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उत्तराखंड वन विभाग की बड़ी कार्यवाही: सरकारी दस्तावेजों की गोपनीयता भंग करने पर डिप्टी रेंजर कुलदीप सिंह पंवार निलंबित, निजता के उल्लंघन का भी आरोप

देहरादून: उत्तराखंड वन विभाग में अनुशासन और सुशासन को लेकर एक बड़ा संदेश देते हुए विभाग के प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) ने उप वन क्षेत्राधिकारी (डिप्टी रेंजर) कुलदीप सिंह पंवार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। पंवार पर सरकारी अभिलेखों को अनधिकृत रूप से प्राप्त करने, उनकी गोपनीयता भंग करने और सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के प्रावधानों की धज्जियां उड़ाने के गंभीर आरोप हैं। विभागीय जांच में प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने के बाद यह कड़ी कार्रवाई की गई है।

क्या है पूरा मामला: फाइलों की ‘चोरी’ और अनधिकृत कब्जा

इस सनसनीखेज मामले का खुलासा तब हुआ जब वन संरक्षक अनुसंधान वृत्त, हल्द्वानी को एक शिकायती पत्र प्राप्त हुआ। पत्र में चौंकाने वाला दावा किया गया था कि उप वन क्षेत्राधिकारी कुलदीप सिंह पंवार के पास विभाग के कुछ ऐसे अति-संवेदनशील दस्तावेज मौजूद हैं, जो उन्हें कभी आधिकारिक रूप से जारी ही नहीं किए गए।

जब विभाग ने इस शिकायत की आंतरिक जांच शुरू की, तो परतें दर परत सच सामने आने लगा। जांच में पाया गया कि पंवार के पास मौजूद दस्तावेज न तो किसी सक्षम अधिकारी द्वारा प्रमाणित थे और न ही उन्हें RTI कानून के तहत कानूनी रूप से हासिल किया गया था। यह सीधे तौर पर सरकारी फाइलों की चोरी या अनधिकृत रूप से प्राप्त करने का मामला प्रतीत हुआ, जिसने विभाग की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए।

निजता का अधिकार और संवैधानिक उल्लंघन

जांच रिपोर्ट में एक और गंभीर पहलू सामने आया है—‘निजता का उल्लंघन’। अधिकारियों के मुताबिक, पंवार ने जिन दस्तावेजों का दुरुपयोग किया, उनमें एक निजी व्यक्ति से संबंधित अत्यंत व्यक्तिगत जानकारियां शामिल थीं। किसी सरकारी पद पर रहते हुए किसी व्यक्ति की निजी सूचनाओं का इस तरह अनधिकृत इस्तेमाल करना भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त ‘निजता के मौलिक अधिकार’ का सीधा उल्लंघन माना गया है। विभाग ने इसे सेवा नियमों के साथ-साथ नागरिक अधिकारों पर भी हमला करार दिया है।

कानून का शिकंजा: BNS और आचरण नियमावली के तहत कार्रवाई

विभागीय जांच रिपोर्ट के आधार पर कुलदीप सिंह पंवार का यह कृत्य केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक आपराधिक कृत्य की श्रेणी में पाया गया है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि उन्होंने:

  1. उत्तराखंड राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली 2002 के नियम 3(1), 3(2) और 9 का खुला उल्लंघन किया है।

  2. भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 303 (चोरी या बेईमानी), 61 (आपराधिक साजिश) और 356 समेत अन्य सुसंगत धाराओं के तहत गंभीर अपराध किया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी अभिलेखों की सुरक्षा से समझौता करना राजद्रोह के समान गंभीर माना जाता है, क्योंकि इससे विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी साख को अपूरणीय क्षति पहुँचती है।

स्पष्टीकरण में विफल रहे अधिकारी

निलंबन की कार्रवाई से पहले विभाग ने न्याय के नैसर्गिक सिद्धांत का पालन करते हुए कुलदीप सिंह पंवार को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया था। 11 नवंबर 2025 को उनसे लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया था। हालांकि, विभागीय सूत्रों के अनुसार, पंवार ने न तो तय समय सीमा में संतोषजनक जवाब दिया और न ही उन दस्तावेजों के स्रोत का खुलासा किया। वे यह बताने में पूरी तरह विफल रहे कि प्रतिबंधित और अप्रमाणित सरकारी फाइलें उनके पास कैसे पहुँचीं।

प्रमुख वन संरक्षक का कड़ा रुख

मामले की गंभीरता और अधिकारी की संदिग्ध भूमिका को देखते हुए प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) देहरादून ने कड़े शब्दों में निलंबन आदेश जारी किया। आदेश के अनुसार:

  • कुलदीप सिंह पंवार को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

  • निलंबन अवधि के दौरान उन्हें वन संरक्षक शिवालिक वृत्त, उत्तराखंड कार्यालय से संबद्ध (Attach) किया गया है।

  • नियमों के तहत उन्हें केवल जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

विभाग में ‘क्लीन-अप’ ऑपरेशन के संकेत

वन विभाग के इस कदम को एक बड़े ‘क्लीन-अप’ ऑपरेशन के तौर पर देखा जा रहा है। अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं है, बल्कि यह एक संदेश है कि सरकारी तंत्र में रहकर सिस्टम के साथ धोखाधड़ी करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

विस्तृत विभागीय जांच अभी जारी है। यदि अंतिम जांच रिपोर्ट में आरोप पूरी तरह सिद्ध हो जाते हैं, तो कुलदीप सिंह पंवार को सेवा से बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा का सामना भी करना पड़ सकता है। इसके साथ ही, विभाग अब डिजिटल लॉकिंग और फाइलों के ट्रैक-एंड-ट्रेस सिस्टम को और मजबूत करने पर विचार कर रहा है ताकि भविष्य में ऐसी ‘सूचना लीक’ की घटनाओं को रोका जा सके।

उत्तराखंड वन विभाग की यह कार्रवाई भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को दर्शाती है। सरकारी दस्तावेजों की शुचिता बनाए रखना किसी भी लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। अब देखना यह होगा कि विस्तृत जांच में इस नेटवर्क से जुड़े और कौन से नाम सामने आते हैं।

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