वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण के बीच सामने आया चौंकाने वाला आंकड़ा; टॉप-10 नामों से ही 1,124 आपत्तियां, जसपुर और किच्छा में सबसे ज्यादा शिकायतें, कांग्रेस ने उठाए सवाल तो BJP बोली- चुनाव से पहले ही हार मान चुकी है कांग्रेस
देहरादून: उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची को दुरुस्त करने और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के बीच अब आपत्तियों के आंकड़े चर्चा का बड़ा विषय बन गए हैं। सबसे ज्यादा हैरानी उन आंकड़ों को लेकर हो रही है, जिनमें एक ही नाम से बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज होने की बात सामने आई है।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अब तक 12,209 वास्तविक आपत्ति आवेदन दर्ज किए गए हैं। इनमें सबसे ज्यादा 156 आपत्तियां ‘नितिन’ नाम से दर्ज हुई हैं। इसके अलावा कई अन्य नाम ऐसे हैं, जिनके खिलाफ 100 से ज्यादा आपत्तियां दर्ज की गई हैं। यही नहीं, टॉप-10 नामों से ही 1,124 आपत्तियां दर्ज होने की बात सामने आई है। इन आंकड़ों ने निर्वाचन प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
हालांकि, किसी एक नाम से कई आपत्तियां दर्ज होने का मतलब यह नहीं है कि सभी आवेदन फर्जी हैं। एक ही नाम के कई अलग-अलग मतदाता हो सकते हैं और अलग-अलग मतदाता भी समान नाम वाले व्यक्ति के खिलाफ आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच और सत्यापन के बाद ही निकाला जा सकता है। लेकिन जिस तरह कुछ नामों से बड़ी संख्या में आपत्तियां सामने आई हैं, उसने राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम लोगों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है।
19 लाख मतदाताओं को नोटिस के बाद बढ़ी हलचल
उत्तराखंड में SIR के तहत करीब 19 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं। इसके बाद मतदाता सूची में दर्ज नामों को लेकर दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। निर्वाचन आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना और ऐसे नामों की पहचान करना है, जो किसी कारण से अब पात्र नहीं हैं या जिनके विवरण में बदलाव की आवश्यकता है।
इसी प्रक्रिया के दौरान सामने आए आपत्तियों के आंकड़े अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गए हैं। विधानसभा चुनाव नजदीक होने के कारण मतदाता सूची का महत्व और बढ़ जाता है। ऐसे में राजनीतिक दल SIR की प्रक्रिया पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
‘नितिन’ नाम से 156 आपत्तियां, कई नामों ने भी चौंकाया
आंकड़ों में सबसे ज्यादा चर्चा नितिन नाम की हो रही है। इस नाम से कुल 156 आपत्तियां दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। ये आपत्तियां मुख्य रूप से जसपुर और किच्छा विधानसभा क्षेत्रों से जुड़ी बताई जा रही हैं।
इसके बाद विनीत गिरि गोसाई नाम से 126, कार्तिक घीक नाम से 125, अशोक प्रसाद नाम से 113 और अभिषेक तिवारी नाम से 104 आपत्तियां दर्ज होने की बात सामने आई है।
इसी क्रम में लतिका सिकदार नाम से 93, विजय यादव के नाम से 90, जयमहाशक्ति मिश्रा के नाम से 76, गुरमेल सिंह के नाम से 75 और रामकुमार के नाम से 73 आपत्तियां दर्ज हैं।
यानी केवल इन शीर्ष 10 नामों को देखें तो 1,124 आपत्तियां सामने आती हैं। कुल 12,209 आपत्तियों के मुकाबले यह संख्या लगभग 9.2 प्रतिशत बैठती है।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सामान्य तौर पर किसी नाम के खिलाफ इतनी बड़ी संख्या में आपत्तियां सामने आना जांच का विषय बन सकता है। हालांकि, केवल नाम की समानता के आधार पर किसी आवेदन को फर्जी घोषित करना उचित नहीं होगा। प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच जरूरी होगी।
जसपुर सबसे आगे, किच्छा दूसरे नंबर पर
विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से देखें तो जसपुर में सबसे ज्यादा आपत्तियां दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। यहां कुल 3,896 आपत्तियां दर्ज हुई हैं। इनमें ‘नितिन’ नाम से 64 आपत्तियां दर्ज होने की बात कही गई है।
