
मुंबई/पटना: सपनों के शहर मुंबई में प्रस्तावित ‘बिहार भवन‘ के निर्माण को लेकर महाराष्ट्र और बिहार की सियासत में पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। एक तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को ‘मरीजों की सेवा’ का माध्यम बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने इसे सीधे तौर पर चुनौती देते हुए निर्माण कार्य रोकने की हुंकार भरी है। 314.20 करोड़ रुपये के इस भव्य प्रोजेक्ट ने न केवल अंतर-राज्यीय संबंधों पर बहस छेड़ दी है, बल्कि ‘क्षेत्रवाद’ और ‘राष्ट्रीय अधिकार’ के पुराने मुद्दों को भी हवा दे दी है।
विवाद की जड़: आखिर क्यों भड़की मनसे?
विवाद की चिंगारी तब सुलगी जब मनसे नेता यशवंत किलेदार ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि मुंबई की जमीन पर ‘बिहार भवन’ का निर्माण किसी भी कीमत पर नहीं होने दिया जाएगा। मनसे का तर्क है कि मुंबई पर पहले से ही बुनियादी ढांचे का भारी दबाव है।
मनसे के विरोध के 3 मुख्य तर्क:
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संसाधनों का बोझ: मनसे का कहना है कि महाराष्ट्र खुद बेरोजगारी और किसानों की बदहाली से जूझ रहा है, ऐसे में अन्य राज्यों के प्रशासनिक भवनों के लिए मुंबई की कीमती जमीन का उपयोग तर्कसंगत नहीं है।
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स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवाल: मनसे ने तंज कसते हुए कहा कि यदि नीतीश सरकार को कैंसर मरीजों की इतनी ही चिंता है, तो वे बिहार में ही टाटा मेमोरियल जैसा अस्पताल क्यों नहीं बनाते? मरीजों को इलाज के लिए मुंबई आने पर मजबूर करना उनकी प्रशासनिक विफलता है।
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राजनीतिक संदेश: स्थानीय अस्मिता की राजनीति करने वाली मनसे इसे मुंबई के ‘मराठी मानुस’ के अधिकारों पर अतिक्रमण के रूप में देख रही है।
क्या है 314 करोड़ का मेगा प्रोजेक्ट?
दिल्ली के ‘बिहार निवास’ और ‘बिहार सदन‘ की अपार सफलता और उपयोगिता को देखते हुए नीतीश सरकार ने मुंबई में भी अपना स्टेट गेस्ट हाउस बनाने का निर्णय लिया है। इसके लिए मुंबई के पॉश इलाके एलफिंस्टन एस्टेट (मुंबई पोर्ट ट्रस्ट की जमीन) को चुना गया है।
परियोजना की तकनीकी और भौतिक विशेषताएं:
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लागत: 314.20 करोड़ रुपये (प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त)।
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ऊंचाई: यह 69 मीटर ऊंची एक भव्य 30 मंजिला इमारत होगी।
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क्षेत्रफल: लगभग 0.68 एकड़ की प्राइम लोकेशन पर इसका निर्माण होगा।
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उद्देश्य: सरकारी कामकाज के साथ-साथ मुंबई में गंभीर बीमारियों का इलाज कराने आने वाले बिहार के गरीब लोगों को सस्ता और सुरक्षित आवास प्रदान करना।
सुविधाओं का भंडार: मरीजों के लिए ‘संजीवनी’ या सफेद हाथी?
बिहार सरकार का दावा है कि मुंबई के टाटा मेमोरियल, केईएम और अन्य बड़े अस्पतालों में बिहार से हर साल हजारों मरीज आते हैं। निजी होटलों का खर्च वहन न कर पाने के कारण ये लोग फुटपाथों पर रहने को मजबूर होते हैं।
प्रस्तावित बिहार भवन में मिलने वाली सुविधाएं:
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मरीज डोरमेट्री: विशेष रूप से मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए 240 बिस्तरों वाली अत्याधुनिक डोरमेट्री।
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आवासीय क्षमता: अधिकारियों और जरूरतमंदों के लिए कुल 178 कमरे।
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स्मार्ट पार्किंग: 233 वाहनों की क्षमता वाली सेंसर-आधारित मल्टी-लेवल पार्किंग।
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कॉन्फ्रेंस सुविधाएं: 72 सीटों वाला विशाल कॉन्फ्रेंस हॉल और मीटिंग रूम।
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मेडिकल सपोर्ट: भवन के अंदर ही एक प्राथमिक चिकित्सा कक्ष (Medical Room) और कैफेटेरिया की व्यवस्था।
“मुंबई किसी की जागीर नहीं”: बिहार सरकार का पलटवार
मनसे की धमकी पर बिहार के कद्दावर मंत्री अशोक चौधरी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने इसे भारतीय संविधान और लोकतंत्र पर हमला बताया है। चौधरी ने दो-टूक शब्दों में कहा, “किसी में दम है तो भवन निर्माण रोक कर दिखाए। मुंबई किसी की निजी जागीर नहीं है, यह भारत का हिस्सा है और हर भारतीय को यहाँ रहने और काम करने का अधिकार है।”
बिहार सरकार के मंत्रियों का कहना है कि यह परियोजना केवल राजनीति के लिए नहीं, बल्कि उन हजारों गरीब परिवारों के लिए है जो इलाज के दौरान मुंबई में दर-दर भटकते हैं।
विपक्ष के सुर: बिहार में अपनों ने भी घेरा
दिलचस्प बात यह है कि इस विवाद में नीतीश सरकार को केवल बाहर से ही नहीं, बल्कि घर के अंदर से भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने इसे ‘प्राथमिकताओं का भ्रम’ बताया है। आरजेडी प्रवक्ताओं का कहना है कि 300 करोड़ से अधिक की यह राशि यदि बिहार के जिलों में ही स्वास्थ्य ढांचे को सुधारने में खर्च की जाती, तो राज्य के लोगों को इलाज के लिए मुंबई जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
राजनीतिक विश्लेषण: क्या है भविष्य?
यह विवाद केवल एक इमारत का नहीं है, बल्कि यह आगामी चुनावों और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई का हिस्सा भी नजर आ रहा है।
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मराठी वोट बैंक: मनसे इस मुद्दे के जरिए फिर से अपनी ‘मराठी कार्ड’ वाली राजनीति को धार दे रही है।
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बिहारी गौरव: नीतीश कुमार इस भवन को ‘बिहारी अस्मिता’ और ‘सेवा’ के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं।
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कानूनी पेंच: चूंकि जमीन केंद्र सरकार के अधीन (मुंबई पोर्ट ट्रस्ट) है, इसलिए राज्य सरकार (महाराष्ट्र) की भूमिका तकनीकी स्तर पर महत्वपूर्ण होगी।
मुंबई में ‘बिहार भवन‘ के निर्माण को लेकर छिड़ा यह विवाद अब एक ‘बैटलफील्ड’ में तब्दील हो चुका है। जहाँ एक ओर जनकल्याण और संघीय ढांचे की दुहाई दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय राजनीति और संसाधनों के बँटवारे को लेकर विरोध के सुर बुलंद हैं। अब देखना यह होगा कि क्या महाराष्ट्र सरकार इस निर्माण को हरी झंडी देती है या फिर ‘राज’ और ‘नीतीश’ की यह सियासी जंग कानूनी गलियारों तक पहुंचती है।



