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Reading: Uttarakhand: ‘दून बुक फेस्टिवल-2026’ का आगाज: सीएम धामी ने कई किताबों का किया विमोचन 
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Uttarakhand: ‘दून बुक फेस्टिवल-2026’ का आगाज: सीएम धामी ने कई किताबों का किया विमोचन 

The Hill India News
Last updated: April 4, 2026 12:14 pm
The Hill India News
Published: April 4, 2026
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देहरादून। देवभूमि की राजधानी देहरादून एक बार फिर साहित्य, संस्कृति और वैचारिक विमर्श के केंद्र में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को भव्य समारोह के बीच “दून बुक फेस्टिवल-2026” का विधिवत शुभारंभ किया। शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार) और उत्तराखंड सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह महोत्सव न केवल पुस्तकों का मेला है, बल्कि यह उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और आधुनिक साहित्यिक सोच का एक अनूठा संगम बनकर उभरा है।

Contents
साहित्य ग्राम से ‘साहित्यिक पर्यटन’ तक: एक दूरगामी विजन9 दिनों का ज्ञान कुंभ: बच्चों के लिए ‘चिल्ड्रेन पवेलियन’ खास“उपहार में दें पुस्तक और पौधा”सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता का संतुलनदिग्गज हस्तियों की रही गरिमामयी उपस्थिति

मुख्यमंत्री ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की और देश-दुनिया से जुटे साहित्यकारों, प्रकाशकों एवं पुस्तक प्रेमियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। उद्घाटन सत्र के दौरान सीएम धामी ने विभिन्न स्टालों का भ्रमण किया और विशेष रूप से गढ़वाली एवं कुमांऊनी भाषाओं की नवीन पुस्तकों का विमोचन कर क्षेत्रीय बोलियों के संरक्षण का संदेश दिया।

साहित्य ग्राम से ‘साहित्यिक पर्यटन’ तक: एक दूरगामी विजन

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में एक महत्वपूर्ण विजन साझा किया। उन्होंने घोषणा की कि उत्तराखंड को अब केवल धार्मिक और साहसिक पर्यटन ही नहीं, बल्कि ‘साहित्यिक पर्यटन’ के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।

“हमारी सरकार राज्य में ‘साहित्य ग्रामों’ की स्थापना कर रही है। ये गांव साहित्यकारों को सृजन के लिए शांत और अनुकूल वातावरण प्रदान करेंगे। जब लेखक और विचारक यहाँ आकर ठहरेंगे, तो उत्तराखंड की सुंदर वादियों के साथ-साथ यहाँ की बौद्धिक संपदा का भी देश-दुनिया में प्रचार होगा।” — पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री

उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान और साहित्य भूषण जैसे पुरस्कारों के जरिए राज्य के कलमकारों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।

9 दिनों का ज्ञान कुंभ: बच्चों के लिए ‘चिल्ड्रेन पवेलियन’ खास

यह महोत्सव 9 दिनों तक चलेगा, जिसमें ‘लेखक से मिलिए’ (Meet the Author) जैसे सत्रों के माध्यम से पाठकों को अपने पसंदीदा रचनाकारों से सीधा संवाद करने का मौका मिलेगा। मुख्यमंत्री ने इस आयोजन में “चिल्ड्रेन पवेलियन” की स्थापना को एक क्रांतिकारी कदम बताया।

आज के डिजिटल युग में, जहाँ बच्चे मोबाइल और स्क्रीन की दुनिया में खोए हैं, वहां पुस्तकों के प्रति रुचि जगाने के लिए यह पवेलियन एक प्रेरक केंद्र बनेगा। सीएम ने जोर देकर कहा कि यदि बचपन में पठन-पाठन की नींव मजबूत होगी, तो भविष्य का समाज अधिक जागरूक और वैचारिक रूप से समृद्ध होगा।

“उपहार में दें पुस्तक और पौधा”

मुख्यमंत्री ने समाज में एक नई सांस्कृतिक परंपरा विकसित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि शुभ अवसरों पर गुलदस्ते या प्लास्टिक के उपहार देने के बजाय, हमें ‘पुस्तक और पौधा’ भेंट करने की आदत डालनी चाहिए। यह न केवल ज्ञान के प्रकाश को फैलाएगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी को भी दर्शाएगा।

सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता का संतुलन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘पंच प्रण’ का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को पुनः प्रतिष्ठित कर रहा है। उत्तराखंड सरकार भी इसी दिशा में कार्य करते हुए विभिन्न भाषाओं में ग्रंथों के प्रकाशन के लिए अनुदान प्रदान कर रही है। मुख्यमंत्री के अनुसार, पुस्तकें केवल कागज का पुलिंदा नहीं हैं, बल्कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान हस्तांतरित करने वाला एक स्थायी सेतु हैं।

दिग्गज हस्तियों की रही गरिमामयी उपस्थिति

कार्यक्रम के दौरान मंच पर उत्तराखंड की राजनीतिक और बौद्धिक जगत की जानी-मानी हस्तियां मौजूद रहीं। इनमें कैबिनेट मंत्री श्री खजान दास, देहरादून के मेयर श्री सौरभ थपलियाल और आयुर्वेद के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बनाने वाले आचार्य बालकृष्ण प्रमुख थे।

वहीं, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT) के अध्यक्ष प्रो. मिलिन्द मराठी और निदेशक श्री युवराज मलिक ने महोत्सव की रूपरेखा और राष्ट्रीय स्तर पर इसके महत्व पर प्रकाश डाला। देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी के उपाध्यक्ष श्री अमन बंसल ने भी शिक्षा और साहित्य के समन्वय पर अपने विचार रखे।

दून बुक फेस्टिवल-2026 केवल एक आयोजन मात्र नहीं है, बल्कि यह बदलते उत्तराखंड की उस तस्वीर को पेश करता है जहाँ विकास की दौड़ के बीच अपनी भाषा, बोली और साहित्य को सुरक्षित रखने का जज्बा भी कायम है। आने वाले आठ दिनों तक देहरादून की फिजाओं में शब्दों की गूंज और पन्नों की खुशबू बिखरी रहेगी, जो निश्चित रूप से प्रदेश की साहित्यिक चेतना को एक नई ऊर्जा प्रदान करेगी।

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