इसके बाद किच्छा विधानसभा क्षेत्र का नंबर आता है, जहां 2,857 आपत्तियां दर्ज हुई हैं। खास बात यह है कि किच्छा में ‘नितिन’ नाम से 147 आपत्तियां दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
इसके बाद काशीपुर में 1,489, रुद्रपुर में 1,129 और रुड़की में 676 आपत्तियां दर्ज हुई हैं। वहीं बाजपुर में 438, सितारगंज में 274, गदरपुर में 227, मंगलौर में 226 और हरिद्वार ग्रामीण में 127 आपत्तियां सामने आई हैं।
इन आंकड़ों से साफ है कि आपत्तियों का बड़ा हिस्सा राज्य के कुछ चुनिंदा विधानसभा क्षेत्रों में केंद्रित है।
10 विधानसभा क्षेत्रों में ही 93 फीसदी के करीब आपत्तियां
आंकड़ों का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। टॉप-10 विधानसभा क्षेत्रों में दर्ज आपत्तियों को जोड़ने पर कुल संख्या 11,339 तक पहुंचती है।
इनमें उधम सिंह नगर जिले के जसपुर, किच्छा, काशीपुर, रुद्रपुर, बाजपुर, सितारगंज और गदरपुर शामिल हैं। इन सात विधानसभा क्षेत्रों में कुल 10,310 आपत्तियां दर्ज होने की जानकारी है।
वहीं हरिद्वार जिले के रुड़की, मंगलौर और हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों में कुल 1,029 आपत्तियां दर्ज हुई हैं।
इस तरह इन 10 विधानसभा क्षेत्रों में ही कुल 12,209 आपत्तियों में से करीब 93 प्रतिशत आवेदन दर्ज होने की बात सामने आती है। बाकी विधानसभा क्षेत्रों से लगभग 870 आपत्तियां दर्ज हुई हैं।
यही वजह है कि SIR को लेकर राजनीतिक चर्चा मुख्य रूप से इन क्षेत्रों पर केंद्रित होती जा रही है।
सबसे ज्यादा आपत्तियां ‘Absent/Permanently Shifted’ श्रेणी में
अब सवाल यह है कि आखिर इन आपत्तियों का आधार क्या है? उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सबसे ज्यादा 8,166 आपत्तियां ऐसे मतदाताओं को लेकर हैं, जिन्हें Absent/Permanently Shifted यानी अनुपस्थित या स्थायी रूप से स्थानांतरित बताया गया है।
इसके बाद 2,872 आपत्तियां Already Enrolled यानी पहले से नाम दर्ज होने के आधार पर हैं।
इसके अलावा 730 आपत्तियां Permanently Shifted, 286 मृतक मतदाताओं, 110 कम उम्र के मतदाताओं और दो आपत्तियां भारतीय नागरिक नहीं होने के आधार पर दर्ज की गई हैं। वहीं 42 मामलों में आपत्ति का कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है।
इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि अधिकांश आपत्तियां मतदाताओं के स्थान परिवर्तन, दोहरी प्रविष्टि या पात्रता से जुड़े सवालों के आधार पर दर्ज की गई हैं।
879 मामलों में आपत्ति करने वाले और जिस पर आपत्ति, दोनों का नाम एक
SIR के आंकड़ों में एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया है। 879 ऐसे आवेदन बताए जा रहे हैं, जिनमें आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति का नाम और जिस मतदाता के खिलाफ आपत्ति की गई है, उसका नाम एक ही है।
यह संख्या कुल 12,209 आपत्तियों का लगभग 7.2 प्रतिशत है।
यह आंकड़ा निश्चित तौर पर ध्यान आकर्षित करता है, लेकिन यहां भी यह समझना जरूरी है कि केवल नाम समान होने के आधार पर किसी आवेदन की वास्तविकता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। वास्तविक स्थिति दस्तावेजों और अन्य विवरणों के सत्यापन के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
कांग्रेस ने उठाए सवाल, कहा- असली मतदाताओं पर न पड़े असर
SIR के आंकड़े सामने आने के बाद कांग्रेस ने इस पूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का कहना है कि बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज होने के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित होने की आशंका को गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता अमेंद्र बिष्ट ने इन आंकड़ों को संदेह पैदा करने वाला बताया। उनका आरोप है कि आपत्तियों की प्रक्रिया के जरिए मतदाताओं के नाम हटाने या उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
