देशफीचर्ड

उच्चतम न्यायालय ने कई राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली नई याचिकाओं पर निर्वाचन आयोग से किया जवाब तलब

नई दिल्ली, 21 नवंबर: देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर जारी विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। केरल, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली नई याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए निर्वाचन आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की तीन-न्यायाधीशीय पीठ ने कहा कि विभिन्न राज्यों से आई याचिकाओं में समान मुद्दे उठाए गए हैं, इसलिए उन सभी को एक साथ सुनना व्यावहारिक और न्यायसंगत होगा। अदालत ने निर्वाचन आयोग से इन याचिकाओं पर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है।


क्या है विवाद?

देशभर में आगामी चुनावों की तैयारियों के बीच निर्वाचन आयोग ने कई राज्यों में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) शुरू किया है। आयोग का कहना है कि:

  • मृतकों, डुप्लीकेट वोटरों, दूसरी जगह स्थानांतरित हो चुके नागरिकों और अन्य त्रुटियों को हटाने के लिए एसआईआर आवश्यक है।
  • इससे मतदाता सूचियां अधिक सटीक और अद्यतन होंगी।
  • पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।

लेकिन विपक्षी दलों, कई गैर-सरकारी संगठनों और कुछ नागरिक समूहों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि:

  • एसआईआर को पर्याप्त समय, पारदर्शिता और निष्पक्षता के बिना लागू किया जा रहा है।
  • कुछ राज्यों में लाखों वैध मतदाताओं के नाम काटे जाने का खतरा है।
  • यह प्रक्रिया संभावित रूप से “राजनीतिक रूप से प्रेरित” या “लक्षित” हो सकती है।
  • कई जगह बिना सूचना दिए सत्यापन किया जा रहा है।

इसी के चलते कई राज्यों में राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों ने एसआईआर को अदालत में चुनौती दी है।


किन राज्यों में दायर हुई हैं याचिकाएँ?

सुप्रीम कोर्ट में जिन राज्यों से एसआईआर के खिलाफ नई याचिकाएँ दाखिल हुई हैं, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • केरल – जहाँ विपक्ष का आरोप है कि लाखों वैध मतदाताओं के नाम हटाने का खतरा है व अधिकारियों ने प्रक्रिया जल्दबाजी में शुरू की।
  • उत्तर प्रदेश – कुछ राजनीतिक दलों ने दावा किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिना ग्राउंड-वेरिफिकेशन के नाम काटने की तैयारी हो रही है।
  • तेलंगाना, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और त्रिपुरा – यहां भी मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर कई तकनीकी और प्रक्रियात्मक आपत्तियाँ उठाई गई हैं।

इन सभी मामलों में मुख्य आरोप यह है कि एसआईआर प्रक्रिया को पर्याप्त पारदर्शिता, नोटिस और सार्वजनिक भागीदारी के बिना लागू किया जा रहा है, जिससे वैध मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि:

  • सभी याचिकाओं में उठाए गए मुद्दे समान प्रकृति के हैं।
  • मतदाताओं के अधिकार संवैधानिक और मौलिक महत्व रखते हैं।
  • निर्वाचन आयोग को अपना पक्ष स्पष्ट और विस्तृत रूप से रखना होगा।
  • अदालत मतदाता सूची में सुधार या पुनरीक्षण प्रक्रिया में अनावश्यक दखल नहीं देना चाहती, लेकिन नागरिक अधिकारों की सुरक्षा सर्वोपरि है।

पीठ ने यह भी संकेत दिया कि निर्वाचन आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि:

  • एसआईआर किन कारणों से आवश्यक हुआ?
  • प्रक्रिया के दौरान पारदर्शिता और निष्पक्षता को कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है?
  • क्या पर्याप्त नोटिस और शिकायत समाधान तंत्र उपलब्ध है?
  • क्या प्रत्येक नाम हटाने/संशोधन की प्रक्रिया को सत्यापित किया जाएगा?

निर्वाचन आयोग पर बढ़ा दबाव

निर्वाचन आयोग पहले से ही विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों की त्रुटियों, डुप्लीकेट नामों और फर्जी वोटिंग की शिकायतों से जूझ रहा है। आयोग ने दावा किया था कि एसआईआर एक सामान्य तकनीकी प्रक्रिया है, जिसे हर वर्ष किया जाता है और यह किसी खास राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित नहीं है।

लेकिन लगातार बढ़ती कानूनी चुनौतियों के चलते अब आयोग पर यह दबाव है कि वह:

  1. पारदर्शिता बढ़ाए
  2. विस्तृत दिशानिर्देश जारी करे
  3. प्रक्रिया में स्थानीय राजनीतिक दलों की भागीदारी सुनिश्चित करे
  4. और यह सिद्ध करे कि एसआईआर किसी भी तरह से वैध मतदाताओं के अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर रहा

अब अदालत ने जब औपचारिक रूप से नोटिस जारी कर दिया है, तो आयोग को तय समय में अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया दाखिल करनी होगी।


केरल और यूपी की याचिकाएँ क्यों चर्चा में?

केरल

केरल में एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि:

  • कई विधानसभा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नाम हटाने की तैयारी है।
  • मतदाताओं को पर्याप्त नोटिस नहीं दिया जा रहा।
  • बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) को अत्यधिक दबाव में काम कराना पड़ रहा है।

राज्य में विपक्षी दलों ने इसे “लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ कदम” करार दिया है।

उत्तर प्रदेश

यूपी की याचिकाओं में कहा गया है कि:

  • बिना ग्राउंड रिपोर्ट और सत्यापन के नाम हटाए जाने की शिकायतें मिल रही हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को सूचना तक नहीं मिल रही।
  • एसआईआर का समय राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, जिससे संदेह पैदा होता है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी होने के बाद अब अगली सुनवाई में निर्वाचन आयोग को अपना विस्तृत पक्ष रखना होगा। अदालत इन सभी याचिकाओं को एक साथ क्लब करके सुन सकती है, ताकि एक समान कानूनी दृष्टिकोण विकसित हो सके।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार:

  • यदि अदालत को लगे कि एसआईआर में पारदर्शिता की कमी है, तो वह आयोग को प्रक्रिया में सुधार के निर्देश दे सकती है।
  • यदि कोई गंभीर त्रुटि पाई जाती है तो कुछ राज्यों में पुनरीक्षण प्रक्रिया को रोकने या संशोधित करने का आदेश भी दिया जा सकता है।
  • वहीं, आयोग यह साबित कर सकता है कि यह एक नियमित और कानूनी प्रक्रिया है, जो मतदाता सूचियों को साफ-सुथरा बनाने के लिए जरूरी है।

मतदाता सूची लोकतंत्र की आधारशिला है। उसमें किसी भी प्रकार की त्रुटि या पक्षपात सीधे नागरिकों के मतदान अधिकार को प्रभावित कर सकती है। इसलिए एसआईआर जैसी प्रक्रिया पर उठे सवालों का जवाब देना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है—और अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले पर बारीकी से नजर रखेगा। आने वाली सुनवाई इस बात का फैसला करेगी कि एसआईआर प्रक्रिया आगे कैसे और किन शर्तों के साथ जारी रह पाएगी।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button