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उत्तराखंड: मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर कांग्रेस का धामी सरकार पर वार, यशपाल आर्य बोले- “अंतर्कलह में फंसी पार्टी”

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों ‘मंत्रिमंडल विस्तार’ एक ऐसा मुद्दा बन गया है, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग को तेज कर दिया है। लंबे समय से खाली चल रहे कैबिनेट पदों को लेकर जहां भाजपा के भीतर सुगबुगाहट तेज है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे सरकार की विफलता और आंतरिक कलह का नतीजा करार दिया है।

उत्तराखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के दिग्गज नेता यशपाल आर्य ने भाजपा सरकार और संगठन पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। उन्होंने दावा किया कि विधायकों के बढ़ते असंतोष और संगठन के साथ तालमेल की कमी के कारण ही मंत्रिमंडल विस्तार को बार-बार टाला जा रहा है।


सरकार और संगठन में ‘कोऑर्डिनेशन’ का अभाव

यशपाल आर्य ने देहरादून में पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी खुद को दुनिया की सबसे अनुशासित पार्टी होने का दावा करती है, लेकिन उत्तराखंड में यह अनुशासन केवल कागजों तक सीमित रह गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार और संगठन के बीच सामंजस्य (Coordination) की भारी कमी है।

“यदि भाजपा सरकार में सब कुछ सामान्य होता, तो कैबिनेट के खाली पदों को भरने में इतनी देरी क्यों हो रही है? सच तो यह है कि मुख्यमंत्री और प्रदेश संगठन के बीच असहमति की खाई गहरी हो चुकी है। विधायकों की नाराजगी इतनी बढ़ गई है कि किसी एक को मंत्री बनाने पर दूसरे की बगावत का डर सत्ता को सता रहा है।” – यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष


विधायकों की नाराजगी और ‘वेटिंग लिस्ट’ की राजनीति

उत्तराखंड में वर्तमान में मंत्रिमंडल में कुछ पद खाली चल रहे हैं, जिसके लिए भाजपा के कई वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री कतार में हैं। यशपाल आर्य का तर्क है कि मंत्रिमंडल विस्तार को टालने के पीछे मुख्य कारण ‘असंतोष का प्रबंधन’ न कर पाना है।

आर्य के हमले के प्रमुख बिंदु:

  • भीतरघात का डर: कांग्रेस नेता के अनुसार, कई विधायक अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली से खुश नहीं हैं। विकास कार्यों की अनदेखी और नौकरशाही के हावी होने की शिकायतों ने विधायकों में रोष पैदा किया है।

  • अनुशासन का मुखौटा: उन्होंने भाजपा पर तंज कसते हुए कहा कि पार्टी अपने ही नेताओं के अनुशासनहीन बयानों पर कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।

  • प्रशासनिक शिथिलता: मंत्रिमंडल विस्तार न होने का सीधा असर राज्य के विकास और प्रशासनिक निर्णयों पर पड़ रहा है। कई मंत्रियों के पास अतिरिक्त विभागों का बोझ है, जिससे जनहित के कार्य प्रभावित हो रहे हैं।


2027 के चुनाव और ‘सत्ता परिवर्तन’ का दावा

नेता प्रतिपक्ष ने न केवल वर्तमान सरकार को घेरा, बल्कि भविष्य की राजनीतिक पटकथा भी लिख दी। उन्होंने कहा कि भाजपा के भीतर चल रही यह खींचतान आने वाले समय में पार्टी के लिए आत्मघाती साबित होगी।

यशपाल आर्य ने विश्वास जताते हुए कहा कि जनता भाजपा के ‘अंतर्कलह’ और ‘अधूरी घोषणाओं’ को देख रही है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में राज्य की जनता इस कुशासन का जवाब देगी और कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी। उनके अनुसार, भाजपा की यह अंदरूनी लड़ाई कांग्रेस के लिए एक मजबूत राजनीतिक आधार तैयार कर रही है।


भाजपा का पलटवार: “विपक्ष का काम केवल भ्रम फैलाना”

हालांकि, कांग्रेस के इन आरोपों पर भाजपा की ओर से भी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। भाजपा संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है और इसे सही समय पर पूरा कर लिया जाएगा। भाजपा ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि जो पार्टी खुद गुटबाजी से जूझ रही है, उसे भाजपा के अनुशासन पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।


राजनीतिक विश्लेषण: क्यों फंसा है पेंच?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड में मंत्रिमंडल विस्तार केवल पदों को भरने का मामला नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को साधने की एक बड़ी चुनौती भी है। कुमाऊं और गढ़वाल के बीच संतुलन बनाना, साथ ही पुराने और नए विधायकों की महत्वाकांक्षाओं को शांत करना मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए एक ‘फायरवॉक’ जैसा है।

क्या हो सकते हैं परिणाम?

  1. यदि विस्तार हुआ: तो असंतुष्ट गुट को शांत किया जा सकता है, लेकिन जो विधायक छूट जाएंगे उनकी नाराजगी बढ़ सकती है।

  2. यदि विस्तार टला: तो विपक्ष को ‘कमजोर सरकार’ का नैरेटिव सेट करने का और अधिक मौका मिलेगा।

यशपाल आर्य के कड़े तेवरों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति और अधिक गरमाने वाली है। मंत्रिमंडल विस्तार में हो रही देरी न केवल सरकार की छवि पर सवाल उठा रही है, बल्कि विपक्ष को एक धारदार हथियार भी थमा रही है। अब देखना यह होगा कि भाजपा आलाकमान इस राजनीतिक संकट और विपक्ष के हमलों का जवाब किस तरह देता है।

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