविद्यालय में 10 वर्ष का प्रोफेसर अनुभव’ मांगा गया था। याचिकाकर्ता का तर्क है कि IIPA के अनुभव को विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के समकक्ष नहीं माना जा सकता।

  • शर्तों में बदलाव: याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न नजीरों का हवाला देते हुए कहा गया है कि चयन समिति चयन प्रक्रिया के बीच में पात्रता शर्तों को शिथिल या परिवर्तित नहीं कर सकती।


संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन

याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष दलील दी है कि यह नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन है। जब विज्ञापन में शर्तें स्पष्ट थीं, तो किसी भी प्रकार की ‘रिप्लेसमेंट’ या ‘समकक्षता’ की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए थी।

“कुलपति की निरंतरता न केवल अवैध है, बल्कि यह उन योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय है जो निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं। यह सार्वजनिक पद के दुरुपयोग का मामला है।” – याचिकाकर्ता की दलील


हाईकोर्ट की टिप्पणी और आगामी कार्रवाई

नैनीताल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्राथमिक सुनवाई के बाद माना कि मामला उच्च शिक्षा के मानकों और वैधानिक नियमों से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों के प्रतिकूल की गई कोई भी नियुक्ति लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकती।

कोर्ट की टाइमलाइन:

  1. नोटिस: यूजीसी को तीन सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने का निर्देश।

  2. जवाबदेही: केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

  3. अगली सुनवाई: कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 11 मार्च 2026 की तिथि निर्धारित की है।

विश्वविद्यालय पर क्या होगा असर?

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय उत्तराखंड का एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय है। कुलपति की नियुक्ति पर उठे इस कानूनी सवाल ने विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कामकाज और भविष्य के निर्णयों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं। यदि कोर्ट नियुक्ति को अवैध पाता है, तो विश्वविद्यालय को नए सिरे से चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है, जो उच्च शिक्षा के माहौल को प्रभावित कर सकता है।

उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों की पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा संकेत है। 11 मार्च को होने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि क्या प्रोफेसर प्रकाश सिंह अपने पद पर बने रहेंगे या गढ़वाल विश्वविद्यालय को नया नेतृत्व मिलेगा।

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