
देहरादून: उत्तराखंड राज्य की सत्ता के केंद्र ‘सचिवालय’ में पिछले काफी समय से शांत पड़ी कर्मचारी राजनीति अब करवट लेने लगी है। सचिवालय संघ के बहुप्रतीक्षित चुनावों को लेकर शासन ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। सचिवालय प्रशासन की ओर से निर्वाचन विभाग को एक महत्वपूर्ण पत्र प्रेषित किया गया है, जिसमें जल्द से जल्द निर्वाचन अधिकारी (Election Officer) नामित करने का अनुरोध किया गया है। शासन के इस कदम से उन अटकलों पर विराम लग गया है जिनमें चुनाव टलने की बातें कही जा रही थीं।
कार्यकाल समाप्ति के बाद बढ़ता असंतोष और शासन की सक्रियता
नियमों के अनुसार, उत्तराखंड सचिवालय संघ के चुनाव प्रत्येक दो वर्ष के अंतराल पर आयोजित किए जाने अनिवार्य हैं। वर्तमान कार्यकारिणी का वैधानिक कार्यकाल 31 जुलाई 2025 को ही समाप्त हो चुका था। इसके बावजूद, नई कार्यकारिणी के गठन को लेकर शासन स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं की गई थी। लगभग सात-आठ महीनों की इस देरी ने सचिवालय के कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया था।
कर्मचारी संगठनों का तर्क था कि बिना चुनी हुई कार्यकारिणी के, कर्मचारियों की समस्याओं को सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रखा जा पा रहा है। पदोन्नति, वेतन विसंगति और अन्य सेवा संबंधी मुद्दों पर निर्णय लेने में देरी हो रही थी। इसी दबाव और सचिवालय संघ के सदस्यों द्वारा लगातार दिए जा रहे ज्ञापनों के बाद अब सचिवालय प्रशासन ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर चुनाव की प्रक्रिया को गति दी है।

निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति: चुनावी प्रक्रिया का पहला पड़ाव
सचिवालय प्रशासन द्वारा मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजे गए पत्र का अर्थ यह है कि अब गेंद निर्वाचन विभाग के पाले में है। निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया का सबसे अहम और बुनियादी चरण होता है। जैसे ही अधिकारी का नाम तय होगा, वैसे ही चुनाव के विस्तृत कार्यक्रम (Schedule) की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति के बाद निम्नलिखित चरणों पर कार्य शुरू होगा:
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मतदाता सूची का पुनरीक्षण: सचिवालय के कुल कर्मचारियों और पात्र मतदाताओं की सूची को अंतिम रूप देना।
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नामांकन प्रक्रिया: विभिन्न पदों (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव आदि) के लिए उम्मीदवारों से आवेदन आमंत्रित करना।
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नाम वापसी और जांच: नामांकन पत्रों की स्क्रूटनी और इच्छुक उम्मीदवारों को नाम वापस लेने का समय देना।
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मतदान और मतगणना: अंत में मतदान की तिथि और उसी दिन या अगले दिन परिणाम घोषित करने का कार्यक्रम।
सचिवालय में गरमाया माहौल: संभावित उम्मीदवारों ने कसी कमर
भले ही चुनाव की तारीखों का आधिकारिक ऐलान अभी बाकी है, लेकिन सचिवालय के गलियारों में चुनावी सरगर्मी साफ देखी जा सकती है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद से ही कई गुट सक्रिय हो गए थे, जो अब शासन की चिट्ठी के बाद पूरी तरह से ‘चुनावी मोड’ में आ गए हैं।
अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और महासचिव जैसे रसूखदार पदों के लिए कई वरिष्ठ अधिकारियों ने लंच ब्रेक और कार्यालय समय के बाद मेल-मिलाप तेज कर दिया है। सोशल मीडिया ग्रुप्स और अनौपचारिक बैठकों में चुनावी रणनीतियां बनाई जा रही हैं। इस बार का चुनाव इसलिए भी दिलचस्प होने वाला है क्योंकि लंबे अंतराल के बाद नई ऊर्जा के साथ युवा कर्मचारी भी अपनी दावेदारी ठोकने की तैयारी में हैं।
सचिवालय संघ का महत्व: क्यों है यह चुनाव खास?
उत्तराखंड की नौकरशाही और शासन व्यवस्था में सचिवालय संघ की भूमिका किसी सेतु से कम नहीं है। यह संघ न केवल कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि शासन की नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली व्यवहारिक दिक्कतों को भी सरकार के सामने रखता है।
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कर्मचारियों की आवाज: वेतन भत्तों से लेकर कार्यस्थल की सुविधाओं तक, संघ एक मजबूत दबाव समूह के रूप में कार्य करता है।
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नीतिगत हस्तक्षेप: कई बार बड़े प्रशासनिक सुधारों में संघ के सुझावों को शासन द्वारा गंभीरता से लिया जाता है।
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लोकतांत्रिक प्रक्रिया: समय पर चुनाव होना स्वस्थ कार्य संस्कृति का प्रतीक है, जिससे कर्मचारियों में व्यवस्था के प्रति विश्वास बना रहता है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के निर्णय पर टिकी नजरें
शासन के पत्र के बाद अब सबकी नजरें मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय पर टिकी हैं। सूत्रों का कहना है कि अगले एक से दो सप्ताह के भीतर निर्वाचन अधिकारी के नाम पर मुहर लग सकती है। यदि ऐसा होता है, तो अप्रैल या मई माह के भीतर सचिवालय संघ को अपनी नई कार्यकारिणी मिल सकती है।
सचिवालय के एक वरिष्ठ सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “देर आए दुरुस्त आए। शासन ने निर्वाचन अधिकारी के लिए पत्र भेजकर सकारात्मक संकेत दिया है। हम चाहते हैं कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और जल्द से जल्द मतदान संपन्न कराया जाए ताकि रुकी हुई मांगों पर काम शुरू हो सके।”
सचिवालय संघ चुनाव केवल एक सांगठनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड सचिवालय की कार्यक्षमता और आंतरिक लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने वाला आयोजन है। शासन द्वारा शुरू की गई इस कवायद ने निश्चित रूप से कर्मचारियों के चेहरों पर मुस्कान लौटाई है। अब देखना यह होगा कि निर्वाचन विभाग कितनी तत्परता से अधिकारी नामित करता है और कब ‘सत्ता के गलियारे’ में वोट की चोट से नई लीडरशिप उभर कर आती है।



