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“उच्च शिक्षा का अधिकार हल्के में खत्म नहीं किया जा सकता”: MBBS छात्र के पक्ष में दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली। शिक्षा और करियर के अधिकार को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी छात्र को उच्च या प्रोफेशनल शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से बिना किसी ठोस और वैध कारण के वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस जसमीत सिंह की एकल पीठ ने एक मेडिकल छात्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अहम टिप्पणी की, जिसका MBBS एडमिशन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा रद्द कर दिया गया था।

कोर्ट ने सरकार और नियामक संस्थाओं को सचेत करते हुए कहा कि भले ही उच्च शिक्षा का अधिकार संविधान में प्रत्यक्ष रूप से मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज न हो, लेकिन यह राज्य की ‘सकारात्मक जिम्मेदारी’ है कि वह इसे सुनिश्चित करे।


मामला क्या है? NEET-UG 2024 और एडमिशन का विवाद

यह कानूनी विवाद NEET-UG 2024 परीक्षा के परिणामों से जुड़ा है। याचिकाकर्ता छात्र ने अपनी मेहनत और मेरिट के दम पर अखिल भारतीय रैंक (AIR) 28,106 हासिल की थी। इस रैंक के आधार पर उसे ओडिशा के प्रतिष्ठित भीमा भोई मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में MBBS कोर्स में दाखिला मिला था।

हालाँकि, उसकी शैक्षणिक यात्रा में तब बाधा आई जब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने एक चौंकाने वाला कदम उठाया। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से मिली कुछ गोपनीय सूचनाओं के आधार पर, NTA ने छात्र का रिजल्ट वापस ले लिया और परिणामस्वरूप उसका एडमिशन रद्द कर दिया गया। इसी कार्रवाई को छात्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।


कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “राज्य की जिम्मेदारी है शिक्षा का संरक्षण”

सुनवाई के दौरान जस्टिस जसमीत सिंह ने शिक्षा के अधिकार की व्यापक व्याख्या की। उन्होंने कहा कि एक छात्र जो मेरिट के आधार पर एक खुली प्रतिस्पर्धी परीक्षा (Open Entrance Exam) पास करके आया है, उसके भविष्य के साथ मनमाना व्यवहार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट के फैसले के प्रमुख बिंदु:

  • संवैधानिक दायित्व: कोर्ट ने माना कि संविधान के भाग-III में उच्च शिक्षा को मौलिक अधिकार (Fundamental Right) के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है, लेकिन यह अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के व्यापक दायरे में आता है।

  • छात्र के करियर पर प्रभाव: अदालत ने कहा कि एडमिशन रद्द करने जैसा कठोर फैसला किसी छात्र के करियर को पूरी तरह बर्बाद कर सकता है। इसे केवल संदेह या अपूर्ण जानकारी के आधार पर नहीं लिया जाना चाहिए।

  • ठोस आधार की आवश्यकता: जस्टिस सिंह ने स्पष्ट किया कि प्रोफेशनल एजुकेशन जारी रखने का अधिकार एक बहुमूल्य अधिकार है। इसे खत्म करने के लिए एजेंसी के पास ऐसे प्रमाण होने चाहिए जो कानूनी रूप से वैध और अकाट्य हों।


NTA और CBI की कार्रवाई पर सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि उसने बिना किसी कदाचार (Unfair Means) के परीक्षा पास की थी। केवल जांच एजेंसी की किसी ‘प्राथमिक जानकारी’ के आधार पर बिना पक्ष सुने रिजल्ट रद्द करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

अदालत ने भी इस तर्क में दम पाया कि यदि छात्र ने मेरिट के आधार पर सीट हासिल की है, तो उसे अपनी पढ़ाई जारी रखने का मौका मिलना चाहिए, जब तक कि उसके खिलाफ कोई गंभीर धोखाधड़ी साबित न हो जाए। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि प्रशासनिक फैसलों में पारदर्शिता और तर्कसंगतता का होना अनिवार्य है, विशेषकर तब जब वे छात्रों के भविष्य से जुड़े हों।


शिक्षा जगत में फैसले के मायने

दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला उन हजारों छात्रों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो अक्सर प्रशासनिक जटिलताओं या जांच एजेंसियों की संदिग्ध रिपोर्टों के कारण अपना शैक्षणिक वर्ष गंवा देते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश प्रोफेशनल एजुकेशन के प्रति अदालतों के दृष्टिकोण में एक बड़े बदलाव का संकेत है।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि शिक्षा केवल एक सेवा नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और व्यक्तिगत आवश्यकता है जिसे राज्य को संरक्षित करना चाहिए। कोर्ट ने सरकार को चेताया कि छात्रों के प्रति कोई भी कार्रवाई ‘हल्के’ में नहीं ली जा सकती।


आगे की राह: क्या होगा याचिकाकर्ता का?

हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद, अब गेंद NTA और संबंधित मेडिकल कॉलेज के पाले में है। कोर्ट के रुख से यह स्पष्ट है कि छात्र की पढ़ाई में तब तक बाधा नहीं डाली जा सकती जब तक कि जांच के परिणाम अंतिम और निर्णायक न हों। यह आदेश उन संस्थानों के लिए भी एक सबक है जो बिना उचित प्रक्रिया के एडमिशन रद्द करने की जल्दबाजी दिखाते हैं।


दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश शिक्षा के अधिकार को नए संवैधानिक आयाम देता है। जस्टिस जसमीत सिंह की यह टिप्पणी कि “उच्च शिक्षा का अधिकार हल्के में खत्म नहीं किया जा सकता”, भविष्य में कई समान मामलों के लिए नजीर (Precedent) बनेगी। यह फैसला न केवल एक छात्र के MBBS बनने के सपने को सुरक्षित करता है, बल्कि भारतीय न्यायपालिका के उस मानवीय चेहरे को भी उजागर करता है जो मेरिट और न्याय के साथ खड़ा है।

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