कांग्रेस का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में मतदाता सूची सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है। इसलिए किसी भी पात्र मतदाता का नाम केवल आपत्ति दर्ज होने के आधार पर हटाया नहीं जाना चाहिए।
पार्टी ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि एक ही नाम से दर्जनों या सैकड़ों आपत्तियां सामने आ रही हैं तो उनके पीछे की वास्तविक स्थिति की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
BJP का पलटवार- कांग्रेस पहले ही हार मान चुकी है
कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा ने भी पलटवार किया है। भाजपा नेता जोत सिंह बिष्ट ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विपक्षी दल चुनाव से पहले ही अपनी हार मान चुका है।
भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस SIR जैसी प्रक्रिया को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रही है। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना निर्वाचन प्रक्रिया का सामान्य और जरूरी हिस्सा है और इसमें पात्र मतदाताओं के हितों की रक्षा के साथ-साथ गलत या अपात्र प्रविष्टियों की पहचान भी जरूरी है।
भाजपा नेता का कहना है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन कमजोर होने की आशंका के चलते SIR को लेकर सवाल खड़े कर रही है।
इस तरह SIR अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति में भी एक बड़ा मुद्दा बनती दिखाई दे रही है।
क्या आपत्ति लगते ही हट जाएगा वोटर का नाम? नहीं, यह समझना जरूरी
इस पूरे विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी मतदाता के नाम के खिलाफ आपत्ति दर्ज हो जाना अपने आप में उसका नाम मतदाता सूची से हटना नहीं है।
आपत्ति मिलने के बाद संबंधित मामले की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया होती है। मतदाता की पात्रता, दस्तावेज और अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच के बाद ही आगे का निर्णय लिया जाता है।
इसलिए फिलहाल सामने आए आंकड़ों को अंतिम मतदाता सूची का परिणाम मानना सही नहीं होगा। असली तस्वीर तब सामने आएगी, जब सभी दावों और आपत्तियों का सत्यापन पूरा होगा और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होगी।
SIR ने बढ़ाया चुनावी तापमान, अब सबकी नजर सत्यापन पर
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच SIR को लेकर सामने आए आंकड़ों ने राजनीतिक तापमान जरूर बढ़ा दिया है। एक तरफ निर्वाचन प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने की कवायद चल रही है, तो दूसरी ओर राजनीतिक दल इस पूरी प्रक्रिया के प्रभाव को लेकर अपने-अपने सवाल और दावे सामने रख रहे हैं।
एक नाम से 156 आपत्तियां, टॉप-10 नामों से 1,124 आवेदन, 10 विधानसभा क्षेत्रों में 11,339 आपत्तियां और 879 ऐसे मामले जिनमें आपत्ति करने वाले और संबंधित मतदाता का नाम समान है—ये आंकड़े निश्चित तौर पर चर्चा का विषय हैं।
लेकिन इन आंकड़ों को देखकर तुरंत यह निष्कर्ष निकालना कि सभी आपत्तियां फर्जी हैं या सभी आपत्तियों के पीछे किसी राजनीतिक दल की भूमिका है, उचित नहीं होगा। इसी तरह यह भी जरूरी है कि वास्तविक और पात्र मतदाताओं के अधिकार किसी भी स्थिति में प्रभावित न हों।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि SIR के दौरान दर्ज हुई इन हजारों आपत्तियों में से कितनी सही साबित होती हैं और कितने मामलों में मतदाता सूची में बदलाव की जरूरत पड़ती है। इसका जवाब सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मिलेगा।
फिलहाल एक बात साफ है—उत्तराखंड में SIR अब सिर्फ मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित मुद्दा नहीं रहा। चुनावी मौसम से पहले इसने राज्य की सियासत को भी गर्म कर दिया है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की पूरी संभावना है।
