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शंकराचार्य विवाद: अखाड़ा परिषद ने प्रयागराज मेला प्रशासन को ठहराया जिम्मेदार, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने अपनाया कड़ा रुख

हरिद्वार: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े प्रकरण पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने कड़ा रुख अपनाते हुए प्रयागराज मेला प्रशासन को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया है। हरिद्वार में परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने कहा कि मेले में व्यवस्था बनाए रखना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है, लेकिन जिस तरह से ब्रह्मचारियों, साधु-संतों और वेदपाठी ब्राह्मणों के साथ मारपीट की गई और उनकी शिखा पकड़कर खींची गई, वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण बल्कि सनातन परंपरा का अपमान भी है।

महंत रविंद्र पुरी ने कहा कि ऐसे दृश्य पूरे संत समाज को विचलित करने वाले हैं और इन्हें किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

‘शिखा सनातन का प्रतीक, अपमान नहीं सहेंगे’

अखाड़ा परिषद अध्यक्ष ने दो टूक शब्दों में कहा कि ब्राह्मणों और संतों की शिखा सनातन धर्म की पहचान और प्रतीक है। शिखा पकड़कर खींचना केवल शारीरिक हिंसा नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था पर सीधा प्रहार है। उन्होंने मांग की कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों ने संतों के साथ अभद्रता की, उनके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

महंत रविंद्र पुरी ने कहा, “प्रशासन की जिम्मेदारी श्रद्धालुओं और संतों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि उन पर लाठियां चलाना। प्रयागराज में जो हुआ, वह बेहद निंदनीय है।”

शंकराचार्य से भी संयम बरतने की अपील

अखाड़ा परिषद ने जहां प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया, वहीं शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से भी संयम और लचीलापन दिखाने की अपील की। महंत रविंद्र पुरी ने कहा कि शंकराचार्य को अपनी जिद छोड़नी चाहिए और मामले को और अधिक तूल देने से बचना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ सार्वजनिक मंचों से की जा रही बयानबाजी से विवाद और गहराता है, जिसका नुकसान पूरे संत समाज और श्रद्धालुओं को होता है।

प्रयागराज में क्या हुआ था?

यह पूरा विवाद 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर गंगा स्नान के दौरान शुरू हुआ। उस दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और माघ मेला प्रशासन के बीच स्नान व्यवस्था को लेकर टकराव हो गया। आरोप है कि प्रशासन ने शंकराचार्य को संगम स्नान से रोका, जिसके बाद वे धरने पर बैठ गए।

इसके बाद स्थिति तब और बिगड़ गई, जब पुलिस द्वारा शंकराचार्य के साथ मौजूद साधु-संतों और वेदपाठी ब्राह्मणों के साथ कथित तौर पर बल प्रयोग किया गया। इसी घटना को लेकर संत समाज में भारी आक्रोश फैल गया।

18 जनवरी से लगातार धरने पर शंकराचार्य

घटना के बाद से शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती लगातार धरने पर बैठे हुए हैं। 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के दिन भी उन्होंने अपनी वैनिटी वैन में रहकर विरोध दर्ज कराया। उनके समर्थन में कई धार्मिक और सामाजिक संगठन सड़कों पर उतरे, जबकि संत समाज के भीतर इस मुद्दे पर दो राय साफ नजर आने लगी।

कुछ बड़े संतों और अखाड़ों ने शंकराचार्य के समर्थन में बयान दिए, वहीं कई प्रमुख संतों ने उनके रवैये को हठधर्मी बताते हुए प्रशासन से सहयोग करने की सलाह दी।

हरिद्वार में भी दिखा विरोध

शंकराचार्य के समर्थन में हरिद्वार में भी कई संगठनों ने विरोध मार्च निकाले और धरना-प्रदर्शन किया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने प्रतीकात्मक रूप से मुंडन कराकर अपना विरोध जताया। इससे साफ हो गया कि यह मामला अब केवल प्रयागराज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देशभर के धार्मिक और सामाजिक संगठनों में चर्चा का विषय बन चुका है।

प्रशासनिक हलकों तक पहुंची आंच

इस प्रकरण की गूंज उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों तक भी पहुंची। गणतंत्र दिवस के दिन बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने दावा किया कि शंकराचार्य के शिष्यों की पिटाई और अन्य घटनाओं से आहत होकर उन्होंने यह कदम उठाया है।

हालांकि, राज्य सरकार ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए अलंकार अग्निहोत्री को निलंबित कर दिया और मामले की जांच मंडलायुक्त बरेली को सौंप दी है। जांच अवधि में उन्हें डीएम कार्यालय शामली से संबद्ध किया गया है।

संत समाज में बढ़ती बेचैनी

अखाड़ा परिषद का कहना है कि इस तरह की घटनाएं संत समाज और प्रशासन के बीच विश्वास की खाई को और गहरा करती हैं। परिषद ने स्पष्ट किया कि वह न तो कानून के उल्लंघन का समर्थन करती है और न ही अराजकता का, लेकिन संतों के सम्मान और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रकरण अब धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। अखाड़ा परिषद ने जहां प्रयागराज मेला प्रशासन की कार्रवाई को गलत ठहराया है, वहीं शंकराचार्य से भी संयम और संवाद का रास्ता अपनाने की अपील की है। आने वाले दिनों में सरकार और प्रशासन के अगले कदम पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इस विवाद का समाधान केवल संतुलन, संवाद और संवेदनशीलता से ही संभव है।

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